आचार्य सुनील सागर संगोष्ठी में Indore में आयोजित त्रिदिवसीय कार्यक्रम के तीसरे सत्र में जैन धर्म, प्राकृत भाषा, जीव दया, अहिंसा और सेवा परोपकार पर महत्वपूर्ण विचार रखे गए। पढ़ें पूरी खबर।
आचार्य सुनील सागर संगोष्ठी: संस्कृति, सभ्यता, सेवा और जीव दया का संवाहक है जैन धर्म, प्राकृत भाषा अपनाने का आह्वान
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू Indore
Indore में आचार्य सुनील सागर संगोष्ठी के तीसरे सत्र में जैन धर्म की संस्कृति, सभ्यता, सेवा, परोपकार, जीव दया और अहिंसा की गौरवशाली परंपरा पर विस्तृत चर्चा हुई। श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “कालजयी विरासत, समकालीन विमर्श और स्वर्णिम भविष्य की रूपरेखा” का तृतीय सत्र सोमवार को आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ससंघ के परम सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता डॉ. नलिन के. शास्त्री (नई दिल्ली) ने प्राकृत भाषा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारभूत भाषा है। संगोष्ठी में अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर जी महाराज, मुनि श्री संबुद्धि सागर जी, आचार्य विप्रणीत सागर महाराज सहित आचार्य संघ एवं आर्यिका संघ की गरिमामयी उपस्थिति रही।
जैन धर्म जन धर्म भी है : आचार्य श्री सुनील सागर
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने कहा कि प्राकृत प्रकृति की भाषा है। इसे आम बोलचाल, अध्ययन, लेखन और व्यवहार में अपनाने के लिए सभी समाजजनों को आगे आना चाहिए।उन्होंने कहा कि जैन धर्म केवल किसी एक समाज का धर्म नहीं बल्कि जन-जन का धर्म है। यह संस्कृति, सभ्यता, सेवा, परोपकार, जीव दया और अहिंसा का संवाहक है। प्रत्येक व्यक्ति को देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा रखते हुए आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर प्रयास करना चाहिए।
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ शुभारंभ
सत्र का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन एवं चित्र अनावरण के साथ हुआ। मंगलाचरण रश्मि जैन (जबलपुर) ने प्रस्तुत किया।मांगलिक पाद प्रक्षालन आजाद जैन एवं अमित जैन बीड़ी वाला परिवार द्वारा किया गया जबकि मांगलिक शास्त्र भेंट मुकेश पाटोदी परिवार ने अर्पित की। कार्यक्रम का सफल संचालन हसमुख गांधी ने किया।इस अवसर पर पार्षद पंखुड़ी जैन ने आचार्य श्री को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
हाटपिपल्या से आए भैया जी का कैश लोच
संगोष्ठी के दौरान हाटपिपल्या से आए भैया जी का कैश लोच भी सम्पन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
देशभर के विश्वविद्यालयों की अकादमिक सहभागिता
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों का अकादमिक सहयोग प्राप्त हुआ।इनमें प्रमुख रूप से—
- देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, Indore
- एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह
- तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश)
- एस.ए. विश्वविद्यालय, नवादा (बिहार)
- श्री गोविंदराम सेक्सरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, इंदौर
- बाहुबली प्राकृत विद्यापीठ, श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)
शामिल रहे।
प्राकृत नाटिका ने किया आकर्षित
कार्यक्रम में “पागदं पगिदि-भासा” नामक प्राकृत नाटिका का मंचन किया गया।इस प्रस्तुति में सोनाली जैन, सीमा काला, अपूर्वा जैन एवं सविता जैन ने प्रभावशाली अभिनय किया।इसके अतिरिक्त कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की शोध छात्रा कुमारी श्रिया अग्रवाल ने “भू-वलय और प्राकृत भाषा” विषय पर अपना शोधपरक अभिमत प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर श्री दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट से अमित कासलीवाल, इंद्र सेठी (नेमिनगर), सुशील कासलीवाल, आदित्य कासलीवाल, लोकेश कासलीवाल, ब्रह्मचारी अनिल कुमार जैन एवं ब्रह्मचारी सुनील भैया उपस्थित रहे।दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन से मनोहर झांझरी, टी.के. वेद एवं प्रदीप चौधरी शामिल हुए।दिगम्बर जैन श्राविकाश्रम समवशरण मंदिर ट्रस्ट की अध्यक्ष पुष्पा कासलीवाल, शरद सेठी, दिगम्बर जैन तुकोगंज जैन समाज के अध्यक्ष सुमत लुहाड़िया, हसमुख गांधी, कीर्ति पांड्या, रीतेश पाटनी, ऋषभ कुमार जैन, संजय पापड़ीवाल एवं रेखा संजय जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
निष्कर्ष
Indore संगोष्ठी के तीसरे सत्र में आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने प्राकृत भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का संदेश देते हुए जैन धर्म के मूल सिद्धांतों—अहिंसा, जीव दया, सेवा, परोपकार और संस्कृति—को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। विद्वानों, संतों और शिक्षाविदों की सहभागिता ने कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर की अकादमिक गरिमा प्रदान की।

