Indore भागीरथपुरा दूषित पानी कांड: तीन महीने पहले से शिकायत कर रहे थे रहवासी, फिर भी नहीं हुई सुनवाई
Indore : भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से हुई मौतों और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने के मामले में अब जांच रिपोर्ट से कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। रिपोर्ट के अवलोकन से यह जानकारी सामने आई है कि घटना से करीब तीन महीने पहले से ही क्षेत्र के रहवासी दूषित पानी की शिकायत कर रहे थे। इसके बावजूद उनकी शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
हाई कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में दर्ज कई लोगों के बयानों में भी यह बात सामने आने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय स्तर पर नागरिकों की शिकायतों की जानकारी संबंधित लोगों तक पहुंच रही थी, लेकिन इस दिशा में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई।
मंगलवार को वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया समेत कई वकील हाई कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट का अवलोकन करने रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंचे। रिपोर्ट देखने के बाद अधिवक्ता बागडिया ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह सवाल उठता है कि यदि जनप्रतिनिधियों ने समय रहते नागरिकों की शिकायतों को गंभीरता से लिया होता, तो संभवत: इस घटना को टाला जा सकता था। हालांकि, रिपोर्ट में किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा नहीं किए जाने की बात भी सामने आई है।
शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
Indore भागीरथपुरा के रहवासियों की ओर से दूषित पानी की शिकायतें लगातार किए जाने की बात सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन शिकायतों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया। क्षेत्र में रहने वाले कई लोगों ने जांच के दौरान अपने बयान दर्ज कराए हैं।
इन बयानों से यह संकेत मिलता है कि दूषित पानी की समस्या अचानक सामने नहीं आई थी, बल्कि स्थानीय स्तर पर इसकी शिकायत पहले से की जा रही थी। ऐसे में यदि समय रहते पानी की गुणवत्ता की जांच, पाइपलाइन की जांच और जल टंकी के रखरखाव की प्रक्रिया की समीक्षा की जाती, तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता था।
रिपोर्ट में जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर सवाल उठने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश नहीं किए जाने पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
पानी की टंकी के रखरखाव वाली एजेंसी की भूमिका पर भी सवाल
मामले में पानी की टंकी के रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने वाली निजी एजेंसी की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए थी। जानकारी के अनुसार, शहर में करीब 110 पानी की टंकियां हैं और इनके रखरखाव का काम रामकी लिमिटेड नामक कंपनी के पास है।
कंपनी की ओर से प्रत्येक टंकी पर दो से तीन कर्मचारियों की तैनाती किए जाने की जानकारी है। इसके अलावा नगर निगम की ओर से भी प्रत्येक टंकी पर दो से तीन कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। भागीरथपुरा की पानी की टंकी पर भी घटना के समय निगम और निजी कंपनी के कर्मचारी मौजूद थे।
इसके बावजूद जांच में निजी एजेंसी की भूमिका को लेकर पूछताछ और जिम्मेदारी तय करने से जुड़े सवाल सामने आ रहे हैं। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि टंकी के रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी निजी एजेंसी के पास थी, तो घटना से पहले की शिकायतों और टंकी की स्थिति की भी विस्तृत जांच होनी चाहिए थी।
पाइपलाइन का नक्शा नहीं, फिर रखरखाव कैसे हुआ?
जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण सवाल भागीरथपुरा की पाइपलाइन से जुड़े दस्तावेजों को लेकर सामने आया है। इंदौर विकास प्राधिकरण यानी आईडीए की ओर से जांच आयोग को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 1990 से 1992 के बीच भागीरथपुरा क्षेत्र में डाली गई पाइपलाइनों के नक्शे और अन्य संबंधित दस्तावेज नगर निगम को सौंपे गए थे।
हालांकि, नगर निगम आयुक्त की ओर से आयोग को दिए गए बयान में यह कहा गया है कि वर्तमान में निगम के पास इन पाइपलाइनों का नक्शा उपलब्ध नहीं है।
इस स्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि नगर निगम के पास पाइपलाइन का नक्शा ही मौजूद नहीं था, तो इन लाइनों के रखरखाव और मरम्मत का काम किस आधार पर किया जा रहा था? पाइपलाइन से जुड़े कामों के लिए टेंडर किस तकनीकी जानकारी और दस्तावेजों के आधार पर जारी किए गए? इन सवालों के जवाब जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
लेटर ऑफ इंटेंट को लेकर भी उठे सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने रिपोर्ट के संदर्भ में तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया से जुड़े एक बिंदु पर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट में उनके द्वारा लेटर ऑफ इंटेंट जारी नहीं किए जाने का उल्लेख होने की बात कही गई है।
बागडिया के अनुसार, इस मामले में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी एजेंसी को लेटर ऑफ इंटेंट जारी करने का अधिकार किस स्तर पर था। उनका कहना है कि यह जिम्मेदारी मेयर-इन-काउंसिल यानी एमआईसी से संबंधित थी, ऐसे में अपर आयुक्त की भूमिका को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट के अवलोकन की प्रक्रिया में बदलाव
मंगलवार को जांच रिपोर्ट के अवलोकन के दौरान कुछ अधिवक्ताओं के बीच विवाद की स्थिति भी बनी। इसके बाद रिपोर्ट के अवलोकन की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है।
नई व्यवस्था के तहत अब रिपोर्ट देखने के इच्छुक अधिवक्ताओं को पहले एक निर्धारित फार्म भरकर देना होगा। इसके बाद उन्हें रिपोर्ट के अवलोकन के लिए समय आवंटित किया जाएगा। वकील को दिए गए निर्धारित समय के दौरान ही रिपोर्ट का अध्ययन करना होगा।
Indore भागीरथपुरा दूषित पानी कांड से जुड़ी जांच में सामने आ रहे ये तथ्य प्रशासनिक व्यवस्था, जलापूर्ति तंत्र, पाइपलाइन रखरखाव, शिकायतों की निगरानी और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के आधार पर आगे किन स्तरों पर जवाबदेही तय होती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
