Bastar में नक्सली स्मारक ध्वस्त, सुरक्षा बलों ने जारी रखा ऑपरेशन
साल 2018 से 2023 तक सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़ के Bastar इलाके में नक्सलियों द्वारा बनाए गए लगभग 60 स्मारक नष्ट किए। इनमें सबसे ज्यादा 24 स्मारक 2021 में ध्वस्त किए गए थे। 2023 के बाद सुरक्षा बलों के ऑपरेशन तेज होने के साथ ही इन स्मारकों की संख्या में वृद्धि हुई। 2023 और फरवरी 2026 के बीच सुरक्षाबलों ने लगभग 113 नक्सली स्मारक ध्वस्त किए। कुल मिलाकर 2018 से अब तक लगभग 173 स्मारक गिराए जा चुके हैं।
ये स्मारक नक्सलियों ने अपने नेताओं और अन्य सदस्यों के सम्मान में बनाए थे। सुरक्षा बलों ने इन स्मारकों को निशाना बनाकर उनके प्रभाव और दबदबे को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है।
Bastar: 40 साल से माओवादी गढ़
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके ने पिछले 40 सालों में माओवादियों का गढ़ बना हुआ था। इस दौरान नक्सलियों ने बड़े हिस्सों पर कब्जा जमाया और सैकड़ों स्मारक बनाए, जो उनके दबदबे का प्रतीक थे।
हालांकि, पिछले तीन सालों में हालात बदल गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सिक्योरिटी फोर्सेस ने 520 से अधिक माओवादी नक्सलियों को मार गिराया और कई अन्य बड़े नेता सरेंडर कर चुके हैं। इस अभियान ने इलाके में माओवादी गतिविधियों पर भारी असर डाला है।
सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) के डायरेक्टर जनरल जीपी सिंह ने हाल ही में एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसमें JCB मशीन और अन्य उपकरणों से नक्सली स्मारक ध्वस्त किए जा रहे थे। उन्होंने कहा, “हम ईंट-ईंट तोड़कर इस विचार और इसके हर रूप को खत्म कर देंगे।”
सबसे ऊंचा स्मारक: 64 फीट का संरचना
अब तक नष्ट किए गए स्मारकों में सबसे ऊंचा 64 फीट का स्मारक था। यह बीजापुर डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर से लगभग 90 किलोमीटर दूर कोमटपल्ली गांव में स्थित था।
अगस्त 2022 में माओवादियों ने कोमटपल्ली में ‘शहीदी सप्ताह’ मनाने के लिए सैकड़ों गांववालों को इकट्ठा किया था। इसमें टॉप माओवादी नेता शामिल हुए थे, ज्यादातर बटालियन 1 के सदस्य। बटालियन 1 पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की सबसे खतरनाक इकाई है और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की आर्म्ड विंग मानी जाती है।
उस समय कोमटपल्ली गांव सुरक्षा बलों की पहुंच से दूर था। लेकिन हालात में बदलाव के बाद जनवरी 2025 में बीजापुर के एसपी जितेंद्र कुमार यादव के नेतृत्व में स्मारक को ध्वस्त किया गया।
स्मारक हटाना: माओवाद की आइडियोलॉजी पर हमला
बस्तर रेंज के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल सुंदरराज पी ने बताया कि माओवादी स्मारक और प्रतीकों को हटाना माओवाद के आइडियोलॉजिकल असर को समाप्त करने और इलाके में सामान्य स्थिति बहाल करने का हिस्सा है। इसका उद्देश्य गुड गवर्नेंस को मजबूत करना और समाज को मेनस्ट्रीम में जोड़ना भी है।
सुंदरराज पी ने कहा, “पहले माओवादी ऐसे स्मारकों का उपयोग स्थानीय समुदाय में डर, दबदबा और सोच पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए करते थे। इन्हें हटाने से यह साफ संदेश जाता है कि राज्य की अधिकारिता और कानून का राज लगातार मजबूत हो रहा है। साथ ही लोगों के बीच यह भी संदेश जाता है कि माओवादियों का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।”
स्मारक हटाने का प्रशासनिक महत्व
सुरक्षा बलों द्वारा स्मारक ध्वस्त करने का कदम सिर्फ प्रतीकों को हटाने तक सीमित नहीं है। यह रणनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
- यह इलाके में सरकारी नियंत्रण को मजबूती प्रदान करता है।
- स्थानीय लोगों को यह भरोसा दिलाता है कि माओवादी दबदबा धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।
- गुड गवर्नेंस और सामाजिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।
- नक्सली गतिविधियों के लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आधार कमजोर करता है।
माओवादी स्मारक अक्सर उनके प्रचार और संगठनात्मक ढांचे का प्रतीक होते थे। इनका नष्ट होना स्थानीय समुदाय में डर और आतंक को कम करने का काम करता है।
आगे की रणनीति और निगरानी
सुरक्षा बल अब न केवल स्मारकों को ध्वस्त कर रहे हैं, बल्कि नक्सलियों की वापसी को रोकने के लिए इलाके में सतत निगरानी भी रख रहे हैं।
- बस्तर रेंज में नियमित पेट्रोलिंग और ऑपरेशन जारी हैं।
- स्थानीय पुलिस और CRPF ने मिलकर माओवादी गतिविधियों पर नजर रखी है।
- कम्युनिटी आउटरीच और जनसंवाद से लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास भी चल रहा है।
सुंदरराज पी के अनुसार, “माओवादियों के प्रभाव को खत्म करने का यह कदम इलाके के लोगों के लिए सुरक्षित और स्थिर वातावरण बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।”
निष्कर्ष
2018 से अब तक बस्तर में 173 स्मारक ध्वस्त करना न केवल सुरक्षा बलों की सफलता का प्रतीक है, बल्कि यह माओवाद की विचारधारा पर प्रभावी प्रहार भी माना जा रहा है।
- इलाके में राज्य की अधिकारिता मजबूत हुई है।
- स्थानीय समुदाय में माओवादी दबदबे का मनोवैज्ञानिक असर कम हुआ है।
- गुड गवर्नेंस और सामाजिक स्थिरता को बढ़ावा मिला है।
सुरक्षा बलों की कार्रवाई से यह संदेश भी जाता है कि माओवादी अब इलाके में अपनी पुरानी पकड़ नहीं बना सकते। यह प्रक्रिया बस्तर के सामान्य जीवन और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
