पीढ़ियों से चली आ रही आस्था की परंपरा, इंदौर से हर नवरात्र सारंगपुर आता है बहिनिया परिवार
150 से अधिक सदस्य लालमाता-फूलमाता मंदिर में करते हैं पूजा-अर्चना; नवमी पर निकलेगी ज्वारे की बाड़ी
सारंगपुर। रोजगार की तलाश में करीब 150 साल पहले सारंगपुर से इंदौर जाकर बसा बहिनिया परिवार आज भी अपनी पुरानी जड़ों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। नवरात्रि आते ही परिवार के 150 से अधिक सदस्य इंदौर से सारंगपुर पहुंचते हैं और गाड़ीवाड़ा चौक स्थित अपने पूर्वजों के प्राचीन लालमाता-फूलमाता मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। परिवार के सदस्य नवरात्रि के दिनों में यहां मां की आराधना में समय बिताते हैं।
पीढ़ियां बदलीं और परिवार का निवास स्थान भी बदल गया, लेकिन लालमाता मंदिर से जुड़ी आस्था आज भी बनी हुई है। नवरात्रि के सातवें दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच परिवार के सदस्य विशेष पूजा में शामिल हुए। परिवार के लिए यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन तक सीमित नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
अमावस्या से शुरू होती है ज्वारे की साधना
गाड़ीवाड़ा चौक स्थित प्राचीन लालमाता मंदिर में नवरात्रि पर घटस्थापना के साथ ज्वारे की बाड़ी स्थापित की जाती है। मंदिर के पुजारी-पंडा रमेश बहिनिया के अनुसार, अमावस्या के दिन मां की पूजा-अर्चना के बाद कालीसिंध नदी के दोनों किनारों की मिट्टी मिलाकर ज्वारे बोए जाते हैं। इसके बाद प्रतिदिन सुबह और शाम उन्हें पानी दिया जाता है।
मां के कोतवाल के रूप में सेवा करने वाले कमलेश बहिनिया बताते हैं कि नवरात्रि के दौरान ज्वारे धीरे-धीरे अंकुरित होते हैं। श्रद्धालु इन्हें आस्था और साधना का प्रतीक मानते हैं। नवमी की रात मां की विशेष पूजा और महाआरती के बाद बाड़ी उठाई जाएगी। इसके बाद ढोल-ढमाकों और जयकारों के साथ बाड़ी नगर के प्रमुख मार्गों से निकाली जाएगी।
बाड़ी की शोभायात्रा रंगेरवाड़ी, जामा मस्जिद, गांधी चौक और अशोक टॉकीज सहित प्रमुख क्षेत्रों से होते हुए कालीसिंध नदी के मथुरा घाट पहुंचेगी, जहां उसका विसर्जन किया जाएगा। मंदिर में नवरात्रि के दौरान मां की आराधना के साथ काला जी महाराज की पूजा भी की जाती है।
शीतला माता मंदिर से जुड़ी विवाह की परंपरा
लालमाता मंदिर के पास स्थित शीतला माता मंदिर भी नगर की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता के अनुसार, सारंगपुर में रहने वाले धनगर समाज के लोग विवाह के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन के माता पूजन की शुरुआत इसी मंदिर से करते हैं। तीज-त्योहारों पर यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। परंपरा के अनुसार, होली के अवसर पर मंदिर के पास होली का डांडा गाड़कर होली सजाई जाती है।
नवरात्रि के समापन के बाद अगले दिन बदलीपुरा स्थित हनुमान मंदिर में चोला चढ़ाने और शक्तिपीठ बिजासन भैंसवा माता मंदिर में मान-मन्नत की पूजा करने की परंपरा भी निभाई जाती है। ये धार्मिक आयोजन नगर की पुरानी मान्यताओं और सामुदायिक सहभागिता से जुड़े हैं।
व्यवस्थाओं में नगर पालिका का सहयोग
नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। नगर पालिका की ओर से हर साल परिसर के आसपास साफ-सफाई, बिजली और टैंकरों के माध्यम से पेयजल की व्यवस्था की जाती है। मंदिर समिति के अनुसार, पहले मंदिर मार्ग पर पेवर ब्लॉक लगाने में भी नगर पालिका ने सहयोग किया था।
श्रद्धालु सुनील धनगर ने बताया कि लालमाता मंदिर सारंगपुर की प्राचीन आस्था का प्रमुख केंद्र है और यहां हजारों लोगों की श्रद्धा जुड़ी हुई है। उनके मुताबिक, अमावस्या को घटस्थापना के साथ शुरू होने वाली आराधना का समापन नवमी पर विशेष पूजा के बाद होता है। बाड़ी की पूजा कर श्रद्धालु उसे कालीसिंध नदी में विसर्जित करते हैं।
पुजारी-पंडा रमेश बहिनिया ने मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं में सहयोग के लिए नगर पालिका और नगर पालिका अध्यक्ष पंकज पालीवाल के प्रति आभार जताया। उनके अनुसार, साफ-सफाई, रोशनी, पेयजल और मार्ग पर पेवर ब्लॉक से श्रद्धालुओं को सुविधा मिलती है। वर्षों से चली आ रही पूजा और बाड़ी विसर्जन की परंपरा इस बार भी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जा रही है।
