चीनी, चावल और दाल फिर महंगी दिवाली से पहले सप्लाई चेन पर मौसम और ढुलाई का असर
खराब मौसम, अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ते परिवहन खर्च से खाद्य वस्तुओं के दाम पर दबाव; तेल की कीमतों में भी तेजी
नई दिल्ली। दिवाली से पहले खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की खबरों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। चावल, चीनी, दाल और खाने के तेल के दाम पर खराब मौसम, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट और माल ढुलाई की बढ़ती लागत का असर बताया जा रहा है। त्योहारों के दौरान घरों में खरीदारी और खान-पान का खर्च पहले से बढ़ जाता है। ऐसे में रोजमर्रा की जरूरी चीजों के महंगे होने से परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी के पीछे मौसम और आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां प्रमुख वजह मानी जा रही हैं। मध्य-पूर्व और लाल सागर के आसपास तनाव के कारण समुद्री मार्गों से होने वाली ढुलाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर से जुड़े मार्गों में अनिश्चितता के चलते सामान भेजने का खर्च बढ़ने और आपूर्ति में देरी की आशंका बनी हुई है। इसका असर उन वस्तुओं पर अधिक पड़ सकता है जो अंतरराष्ट्रीय बाजार और लंबी दूरी की ढुलाई पर निर्भर हैं।
चावल की कीमतों पर दबाव
चावल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति और ढुलाई लागत को लेकर चिंता जताई गई है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, उसका चावल मूल्य सूचकांक अगस्त की तुलना में 1.4 प्रतिशत बढ़ा। संगठन ने चावल की कुछ किस्मों के भाव में तेजी के पीछे मौसम संबंधी चिंताओं और मौसमी रूप से सीमित आपूर्ति को कारण बताया
एबीपी की रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के वायदा भाव में तेज बढ़ोतरी और कंटेनर से माल भेजने की लागत बढ़ने का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पादन और उपलब्धता में कमी की आशंका के साथ ऊंची ढुलाई लागत ने बाजार पर दबाव बनाया है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और किस्मों के भाव में अंतर हो सकता है; इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों को सीधे स्थानीय दुकानों के दाम से नहीं जोड़ना चाहिए।
चीनी उत्पादन को लेकर चिंता
चीनी की कीमतों पर भी मौसम का असर पड़ने की आशंका जताई गई है। FAO के अनुसार, सितंबर में उसका चीनी मूल्य सूचकांक अगस्त के मुकाबले 6.1 प्रतिशत बढ़ा। संगठन ने भारत, थाईलैंड और यूरोपीय संघ में उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित करने वाले मौसम संबंधी कारकों का उल्लेख किया। ब्राजील में भारी बारिश से कटाई की प्रक्रिया पर दबाव पड़ने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
चीनी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर आपूर्ति और कारोबार की लागत के जरिए बाजार तक पहुंच सकता है। हालांकि, स्थानीय खुदरा कीमतें घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, स्टॉक और वितरण व्यवस्था जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं। इस कारण अलग-अलग शहरों में ग्राहकों को अलग भाव देखने को मिल सकते हैं।
खाने के तेल और दालों के दाम
खाने के तेल की कीमतों पर कच्चे तेल और जैव ईंधन की मांग का असर बताया जा रहा है। वनस्पति तेल का एक हिस्सा जैव ईंधन बनाने में इस्तेमाल होता है। मांग में बदलाव, उत्पादन की संभावनाएं और आयात-निर्यात की स्थिति तेल के बाजार को प्रभावित कर सकती है। FAO के आंकड़ों में सितंबर के दौरान वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
दालों के मामले में एबीपी की रिपोर्ट में चना, उड़द और मटर के भाव में पिछले एक साल के दौरान तेजी का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट ने आयात पर शुल्क और आपूर्ति की स्थिति को कीमतों पर असर डालने वाले कारणों में गिनाया है। दालें रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा हैं, इसलिए इनके दाम में लगातार बढ़ोतरी का असर घरेलू खर्च में साफ महसूस हो सकता है।
त्योहारों से पहले बजट पर असर
खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर त्योहारों की खरीदारी और घर के नियमित खर्च, दोनों पर असर पड़ता है। चावल, चीनी, दाल और तेल जैसी जरूरी वस्तुओं के भाव में बदलाव से परिवारों को खरीदारी की योजना में सावधानी बरतनी पड़ सकती है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौसम और परिवहन से जुड़ी चुनौतियां बाजार पर दबाव बनाए हुए हैं। कीमतों का आगे का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि फसल उत्पादन, उपलब्ध आपूर्ति और व्यापारिक मार्गों की स्थिति कैसी रहती है।
