मृत्यु का स्मरण जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है: आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा आयोजित, मुनिश्री उपशांतसागर ने कहा—धन-दौलत और परिवार स्थायी नहीं, श्रेष्ठ कर्म ही आत्मकल्याण का आधार
Morena। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना में वर्षायोग के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज और मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, सदाचार और आत्मचिंतन का महत्व बताया। आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि मृत्यु का स्मरण मनुष्य को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने और सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के लिए आवश्यक है। मनुष्य को विवेक के साथ जीवन जीते हुए अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
आत्मकल्याण ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य सांसारिक गतिविधियों, भौतिक सुख-सुविधाओं और उपलब्धियों को प्राप्त करने में इतना व्यस्त हो जाता है कि उसे आत्मचिंतन के लिए समय ही नहीं मिल पाता। जबकि जीवन की वास्तविक सफलता आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने में निहित है।
उन्होंने कहा कि शरीर नश्वर है और मृत्यु निश्चित है। इस सत्य को समझने वाला व्यक्ति अपने जीवन के समय का सदुपयोग करता है तथा मोह, अहंकार और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति से दूर रहने का प्रयास करता है। मनुष्य को अपने कर्मों की शुद्धता पर ध्यान देते हुए धर्म, संयम और सदाचार को जीवन में स्थान देना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में मनुष्य अनेक इच्छाओं और आकांक्षाओं के पीछे भागता रहता है। वह भविष्य में अधिक धन अर्जित करने, संपत्ति बढ़ाने और सुख-सुविधाएं जुटाने की योजनाएं बनाता रहता है, लेकिन जीवन की अवधि निश्चित नहीं है। इसलिए वर्तमान समय को व्यर्थ गंवाने के बजाय श्रेष्ठ कर्म करने और आत्मिक उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।
धन, वैभव और प्रतिष्ठा पर न करें अहंकार
आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि धन-संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा सांसारिक जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें स्थायी मानकर अहंकार करना उचित नहीं है। मनुष्य को संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए उनमें अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए। विनम्रता, सदाचार और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे समय-समय पर अपने जीवन का मूल्यांकन करें और विचार करें कि उनका वास्तविक लक्ष्य क्या है। मृत्यु की निश्चितता का बोध व्यक्ति को अपने आचरण में सुधार करने, अच्छे कर्म करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

श्रेष्ठ कर्म ही आत्मिक उन्नति का आधार: मुनिश्री उपशांतसागर
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य का अधिकांश जीवन भविष्य की योजनाएं बनाने और इच्छाओं की पूर्ति में बीत जाता है। वह अधिक धन, संपत्ति और सुख-सुविधाएं प्राप्त करने की चिंता में लगा रहता है, लेकिन जीवन कितना लंबा होगा, यह कोई नहीं जानता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को वर्तमान समय का सदुपयोग करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि धन-संपत्ति, परिवार, पद और प्रतिष्ठा संसार में स्थायी नहीं हैं। मृत्यु के समय मनुष्य के साथ उसकी सांसारिक उपलब्धियां नहीं जातीं, बल्कि जैन दर्शन के अनुसार जीव अपने कर्मों के परिणामों के अनुरूप जन्म-मरण के चक्र में आगे बढ़ता है। इसके बावजूद मनुष्य सांसारिक वस्तुओं को स्थायी मानकर उनमें अत्यधिक मोह और आसक्ति रखता है, जो उसके आध्यात्मिक विकास में बाधा बन सकती है।
उन्होंने कहा कि सच्चा जागरूक व्यक्ति वही है, जो समय-समय पर अपने जीवन का मूल्यांकन करता है और स्वयं से प्रश्न करता है कि उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है। शरीर, वैभव और उपलब्धियों पर अहंकार करने के बजाय मनुष्य को विनम्रता, धर्म, सदाचार और आत्मचिंतन को महत्व देना चाहिए।
अच्छे संस्कार और निर्मल कर्म ही वास्तविक संपत्ति
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक संपत्ति उसके अच्छे संस्कार, श्रेष्ठ कर्म और आत्मिक उन्नति हैं। ये जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। सांसारिक वस्तुओं का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन उनमें अत्यधिक आसक्त होकर अपने वास्तविक उद्देश्य को भूल जाना उचित नहीं है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे मोह-माया में उलझकर जीवन व्यर्थ गंवाने के बजाय अपने कर्मों को निर्मल बनाने, संयम अपनाने और आत्मकल्याण के लिए निरंतर प्रयास करें।
धर्मसभा का संदेश रहा कि जीवन की सार्थकता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अच्छे आचरण, आत्मचिंतन और श्रेष्ठ कर्मों में निहित है। मृत्यु की निश्चितता को समझकर यदि मनुष्य वर्तमान समय का सदुपयोग करे और अपने जीवन को धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ाए, तो वह अपने जीवन को अधिक सार्थक बना सकता है।
