भीनमाल में सोलंकी परिवार ने निभाई ‘समंदर हिलोरा’ रस्म, लोकगीतों के साथ तालाब पहुंचे भाई-बहन
मेघवाल समाज के परिवार ने पारंपरिक विधि से किया आयोजन; जल संरक्षण और आपसी स्नेह का दिया संदेश
संवाददाता: मुकेश सोलंकी
भीनमाल। तलबी रोड स्थित उगमणावास में मेघवाल समाज के सोलंकी परिवार ने पारंपरिक ‘समंदर हिलोरा’ रस्म निभाई। परिवार की बहनें और महिलाएं राजस्थानी वेशभूषा में लोकगीत गाते हुए तालाब तक पहुंचीं। वहां भाई-बहनों ने पानी में घड़ा हिलाने की मुख्य रस्म पूरी की। इसके बाद एक-दूसरे को जल पिलाया और मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।
परिवार के सदस्यों ने इस आयोजन को भाई-बहन के स्नेह और अपनी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ने का अवसर बताया। रस्म के दौरान जलस्रोत के पास एकत्र हुए लोगों ने तालाबों की देखभाल और जल संरक्षण के महत्व का संदेश भी दिया। कार्यक्रम में सोलंकी परिवार के कई सदस्य और समाज के लोग मौजूद रहे।
लोकगीतों और ढोल-नगाड़ों के साथ पहुंचीं महिलाएं
आयोजन की शुरुआत में परिवार की महिलाएं और बहनें पारंपरिक राजस्थानी परिधान पहनकर एकत्र हुईं। ढोल-नगाड़ों के साथ उन्होंने मंगल गीत गाए। “ओ म्हारा सासूजी समंदरियों हिलोरा खाए” जैसे लोकगीतों की धुन पर सभी तालाब की ओर बढ़े।
गीत-संगीत ने आयोजन में पारिवारिक उत्सव का माहौल बनाया। बड़ी संख्या में परिजनों ने तालाब तक पहुंचकर रस्म देखी और उसमें सहभागिता की। परिवार के अनुसार, यह परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है और घर के अलग-अलग आयु वर्ग के सदस्यों को एक साथ आने का अवसर देती है।
पानी में घड़ा हिलाकर पूरी की मुख्य रस्म
तालाब के किनारे पहुंचने के बाद भाई और बहनें एक साथ पानी में उतरे। उन्होंने जल में एक मटका डालकर उसे मिलकर हिलाया। इसी क्रिया को ‘समंदर हिलोरा’ रस्म का प्रमुख हिस्सा माना जाता है।
इसके बाद भाइयों ने तालाब के जल से भरे मटके को सिर पर उठाया और बहनों को अपने हाथों से जल पिलाया। बहनों ने भी भाइयों को जल पिलाकर उनके अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान परिवार के अन्य सदस्यों ने रस्म में शामिल भाई-बहनों का उत्साह बढ़ाया।
चुनरी ओढ़ाई, उपहार देकर लिया आशीर्वाद
जल पिलाने की रस्म पूरी होने के बाद भाइयों ने बहनों को चुनरी ओढ़ाई। उन्होंने बहनों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और अपनी क्षमता के अनुसार कपड़े, गहने तथा नकद राशि उपहार के रूप में भेंट की। परिवार के लिए यह क्षण भाई-बहन के आपसी सम्मान और स्नेह की अभिव्यक्ति रहा।
सोलंकी परिवार के सदस्यों का कहना है कि ‘समंदर हिलोरा’ में जल और रिश्तों, दोनों को महत्व दिया जाता है। तालाब तक सामूहिक रूप से जाना तथा वहां विधि पूरी करना परिवार को जलस्रोत से भी जोड़ता है। इसी वजह से इस अवसर पर जल संरक्षण का संदेश दिया गया।
तालाबों से जुड़ी परंपरा को किया याद
परिवार और समाज में प्रचलित मान्यता के अनुसार, पुराने समय में तालाबों की खुदाई और सफाई जैसे कार्यों में सामूहिक श्रमदान किया जाता था। बताया जाता है कि बहनें भी तालाबों के निर्माण और गहरीकरण में सहयोग करती थीं और भाई उनके योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करते थे। वर्तमान में निभाई जा रही रस्म को इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
आयोजन में इस बात पर जोर दिया गया कि जलस्रोतों का महत्व केवल किसी रस्म तक सीमित नहीं है। तालाब स्थानीय जीवन से जुड़े होते हैं और उनकी देखभाल समाज की साझा जिम्मेदारी है। सोलंकी परिवार ने सांस्कृतिक परंपरा के साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश रखा।
परिवार के सदस्य रहे मौजूद
कार्यक्रम में दुदाराम सोलंकी, जोधाराम सोलंकी, बसनाराम सोलंकी, बिजाराम सोलंकी, पारस सोलंकी, दलाराम सोलंकी, दलितचंद सोलंकी, मोतीलाल सोलंकी, प्रताप सोलंकी, रमेश सोलंकी, दिनेश सोलंकी, जैसाराम सोलंकी, जोराराम सोलंकी, चिनाराम सोलंकी और भैराराम सोलंकी सहित परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
लोकगीतों से शुरू हुआ आयोजन भाई-बहनों की पारंपरिक रस्म और मंगलकामनाओं के साथ संपन्न हुआ। परिवार ने इसे रिश्तों को सहेजने तथा आने वाली पीढ़ी को अपनी परंपरा और जल संरक्षण के महत्व से परिचित कराने का अवसर बताया।
