वन अधिकार दावों की पुनः जांच और बेदखली रोकने की मांग, आदिवासी परिवारों ने कलेक्ट्रेट में सौंपा आवेदन
महेश्वर। खरगोन जिले के आदिवासी अंचलों में वन अधिकार दावों के निरस्त होने और बेदखली की कार्रवाई के विरोध में मंगलवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण कलेक्ट्रेट पहुंचे। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के बैनर तले पहुंचे प्रभावित परिवारों और कार्यकर्ताओं ने वन अधिकार दावों की निष्पक्ष पुनः जांच कराने तथा जांच पूरी होने तक बेदखली की कार्रवाई रोकने की मांग की। जयस प्रदेश अध्यक्ष भीम सिंह गिरवाल और महेश्वर तहसील अध्यक्ष जितेन्द्र बारिया के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर गुरु प्रसाद और सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग, कविता आर्य को आवेदन सौंपा।
गुजर मोहना, बागदरा और सिरसिया के दावों का मुद्दा
आवेदन में बताया गया कि महेश्वर तहसील की ग्राम पंचायत गुजर मोहना, बागदरा और सिरसिया सहित जिले के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकार के कई दावे निरस्त हुए हैं। जयस पदाधिकारियों के अनुसार, इससे अनेक आदिवासी परिवारों के सामने अपने पारंपरिक निवास और आजीविका को लेकर चिंता पैदा हो गई है। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों के दावों और उनसे जुड़े दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा की जानी चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन से निरस्त दावों के कारणों और उपलब्ध अभिलेखों की दोबारा जांच कराने की मांग की। उनका कहना था कि प्रत्येक दावे का परीक्षण संबंधित परिवार के दस्तावेजों और ग्रामसभा की भूमिका को ध्यान में रखकर किया जाए। जयस नेताओं ने यह भी मांग रखी कि जिन परिवारों के दावे निरस्त हुए हैं, उन्हें फैसले और उसके आधार की जानकारी दी जाए, ताकि वे अपनी बात और जरूरी प्रमाण अधिकारियों के सामने रख सकें।
बेदखली पर रोक लगाने की मांग
आवेदन में कहा गया कि दावों की पुनः जांच और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभावित परिवारों के विरुद्ध बेदखली की कार्रवाई स्थगित रखी जाए। जयस पदाधिकारियों ने प्रशासन से राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों के समन्वय से प्रभावित क्षेत्रों का निष्पक्ष भौतिक सत्यापन कराने का आग्रह किया। उनका कहना था कि इससे दावों से संबंधित स्थल, अभिलेख और ग्रामीणों द्वारा प्रस्तुत जानकारी का मिलान किया जा सकेगा।
प्रतिनिधिमंडल ने यह भी कहा कि प्रक्रिया में ग्रामसभाओं की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। आवेदन के अनुसार, ग्रामसभा को स्थानीय परिस्थितियों और दावेदार परिवारों की जानकारी होती है, इसलिए दावों की समीक्षा और सत्यापन के दौरान उसकी भूमिका को शामिल करना जरूरी है। जयस की मांग है कि जांच में पात्र पाए जाने वाले वन निवासियों को वन अधिकार पत्र देने की प्रक्रिया भी शीघ्र पूरी की जाए।
वन अधिकार अधिनियम का दिया हवाला
जयस प्रदेश अध्यक्ष भीम सिंह गिरवाल ने आवेदन में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) का हवाला दिया। इस प्रावधान में कहा गया है कि वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी पात्र वन निवासी को उसके कब्जे वाली वन भूमि से बेदखल या हटाया नहीं जाना चाहिए।
गिरवाल ने सुप्रीम कोर्ट के ‘वाइल्डलाइफ फर्स्ट’ प्रकरण का भी उल्लेख करते हुए दावों के निरस्तीकरण और बेदखली से जुड़ी प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा की मांग की। इस मामले में फरवरी 2019 में वन अधिकार दावे खारिज हुए लोगों को बेदखल करने से संबंधित आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रोक लगाई थी। जयस ने प्रशासन से आग्रह किया कि मौजूदा मामलों में कानून और संबंधित न्यायिक आदेशों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई की जाए।
प्रशासन से समन्वित जांच कराने का आग्रह
ज्ञापन में जयस की ओर से प्रभावित परिवारों के दावों से संबंधित दस्तावेजों और निरस्तीकरण के कारणों की समीक्षा, राजस्व एवं वन विभाग के संयुक्त समन्वय से स्थल सत्यापन और ग्रामसभा की सहभागिता सुनिश्चित करने की मांग रखी गई। संगठन ने कहा कि जांच के दौरान परिवारों को अपना पक्ष रखने और जरूरी अभिलेख प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए। पात्रता की पुष्टि होने पर संबंधित परिवारों को वन अधिकार पत्र देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
कलेक्ट्रेट पहुंचे ग्रामीणों ने कहा कि उनकी मांग दावों की निष्पक्ष जांच और प्रभावित परिवारों को नियमानुसार सुनवाई का अवसर देने से जुड़ी है। उन्होंने प्रशासन से मामले को प्राथमिकता से देखने और परिवारों की स्थिति स्पष्ट होने तक बेदखली की कार्रवाई रोकने का अनुरोध किया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्रभावित ग्रामीण और जयस कार्यकर्ता मौजूद रहे। प्रतिनिधिमंडल ने अधिकारियों को आवेदन सौंपकर मांगों पर आवश्यक कार्रवाई करने का आग्रह किया। आवेदन पर प्रशासन की ओर से आगे की कार्रवाई या जांच की समयसीमा के संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
