*अपनों के बीच, अपनों के शादी विवाह एक अविस्मरणीय पल – एड.Dharmendra Jain*
मुरैना (मनोज जैन नायक) सामाजिक अथवा पारंपरिक शादी वह शादी है जो परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों की उपस्थिति में धार्मिक या सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के साथ होती है । सामाजिक शादियों को समाज, रिश्तेदार और परिवार की स्वीकृति मिलती है, जो भविष्य के सामाजिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण होती है।
वर्तमान में अनेकों लोगों को सलाह देते सुना, सोशल मीडिया पर भी पढ़ा कि शादी विवाह किसी मंदिर अथवा कोर्ट में करके काफी हद तक फिजूल खर्ची को रोका जा सकता है । रिश्तेदारों, शुभचिंतकों को बुलाकर, भीड़भाड़ इकट्ठी करके उन्हें खिला पिला कर फ़िजूल खर्च क्यों किया जाये । मेरी व्यक्तिगत सोच इससे थोड़ी विपरीत है ।
जैन मित्र मंडल मुरैना के संस्थापक, वरिष्ठ समाजसेवी एडवोकेट Dharmendra Jain आगे कहते है कि अगर युवा पीढ़ी ने मंदिर / कोर्ट में शादी की इस सोच को अपना लिया तो क्या आप लोगों को नहीं लगता की शादी में निभाए जाने वाले कुछ बचे हुए रीति रस्म रिवाज भी विलुप्त हो जाएँगे । शादी कोई समझौता या मजबूरी नहीं हैं, बल्कि ये तो दो परिवारों का मधुर मिलन हैं । यदि शादियां मंदिर अथवा कोर्ट में होने लगी तो शादी सिर्फ़ माँ बाप और चंद दोस्तों के बीच सीमित रह जाएगी । तब हमारी बुआ, मौसी, मामा, बहन वाली रस्मों को निभाने की ज़हमत कौन उठाएगा ।
आज के दौर में बड़े बूढ़ों और दूर दूर के रिश्तेदारों को मिलने का सिर्फ़ एक ही ज़रिया है, वो है शादी विवाह । अधिकतर दूर के रिश्तेदारों को तो हम कई दफ़ा पहली बार किसी की शादी में ही मिले होते हैं और हमारे समय के सैकड़ों रिश्ते एक दूसरे को किसी रिश्तेदार की शादी में देख के ही जुड़े हैं ।

मंदिर में या कोर्ट में शादी करने की यह संक्रीण मानसिकता हमारी युवा पीढ़ी को हमारी संस्कृति, हमारी परम्पराओं, हमारे रीति रिवाजों से और दूर ले जाएगी और हमारे बच्चे बेमेल प्रेम विवाह की और चले जायेगें । बाक़ी युवा पीढ़ी बाद में दोस्तों के साथ पार्टी में पैसा बहाने से कोई गुरेज़ नहीं करेगी । एक बार अपने समय को याद करें कि अगर ये रिश्तेदार नहीं होते तो क्या आपकी शादी इतनी यादगार होती कि आज भी हम सबके साथ बैठे अपनी शादी के वीडीयो फोटो देखते हैं, संस्मरण सुनाते हैं, अनेकों चर्चाए करते हैं । मेरे हिसाब से दहेज को ना बोलना चाहिए और दिखावे में कटोती की जानी चाहिए
जहा तक शादी विवाह में खर्चे की बात है वो दोनों पक्षों को मिलकर उठाना चाहिए और दूर दूर के रिश्तेदारों को आमंत्रित कर युवा पीढ़ी से परिचित करवाना चाहिए जिससे वो परिवार के महत्व और गौरव को समझ सकें ।
समाज, रिश्तेदारों एवं अपने के मध्य शादी करने से दोनों पक्षों को भावनात्मक सुरक्षा, सांस्कृतिक समानता और मजबूत पारिवारिक सहयोग मिलता है। इससे उत्सवों और रीति-रिवाजों में एकरूपता रहती है, जो दाम्पत्य जीवन को सरल और सुखद बनाने में मदद करती है। अपनों की उपस्थिति में शादी विवाह करने से सांस्कृतिक और धार्मिक माहौल मिलता है ।
समान पृष्ठभूमि होने के कारण खान-पान, रहन-सहन और रीति-रिवाजों को लेकर तालमेल बिठाना आसान हो जाता है। समाज या परिवार के मध्य होने वाली शादियों में बड़ों का आशीर्वाद और संकट के समय पूरा समाज, रिश्तेदार एवं परिवार कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ा रहता है। नव दंपत्ति को अपनी मूल संस्कृति और मूल्यों को समझने में आसानी होती है, जिससे उनकी पहचान मजबूत होती है।
विवाह, सामाजिक और पारिवारिक जीवन को मजबूती प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अपने समुदाय में अथवा अपनों के बीच शादी करने के कई और भी व्यावहारिक लाभ होते हैं, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिलती है । सामाजिक रूप से स्वीकृत विवाह में रिश्तेदारों का व्यापक सहयोग मिलता है, जो भावी जीवन में आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करता है। चूँकि दोनों परिवार एक ही सामाजिक परिवेश से आते हैं, इसलिए विवाह के बाद के अनुष्ठानों और मेल-मिलाप में कोई असहजता नहीं होती। दो परिवारों के बीच समझ और आपसी संबंध अधिक प्रगाढ़ होते हैं।
“समुदाय एवं अपनों के बीच विवाह करने पर धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों में एकरूपता होती है। इससे विवाह के बाद होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक कार्यक्रमों में दोनों परिवारों को एक साथ मिलकर भाग लेने में आसानी होती है। यह एकरूपता नवविवाहित जोड़े के जीवन को सरल व सहज बनाती है ।
*भाव लेखक*
धर्मेंद्र जैन एडवोकेट, मुरैना
