आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज का 32वां समाधि दिवस श्रद्धा और स्मरण के साथ मनाया गया
इंदौर | विशेष रिपोर्ट
श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ संत, वात्सल्य रत्नाकर और निमित्तज्ञानी आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज का 32वां समाधि दिवस मंगलवार को इंदौर के दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय, छत्रपति नगर में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु, साध्वीजन और धर्मप्रेमी उपस्थित रहे। पूरे परिसर में भक्ति, करुणा और आत्मचिंतन का वातावरण व्याप्त रहा।
आचार्य विमलसागरजी: करुणा और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति
गणिणी आर्यिका श्री यशस्विनी माताजी ने समाधि दिवस के अवसर पर आचार्य श्री का पुण्य स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य विमलसागरजी महाराज प्राणी मात्र के प्रति करुणा, उदारता और लोककल्याण की भावना से ओतप्रोत संत थे। वे केवल एक महान तपस्वी ही नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने अपने जीवन से धर्म, संयम और सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया।
माताजी ने कहा कि आचार्य श्री निमित्तज्ञानी संत थे। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण समाज और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित रहा। उनके हृदय में सभी जीवों के प्रति समान करुणा थी और वे सदैव अहिंसा, सत्य और संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।
अनुशासन और तपस्या का अनुपम उदाहरण
आर्यिका यशस्विनी माताजी ने बताया कि आचार्य विमलसागरजी अनुशासनप्रिय और महान तपस्वी थे। उन्होंने अपने साधनारत जीवन में 6000 से अधिक उपवास किए, जो उनके अद्भुत आत्मसंयम और तपश्चर्या का प्रमाण है। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व अतिशय करुणा, वात्सल्य और त्याग से परिपूर्ण था।
उनकी तपस्या केवल आत्मकल्याण तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज को दिशा देने वाली थी। वे मानते थे कि तप और साधना का वास्तविक उद्देश्य आत्मशुद्धि के साथ-साथ लोककल्याण होना चाहिए।
बचपन से ही धर्म और णमोकार मंत्र में आस्था
माताजी ने अपने प्रवचन में बताया कि आचार्य विमलसागरजी को बचपन से ही जैन धर्म और णमोकार मंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा थी। बाल्यावस्था में ही उनमें वैराग्य और आत्मचिंतन के संस्कार विकसित हो गए थे। यही कारण था कि आगे चलकर उन्होंने श्रमण संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका मानना था कि णमोकार मंत्र केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और जीवन की दिशा बदलने वाला महामंत्र है। उन्होंने हजारों श्रद्धालुओं को इस मंत्र की साधना से जोड़कर आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर किया।
बहुआयामी व्यक्तित्व: संत, विद्वान और चिकित्सक
आचार्य विमलसागरजी महाराज का व्यक्तित्व अत्यंत बहुआयामी था। वे सिद्ध पुरुष होने के साथ-साथ वास्तुविद, प्रतिष्ठाचार्य और आयुर्वेद के ज्ञाता भी थे। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने ज्ञान और साधना के माध्यम से हजारों लोगों के शारीरिक और मानसिक कष्टों को दूर किया।
मंत्र-साधना और सिद्धियों के माध्यम से उन्होंने अनेक लोगों को रोग, पीड़ा और संकट से मुक्ति दिलाई। यही कारण है कि जैन समाज ही नहीं, बल्कि अन्य समाजों के लोग भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे।
जैन धर्म की प्रभावना में अतुलनीय योगदान
आचार्य विमलसागरजी महाराज ने अपने जीवनकाल में जैन धर्म की प्रभावना के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में धर्म प्रचार, प्रतिष्ठा महोत्सव और साधना शिविरों के माध्यम से अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दिया।
उनके प्रयासों से जैन धर्म के सिद्धांत समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन समाज आचार्य श्री के उपकारों को कभी नहीं भूल सकता। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
श्रद्धांजलि सभा में संतों और समाजजनों के उद्गार
इस पावन अवसर पर आर्यिका श्री मनस्विनी माताजी, प्रद्युम्न पाटनी और भूपेंद्र जैन ने भी आचार्य विमलसागरजी के जीवन से जुड़े संस्मरण साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि आचार्य श्री का जीवन त्याग, तप और करुणा की जीवंत मिसाल है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे आचार्य श्री के आदर्शों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारें।
read also : श्री सादड़ी Jain संघ का तीन दिवसीय स्नेह सम्मेलन 27 से 29 दिसंबर तक
दीप प्रज्वलन से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
समाधि दिवस कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य विमलसागरजी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ. जैनेंद्र जैन, नीलेश जैन, अतुल जैन, श्रीमती रजनी जैन और सरिता जैन ने दीप प्रज्वलित कर श्रद्धा अर्पित की।
पूरे जिनालय परिसर में भक्ति संगीत और मंगल पाठ से आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो गया।
धर्मसभा का संचालन और समापन संदेश
धर्मसभा का संचालन श्रीमती सोनाली बागड़िया ने किया। उन्होंने पूरे कार्यक्रम को सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाते हुए वक्ताओं के विचारों को श्रद्धालुओं तक पहुंचाया।
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य विमलसागरजी महाराज के चरणों में भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके दिखाए मार्ग—अहिंसा, करुणा, संयम और आत्मकल्याण—पर चलने का संकल्प लिया।
समाधि दिवस का संदेश
आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज का समाधि दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और जीवन सुधार का संदेश है। उनका जीवन यह सिखाता है कि तप, त्याग और करुणा के माध्यम से न केवल स्वयं का, बल्कि पूरे समाज का कल्याण किया जा सकता है।
उनकी स्मृति जैन समाज के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को धर्म, संयम और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहेगी।
