राम मंदिर दान घोटाला: 79.85 लाख रुपये की बरामदगी के बाद भी उठ रहे बड़े सवाल, ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर बढ़ी जांच की मांग
अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान में कथित गबन का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। अब तक आधिकारिक तौर पर गबन की कुल राशि का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन जांच एजेंसियों ने 79.85 लाख रुपये बरामद किए जाने की पुष्टि की है। मामले में पहले विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया और बाद में बढ़ते सवालों के बीच एफआईआर दर्ज की गई। एफआईआर में आठ लोगों को नामजद किया गया है, जिन्हें फिलहाल न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। दोनों के करीबी लोगों पर दान की राशि के कथित गबन में शामिल होने के आरोप लगे हैं। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी कहा है कि आवश्यकता पड़ने पर चंपत राय से पूछताछ की जा सकती है। हालांकि, इस मामले में अभी भी कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब सामने आना बाकी हैं।
सवाल 1: ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष की भूमिका पर सवाल क्यों नहीं?
पूरे विवाद के दौरान सबसे अधिक चर्चा महासचिव और अन्य लोगों की हुई, लेकिन ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी का नाम लगभग चर्चा से बाहर रहा। ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था और दान की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी कोषाध्यक्ष की होती है।
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दान की गिनती में शामिल कुछ लोग कथित तौर पर निजी खातों में धन जमा करा रहे थे। यदि ऐसा हुआ तो वित्तीय निगरानी प्रणाली कैसे विफल हुई? इस पर अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
हाल ही में भीलवाड़ा में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान स्वामी गोविंद देव गिरी से पत्रकारों ने इस मामले पर सवाल पूछा, लेकिन उन्होंने इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की।
ट्रस्ट में कौन किस जिम्मेदारी पर?
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष, निर्माण समिति प्रमुख, वरिष्ठ कानूनी सलाहकार, आध्यात्मिक गुरु, प्रशासनिक अधिकारी और केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि सहित कई सदस्य शामिल हैं। ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था, निर्माण कार्य, प्रशासनिक समन्वय और धार्मिक गतिविधियों की अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित हैं।
महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है, जबकि कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी अब भी अपने पद पर बने हुए हैं।
सवाल 2: एफआईआर में गबन की रकम और ट्रस्ट के पदाधिकारियों का उल्लेख क्यों नहीं?
एफआईआर दर्ज होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि उसमें कथित गबन की अनुमानित राशि का उल्लेख क्यों नहीं किया गया। इसके अलावा ट्रस्ट के किसी पदाधिकारी का नाम भी एफआईआर में शामिल नहीं है।
एफआईआर में जिन आठ लोगों को नामजद किया गया है, उनमें दान की गिनती करने वाले कर्मचारी, ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों के रिश्तेदार, एक ड्राइवर और बैंक से सेवानिवृत्त कर्मचारी शामिल हैं। इसके अलावा कुछ अज्ञात लोगों को भी जांच के दायरे में रखा गया है।
आलोचकों का कहना है कि यदि वित्तीय अनियमितता इतनी बड़ी थी तो ट्रस्ट की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
सवाल 3: एफआईआर से पहले एसआईटी क्यों बनाई गई?
इस मामले में सरकार ने पहले विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया और उसके बाद एफआईआर दर्ज कराई। एसआईटी में वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को शामिल किया गया था, जिन्होंने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी।
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि शुरुआती जांच में गड़बड़ी सामने आ गई थी तो उसी समय एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराई गई? एसआईटी की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या उसी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई या नहीं, इस पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
सवाल 4: क्या पारदर्शिता की कमी से भक्तों का भरोसा प्रभावित हो रहा है?
यह स्पष्ट हो चुका है कि दान की राशि में अनियमितता के आरोपों की जांच चल रही है और बड़ी रकम बरामद भी की गई है। लेकिन कुल गबन कितना हुआ, इसमें कौन-कौन शामिल था, निगरानी व्यवस्था कैसे विफल हुई और जिम्मेदारी किसकी है—इन सभी सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान का प्रबंधन पूरी पारदर्शिता से होना चाहिए ताकि लोगों का विश्वास बना रहे।
सवाल 5: क्या मंदिरों में दान प्रबंधन की व्यवस्था बदलने की जरूरत है?
इस मामले ने देशभर में धार्मिक संस्थानों की वित्तीय व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या बड़े मंदिरों में नकद दान की व्यवस्था सीमित की जानी चाहिए? क्या अधिक डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए? क्या बड़ी धार्मिक संस्थाओं में कॉर्पोरेट शैली की वित्तीय निगरानी लागू की जानी चाहिए?
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र पहले भी यह सुझाव दे चुके हैं कि मंदिर प्रबंधन के लिए एक पेशेवर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति की जानी चाहिए। ऐसे में यह बहस फिर तेज हो गई है कि आधुनिक वित्तीय प्रबंधन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक संस्थानों की प्रशासनिक संरचना में बदलाव आवश्यक है या नहीं।
आगे क्या?
फिलहाल मामले की जांच जारी है और न्यायालय में इसकी सुनवाई भी आगे बढ़ेगी। जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई, एसआईटी की रिपोर्ट और ट्रस्ट की ओर से संभावित जवाब इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या जांच का दायरा ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों तक बढ़ता है या केवल नामजद आरोपियों तक ही सीमित रहता है।
