चंदेरी में सीताफल के पुराने पेड़ों और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण पर उठे सवाल। बढ़ते निर्माण, कथित अतिक्रमण और प्रशासनिक जांच की मांग पर विशेष रिपोर्ट।
चंदेरी की बाउंड्री पर कभी थी सीताफल की मिठास, आज बढ़ते कंक्रीट के जंगल ने खड़े किए सवाल
ऐतिहासिक नगरी की प्राकृतिक विरासत पर मंडराता संकट, पुराने फलदार वृक्षों की स्थिति और कथित अतिक्रमण की निष्पक्ष जांच की उठी मांग
दैनिक स्वराज वाणी | डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, विशेष संवाददाता, चंदेरी
चंदेरी (अशोकनगर)। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी चंदेरी अपनी प्राचीन विरासत, भव्य किले, विश्व प्रसिद्ध साड़ियों और सांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है। लेकिन इस शहर की एक और पहचान रही है, जिसे आज संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वह पहचान है चंदेरी के सीताफल और यहां के पुराने फलदार वृक्षों की।
स्थानीय बुजुर्गों की स्मृतियों के अनुसार, कभी चंदेरी की बाउंड्री और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सीताफल के पेड़ हुआ करते थे। मौसम आने पर इन पेड़ों पर लगने वाले मीठे फल स्थानीय लोगों के जीवन और क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान का हिस्सा थे। लेकिन बदलते समय, बढ़ते शहरीकरण और निर्माण गतिविधियों के बीच इन पेड़ों के अस्तित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
जहां कभी सीताफल के पेड़ थे, वहां बढ़ते निर्माण पर सवाल
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि चंदेरी की बाउंड्री और आसपास के कुछ क्षेत्रों में पहले मौजूद फलदार वृक्षों की जगह अब निर्माण दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि, इन स्थानों पर निर्माण की वैधानिक स्थिति, जमीन के स्वामित्व और पेड़ों की वास्तविक संख्या का आधिकारिक सत्यापन आवश्यक है।
सवाल यह है कि क्या शहर के विस्तार के दौरान पुराने फलदार वृक्षों के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया गया? क्या निर्माण गतिविधियों के लिए आवश्यक अनुमतियां ली गईं और क्या भूमि उपयोग संबंधी नियमों का पालन हुआ?
इन प्रश्नों के उत्तर के लिए राजस्व अभिलेखों, नगर पालिका के रिकॉर्ड और संबंधित विभागों की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
एक हजार वर्ष पुरानी विरासत का दावा, ऐतिहासिक प्रमाणों की जरूरत
चंदेरी के सीताफल की परंपरा को स्थानीय स्तर पर लगभग एक हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक अभिलेखों और वनस्पति संबंधी अध्ययन की आवश्यकता है।
इसके बावजूद चंदेरी के सीताफल का स्थानीय सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व कम नहीं होता।
फलदार वृक्ष न केवल स्थानीय जैव विविधता का हिस्सा होते हैं, बल्कि पक्षियों को आश्रय, लोगों को छाया और ग्रामीण परिवारों को मौसमी आय के अवसर भी प्रदान करते हैं।
यदि पुराने सीताफल के वृक्ष लगातार कम हो रहे हैं, तो उनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और पुनः पौधरोपण की पहल आवश्यक है।
कथित अतिक्रमण और निर्माणों की जांच क्यों जरूरी?
चंदेरी में भूमि उपयोग और पुराने वृक्षों की स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रशासनिक जांच की आवश्यकता सामने आती है।
यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जिन स्थानों पर पहले सीताफल के वृक्ष होने की बात कही जा रही है, वहां वर्तमान में किस प्रकार के निर्माण मौजूद हैं।
साथ ही यह भी जांच का विषय है कि संबंधित भूमि निजी स्वामित्व की है, सरकारी है या किसी अन्य श्रेणी में आती है।
यदि किसी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा अथवा नियमों के विरुद्ध निर्माण पाया जाता है, तो संबंधित प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
बिना जांच किसी निर्माण को अवैध या किसी व्यक्ति को अतिक्रमणकर्ता ठहराना उचित नहीं होगा। इसलिए निष्पक्ष जांच और दस्तावेजी सत्यापन जरूरी है।
विकास के साथ प्राकृतिक विरासत का संरक्षण भी जरूरी
चंदेरी में सड़क, बाजार, आवास और अन्य सुविधाओं का विस्तार आवश्यक है, लेकिन विकास की योजनाओं में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी प्राथमिकता होनी चाहिए।
किसी भी ऐतिहासिक शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि वहां के पर्यावरण, स्थानीय उत्पादों और प्राकृतिक विशेषताओं से भी बनती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने वृक्षों का संरक्षण शहरी तापमान नियंत्रित करने, जैव विविधता बनाए रखने और पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।
चंदेरी जैसे ऐतिहासिक नगर में स्थानीय फलदार वृक्षों का संरक्षण पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
प्रशासन के सामने पांच महत्वपूर्ण सवाल
चंदेरी की बाउंड्री और आसपास के क्षेत्रों में पुराने सीताफल वृक्षों का कोई सर्वेक्षण हुआ है या नहीं?
जिन स्थानों पर पहले फलदार वृक्ष होने की जानकारी मिलती है, वहां वर्तमान भूमि उपयोग की स्थिति क्या है?
क्या संबंधित निर्माणों के लिए आवश्यक अनुमति ली गई है?
यदि किसी स्थान पर अवैध कटाई या अतिक्रमण की शिकायत है, तो उस पर क्या कार्रवाई की गई?
सीताफल के पुराने वृक्षों और स्थानीय प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के लिए क्या कार्ययोजना बनाई जाएगी?
सीताफल संरक्षण अभियान शुरू करने की आवश्यकता
चंदेरी में सीताफल की प्राकृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए नगर पालिका, वन विभाग, राजस्व विभाग और सामाजिक संगठनों को संयुक्त पहल करनी चाहिए।
सबसे पहले पुराने सीताफल वृक्षों का सर्वेक्षण कराया जाए। इसके बाद उपलब्ध स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पौधरोपण किया जाए।
पौधे लगाने के साथ उनकी नियमित देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
यदि स्थानीय सीताफल की कोई विशिष्ट किस्म या पारंपरिक पहचान प्रमाणित होती है, तो उसके संरक्षण और प्रचार के लिए विशेष योजना भी बनाई जा सकती है।
क्या आने वाली पीढ़ियां केवल कहानियों में जानेंगी चंदेरी के सीताफल को?
चंदेरी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या आने वाली पीढ़ियों को इस क्षेत्र के पुराने सीताफल वृक्ष देखने और उनके फल का स्वाद चखने का अवसर मिलेगा, या यह पहचान केवल बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह जाएगी?
विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज की आवश्यकता है।
चंदेरी की ऐतिहासिक पहचान के साथ उसकी प्राकृतिक विरासत को बचाना भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए प्रशासनिक पारदर्शिता, स्थानीय सहभागिता और ठोस संरक्षण योजना की जरूरत है।
क्योंकि सीताफल के पेड़ केवल फल नहीं देते, बल्कि किसी शहर को उसकी मिट्टी, स्मृतियों और प्राकृतिक पहचान से जोड़ते हैं।


