मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए संयम साधना आवश्यक: आचार्यश्री उदारसागर — दैनिक स्वराज वाणी
धर्मसभा में आचार्यश्री ने मन, वचन, काय और इंद्रियों पर नियंत्रण को बताया आत्मकल्याण का आधार; मुनिश्री उपशांत सागर ने दिया आत्मचिंतन का संदेश
मनोज जैन नायक
मुरैना नगर में चातुर्मासरत आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन में संयम साधना का विशेष महत्व है। संयमित जीवन व्यक्ति के आचरण, व्यवहार और विचारों को निर्मल बनाता है। इसके विपरीत असंयम मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। धार्मिक क्रियाएं और अनुष्ठान तभी सार्थक होते हैं, जब उनके साथ आत्मसंयम और निर्मल भाव भी जुड़े हों।
आचार्यश्री ने कहा कि संयम का वास्तविक अर्थ मन, वचन, काय और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए आत्मा को विकारों से बचाना है। केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएं करने या आडंबर अपनाने से आत्मकल्याण नहीं हो सकता। इसके लिए क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों पर विजय पाने का निरंतर प्रयास जरूरी है। संयम साधना व्यक्ति को धैर्यवान, विवेकशील और आत्मानुशासित बनाती है। इससे जीवन में शांति, संतुलन और सदाचार का विकास होता है।
सम्यक चारित्र का आधार है संयम
आचार्यश्री ने जैन दर्शन में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मोक्ष प्राप्ति के लिए इन तीनों का विशेष स्थान है और संयम साधना सम्यक चारित्र का आधार है। जब मनुष्य इच्छाओं और विषय-वासनाओं पर नियंत्रण रखते हुए आत्मस्वरूप की ओर बढ़ता है, तभी उसकी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है।
उन्होंने कहा कि संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धत्व प्राप्त करने के लिए संयम को जीवन में अंगीकार करना आवश्यक है। आत्मा को विकारों से बचाने और अपने भीतर की शुद्धता को पहचानने का प्रयास ही साधना का मूल भाव है। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं से उन्होंने संयमित जीवन अपनाने और धार्मिक शिक्षाओं को आचरण में उतारने की प्रेरणा दी।
संयम से मिलता है आत्मकल्याण का मार्ग: मुनिश्री उपशांत सागर
मुनिश्री 108 उपशांत सागर महाराज ने धर्मोपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में संयम का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इच्छाओं के पीछे लगातार भागने वाला व्यक्ति वास्तविक संतोष प्राप्त नहीं कर सकता। इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मचिंतन की ओर प्रवृत्त करना ही सच्ची साधना है। संयम केवल त्याग का नाम नहीं, बल्कि विवेकपूर्वक जीवन जीने और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का माध्यम है।
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध के समय क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, छल के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष अपनाना संयमित जीवन की पहचान है। जो व्यक्ति अपनी भावनाओं और प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करना सीख लेता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी विवेक बनाए रख सकता है। जैन धर्म की शिक्षाएं बाहरी संसार में उलझने के बजाय अपने भीतर झांकने और आत्मशुद्धि का प्रयास करने की प्रेरणा देती हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्मसभा में सुने गए उपदेशों को दैनिक जीवन में उतारने का आह्वान किया। मुनिश्री के अनुसार संयम, सदाचार और आत्मचिंतन अपनाकर ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है और मोक्षमार्ग की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।
मंगलाचरण के साथ धर्मसभा का शुभारंभ
धर्मसभा से पहले श्रावक श्रेष्ठियों ने श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा और नित्यमह पूजन किया। नन्ही बालिकाओं ने भक्तिमय भजनों के माध्यम से मंगलाचरण प्रस्तुत किया। समाज के गणमान्य बंधुओं ने आचार्यश्री अभिनंदन सागर महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलित किया। धर्मसभा का संचालन रविंद्र जैन ने किया।
प्रश्नमंच, लकी ड्रॉ और महाआरती में शामिल हो रहे श्रद्धालु
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन संध्याकालीन सभा में डॉ. मनोज जैन के संचालन में धार्मिक प्रश्नमंच आयोजित किया जाता है। प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों को आकर्षक उपहार दिए जाते हैं। इसके साथ ही लकी ड्रॉ के माध्यम से एक उत्तरदाता का नाम चुना जाता है। चयनित श्रद्धालु को श्री सम्मेदशिखरजी तीर्थ की वंदना के लिए रेलवे की स्लीपर श्रेणी का टिकट प्रदान किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, अब तक करीब 50 लोगों को इस योजना का लाभ मिल चुका है।
प्रश्नमंच के बाद गुरु भक्ति और महाआरती का आयोजन होता है। इन धार्मिक कार्यक्रमों में जैन समाज के लोग बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। धर्मसभा, प्रश्नमंच और आरती के माध्यम से श्रद्धालु धार्मिक शिक्षाओं से जुड़ रहे हैं और सामूहिक रूप से पुण्यार्जन कर रहे हैं।
