नई दिल्ली के ऋषभ विहार में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने आत्मा की स्वतंत्रता, कर्म बंधन और वीतराग भाव से मुक्ति का संदेश दिया।
प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है, कण-कण स्वतंत्र है : पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव
दैनिक स्वराज वाणी
आत्मा चैतन्य है, कर्म जड़ है; जीव राग-मोह से बंधता है और वीतराग भाव से मुक्त होता है
रिपोर्ट : राजेश जैन दद्दू | नई दिल्ली
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर 2026। दिल्ली के ऋषभ विहार में विराजित परम पूज्य पंचम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मा की स्वतंत्रता, कर्म बंधन और मोक्ष मार्ग पर गहन आध्यात्मिक प्रवचन दिया।
गुरुदेव ने कहा कि प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है। कण-कण स्वतंत्र है और अणु-अणु स्वतंत्र है। संसारी आत्मा कर्मों से बंधी होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप में स्वतंत्र रहती है।
आत्मा चैतन्य है और कर्म जड़ : गुरुदेव
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा और कर्म दूध-पानी की तरह मिले हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन दोनों का अस्तित्व और स्वरूप अलग-अलग है। अनादिकाल से बंधे होने के बावजूद कर्म कभी आत्मा नहीं बना और न भविष्य में बनेगा। आत्मा कभी कर्मरूप परिणत नहीं होती। आत्मा चैतन्य है, जबकि कर्म जड़ है। आत्मा कभी जड़ नहीं होगी और जड़ कभी चेतन नहीं बनेगा।
राग-मोह से बंधन, वीतराग भाव से मुक्ति
गुरुदेव ने कर्म बंधन और मुक्ति का मार्ग समझाते हुए कहा कि जीव राग और मोह के वशीभूत होकर कर्मों का बंधन करता है, जबकि वीतराग भाव धारण करने से कर्मों से मुक्त होता है।
मानसिकता को व्यवस्थित करना आवश्यक
विश्व व्यवस्था पर चिंतन करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संसार की व्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित है। राग और मोह से ग्रसित जीव अपने भावों को अव्यवस्थित करके जगत की व्यवस्था बदलना चाहता है, लेकिन ऐसा नहीं कर पाता। इसलिए मनुष्य को अपनी मानसिकता और भावों को व्यवस्थित करने की आवश्यकता है।
धर्मसभा में गुरुदेव ने आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने और वीतराग भाव की महत्ता पर प्रकाश डाला।
