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गाली, निजी हमले और ध्रुवीकरण—Assam चुनाव में क्यों बदला राजनीति का चेहरा?

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Published On: 8 April 2026
assam

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Assam चुनाव: मुद्दों से भटका विमर्श और सियासी मर्यादा पर सवाल

Assam विधानसभा चुनाव का प्रचार थम चुका है और अब सभी की नजरें मतदान और उसके परिणामों पर टिकी हैं। लेकिन इस बार चुनावी माहौल ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है—क्या भारतीय राजनीति में संवाद का स्तर लगातार गिरता जा रहा है? अपनी सांस्कृतिक विविधता, सौम्यता और सामाजिक संतुलन के लिए पहचाने जाने वाले असम में इस बार चुनावी फिजाओं में एक अलग ही तरह की कड़वाहट देखने को मिली। ब्रह्मपुत्र की शांत धारा के विपरीत राजनीतिक मंचों से ऐसे शब्दों की बाढ़ आई, जिसने सियासी मर्यादा को चुनौती दे दी।

चुनावी विमर्श का बदलता स्वरूप

लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होता, बल्कि यह नीतियों, विचारों और विकास के मॉडल पर जनता के सामने बहस का अवसर भी होता है। लेकिन इस बार असम में चुनावी विमर्श विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाढ़ नियंत्रण और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत आरोपों, सांप्रदायिक संकेतों और तीखी बयानबाज़ी पर केंद्रित होता नजर आया।

राजनीतिक रैलियों और जनसभाओं में जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ, उसने यह संकेत दिया कि चुनाव अब विचारों की लड़ाई कम और व्यक्तियों की टकराहट ज्यादा बनता जा रहा है। नेताओं के भाषणों में संयम और शालीनता की जगह आक्रामकता और तंज ने ले ली।

व्यक्तिगत हमलों का बढ़ता चलन

इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा नेताओं के निजी जीवन पर किए गए हमलों को लेकर हुई। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का स्तर इस हद तक गिर गया कि परिवार के सदस्य भी निशाने पर आ गए। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला केवल नीतिगत असहमति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तिगत जीवन और रिश्तों तक पहुंच गया।

ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए चिंताजनक है। जब राजनीतिक बहस का केंद्र निजी आरोप बन जाता है, तो असली मुद्दे स्वतः ही पीछे छूट जाते हैं। इससे मतदाताओं के सामने स्पष्ट विकल्प नहीं बन पाता और चुनाव की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति

इस बार चुनाव में पहचान की राजनीति भी प्रमुख रूप से उभरकर सामने आई। कुछ शब्द और प्रतीक जो पहले केवल सामाजिक पहचान से जुड़े थे, उन्हें चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इससे समाज में विभाजन की रेखाएं और गहरी होती दिखाई दीं।

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर वोट मांगना कोई नया चलन नहीं है, लेकिन जब यह अपमानजनक या भड़काऊ भाषा के साथ जुड़ जाता है, तो इसका असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की एकता और सद्भाव पर भी पड़ता है।

सोशल मीडिया की भूमिका

आधुनिक चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। असम चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहा। नेताओं के भाषणों के छोटे-छोटे अंश, विवादित बयान और तीखे संवाद तेजी से वायरल हुए। कई बार इन क्लिप्स को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया, जिससे भ्रम और आक्रोश दोनों बढ़े।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय आईटी सेल और समर्थकों की फौज ने इन बयानों को और अधिक आक्रामक रूप में फैलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि तर्कपूर्ण बहस की जगह ट्रोलिंग और आरोप-प्रत्यारोप ने ले ली।

सुर्खियों की राजनीति

आज के दौर में मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरना राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है। नेताओं को यह एहसास है कि जितना विवादित बयान होगा, उतनी ही अधिक चर्चा होगी। यही कारण है कि कई बार सोच-समझकर तीखी और उकसाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।

इस प्रवृत्ति ने राजनीति के स्तर को प्रभावित किया है। अब बहस इस बात पर नहीं होती कि कौन-सी नीति बेहतर है, बल्कि इस पर होती है कि किसने किसे क्या कहा।

प्रतिस्पर्धा का दबाव

असम का चुनाव इस बार कई बड़े नेताओं के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। जब चुनाव “करो या मरो” की स्थिति में पहुंच जाता है, तो भाषा की मर्यादा अक्सर सबसे पहले प्रभावित होती है। जीत की चाह में नेता हर संभव रणनीति अपनाने की कोशिश करते हैं, भले ही वह विवादास्पद ही क्यों न हो।

यह प्रवृत्ति केवल असम तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिल रही है। प्रतिस्पर्धा जितनी तीव्र होती है, बयानबाज़ी उतनी ही आक्रामक होती जाती है।

असली मुद्दों की अनदेखी

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे चुनावी शोर-शराबे में असम के असली मुद्दे पीछे छूट गए। राज्य हर साल बाढ़ की समस्या से जूझता है, बेरोजगारी एक बड़ा सवाल है, और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की आवश्यकता बनी हुई है।

चाय बागान मजदूरों की स्थिति, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर, और बुनियादी ढांचे का विकास जैसे विषय चुनावी बहस के केंद्र में होने चाहिए थे। लेकिन दुर्भाग्यवश ये मुद्दे हाशिये पर चले गए।

मतदाताओं की भूमिका

इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मतदाताओं की होती है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। मतदाता यह तय कर सकते हैं कि वे किस तरह की राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं—वह जो गाली-गलौज और विभाजन पर आधारित हो, या वह जो विकास और नीतियों पर केंद्रित हो।

यदि मतदाता मुद्दों के आधार पर वोट देते हैं, तो राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। लेकिन यदि विवादित बयानबाज़ी को ही लोकप्रियता मिलती रही, तो यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहेगी।

आगे का रास्ता

राजनीति में भाषा और मर्यादा का स्तर बनाए रखना केवल नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, राजनीतिक दल और मतदाता—सभी को मिलकर एक स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण बनाने की दिशा में काम करना होगा।

चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होता है, और इस उत्सव की गरिमा बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि बहस मुद्दों पर हो, न कि व्यक्तियों पर; और संवाद में असहमति हो, लेकिन सम्मान बना रहे।

निष्कर्ष

असम चुनाव ने एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है कि यदि समय रहते राजनीतिक संवाद के स्तर पर ध्यान नहीं दिया गया, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यह केवल एक राज्य का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक सीख है।

अब देखना यह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद क्या राजनीतिक दल इस अनुभव से कोई सबक लेते हैं या फिर भविष्य में भी यही प्रवृत्ति जारी रहती है। अंततः लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें संवाद कितना स्वस्थ, संतुलित और मर्यादित है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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