—Advertisement—

मुरैना में आचार्यश्री उदारसागर का प्रेरक संदेश, बोले- परिस्थितियां नहीं, खुद को बदलें

Author Picture
Published On: 23 August 2026
WhatsApp Image 2026 08 23 at 2.58.01 PM 1

—Advertisement—

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने मुरैना में रविवारीय प्रवचन के दौरान सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्मकल्याण, सद्गुरु के मार्गदर्शन और विपरीत परिस्थितियों में समभाव रखने का संदेश दिया।

रिपोर्टर: मनोज जैन नायक, मुरैना

मुरैना। आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने अपने रविवारीय प्रवचन में कहा कि भविष्य की पूर्व-तैयारी और सद्गुरु का मार्गदर्शन जीवन को सही दिशा देने के लिए आवश्यक है। मनुष्य यदि वर्तमान में रहते हुए अपने भविष्य और आध्यात्मिक जीवन की तैयारी कर ले, तो आने वाली परिस्थितियां उसके लिए भय का कारण नहीं बनतीं।

WhatsApp Image 2026 08 23 at 2.58.01 PM

परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक राजा सदैव दुखी और उदास रहता था। राजभवन के सभी लोग उसके दुःख से चिंतित थे। जब राजा ने एक संत के समक्ष अपनी व्यथा रखी तो बताया कि राजा के रूप में उसका शासन सीमित अवधि का है। अवधि पूरी होने के बाद उसे एक सुनसान और घने जंगल में अकेला छोड़ दिया जाएगा।

संत ने उसे समझाया कि यदि अंत में उसी जंगल में जाना है, तो अभी से उसकी तैयारी क्यों नहीं करते? राज्यपद समाप्त होने से पहले ही जंगल में एक सुंदर महल बनवा लो, ताकि वहां पहुंचने के बाद तुम्हारा जीवन सुखपूर्वक बीत सके।

आचार्यश्री ने कहा कि इस प्रसंग का वास्तविक अर्थ हमारे आध्यात्मिक जीवन से जुड़ा है। मनुष्य संसार में रहते हुए अपने भावी जीवन की तैयारी तो करता है, लेकिन आत्मा के कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान की तैयारी को भूल जाता है। शरीर, धन और सांसारिक सुविधाओं के लिए हम वर्षों पहले से योजना बनाते हैं, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव के लिए क्या तैयारी की है, इस पर चिंतन नहीं करते। सद्गुरु का मार्गदर्शन लेकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना ही सच्ची दूरदर्शिता है।

WhatsApp Image 2026 08 23 at 2.58.02 PM

जैसा दृष्टिकोण, वैसा जीवन — आचार्यश्री उदारसागर महाराज

आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य वास्तव में अपनी दृष्टि और विचारों से अपने जीवन को आकार देता है। उन्होंने आधे गिलास दूध का उदाहरण देते हुए कहा कि दो बालकों को आधा-आधा गिलास दूध दिया गया। एक ने कहा, “गिलास आधा भरा है”, जबकि दूसरे ने कहा, “गिलास आधा खाली है।” दोनों के सामने परिस्थिति एक ही थी, लेकिन देखने का नजरिया अलग था।

उन्होंने कहा कि सुख-दुःख केवल परिस्थितियों से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के प्रति हमारी सोच से पैदा होते हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कठिनाई में भी अवसर खोज लेता है, जबकि नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सुविधा में भी कमी तलाशता रहता है।

परिस्थिति नहीं, स्वयं को बदलें

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि जीवन में जब कोई समस्या आती है तो हम परिस्थितियों, लोगों और दूसरों के व्यवहार को बदलना चाहते हैं। लेकिन सच्चा परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर से शुरू होता है। यदि विचार, दृष्टिकोण और स्वभाव नहीं बदलेंगे तो परिस्थितियां बदल जाने के बाद भी मनुष्य अशांत ही रहेगा।

रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि केवल बाहरी परिस्थितियों को बदल देने से किसी व्यक्ति में योग्यता और धर्म का भाव पैदा नहीं किया जा सकता। सच्चा नेतृत्व और सम्मान बाहरी पद से नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों से प्राप्त होता है।

विपरीत परिस्थितियों में समभाव रखें

आचार्यश्री ने महान दार्शनिक सुकरात का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सुकरात अपने मित्र के साथ बातचीत में व्यस्त थे। उनकी पत्नी ने आवाज दी, लेकिन चर्चा में लीन होने के कारण वे सुन नहीं सके। इससे नाराज होकर पत्नी ने गर्म चाय उन पर डाल दी। ऐसी स्थिति में भी सुकरात क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि कोई बात नहीं, आधा चेहरा तो बच गया।

आचार्यश्री ने कहा कि यह प्रसंग हमें धैर्य, सहनशीलता और समभाव का संदेश देता है। सामान्य व्यक्ति छोटी-सी बात पर अपना संतुलन खो देता है, जबकि ज्ञानी व्यक्ति बड़ी विपरीत परिस्थिति में भी अपने मन को शांत रखता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुकूल रहें, यह संभव नहीं है। कभी सुख आएगा तो कभी दुःख, कभी सम्मान मिलेगा तो कभी अपमान भी सहना पड़ेगा। लेकिन इन परिस्थितियों के बीच हमारा मन कितना स्थिर रहता है, यही हमारे व्यक्तित्व की वास्तविक परीक्षा है।

अपने विचारों और भावों के स्वामी बनें

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि हम परिस्थितियों के गुलाम नहीं, बल्कि अपने विचारों और भावों के स्वामी बन सकते हैं। इसलिए दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलने का प्रयास करें। अपनी दृष्टि सकारात्मक बनाएं, सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलें, भविष्य के आत्मकल्याण की तैयारी करें और विपरीत परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखें।

उन्होंने कहा कि सच्चा सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि निर्मल मन, सही दृष्टिकोण और आत्मिक शांति में है। जो व्यक्ति स्वयं को बदलना सीख जाता है, उसके लिए परिस्थितियां भी साधना का माध्यम बन जाती हैं।

 

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp