वरात्रि पर्व की वास्तविक सार्थकता स्त्री के सम्मान, सुरक्षा, समान अधिकार और स्वतंत्रता में है। पढ़ें डॉ. सुरेन्द्र मीणा का विशेष आलेख।
स्त्री के संपूर्ण सम्मान से ही नवरात्रि पर्व की सार्थकता
दैनिक स्वराज वाणी | प्रासंगिक आलेख
लेखक : डॉ. सुरेन्द्र मीणा
शक्ति की आराधना तभी पूर्ण है, जब नारी को जीवन में सम्मान मिले।
नवरात्रि भारतीय संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो नारी शक्ति, आस्था, साहस और सृजनशीलता का प्रतीक है। इन नौ दिनों में हम माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे शक्ति, विवेक, धैर्य तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा लेते हैं। लेकिन एक प्रश्न आत्ममंथन के लिए आवश्यक है—क्या देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वाला समाज अपने घर, परिवार और कार्यस्थल पर स्त्रियों को समान सम्मान दे रहा है? यदि नहीं, तो नवरात्रि की आराधना के वास्तविक उद्देश्य को समझना अभी शेष है।
नारी केवल पूजनीय नहीं, बल्कि समान अधिकारों और सम्मान की अधिकारी भी है। वह माँ, बहन, बेटी, पत्नी, सहकर्मी और नेतृत्वकर्ता के रूप में समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उसकी पहचान केवल रिश्तों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसकी अपनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, प्रतिभाएँ और निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं, जितनी किसी पुरुष की।
दुर्गा की आराधना हमें यह संदेश देती है कि शक्ति का सम्मान किया जाना चाहिए, उसे दबाया नहीं जाना चाहिए। फिर भी समाज में महिलाओं को भेदभाव, असमान अवसरों, घरेलू हिंसा, दहेज जैसी कुप्रथाओं और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह विरोधाभास हमारी सामाजिक चेतना पर प्रश्नचिह्न लगाता है। देवी को चुनरी चढ़ाना सरल है, लेकिन घर की बेटी को अपनी पसंद का जीवन चुनने की स्वतंत्रता देना अधिक महत्त्वपूर्ण है। कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब प्रत्येक बालिका को शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलेंगे।
स्त्री सम्मान की शुरुआत घर से होती है। बेटों को बचपन से सिखाना होगा कि महिलाओं का सम्मान करना कोई एहसान नहीं, बल्कि उनका नैतिक दायित्व है। घर के कामों में सहभागिता, महिलाओं की राय को महत्त्व देना, उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करना और उनके प्रति अपमानजनक व्यवहार का विरोध करना वास्तविक संस्कार हैं। परिवार में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव समाप्त किए बिना समानता की कल्पना अधूरी है।
कार्यस्थलों पर महिलाओं को सुरक्षित वातावरण, समान अवसर, उचित पारिश्रमिक और उनकी योग्यता के अनुरूप प्रगति मिलनी चाहिए। समाज को ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी, जिसमें किसी महिला की उपलब्धियों का मूल्यांकन उसके कार्य और प्रतिभा से हो, न कि उसके लिंग से। महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी केवल उनके व्यवहार या पहनावे पर प्रश्न उठाकर पूरी नहीं हो सकती; इसके लिए पुरुषों की जिम्मेदारी, सामाजिक संवेदनशीलता और प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।
नवरात्रि केवल उपवास, पूजा, गरबा और उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि अपने आचरण को परखने का समय भी है। माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय अन्याय, अहंकार और दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है। इस संदेश को जीवन में उतारना ही पर्व की आध्यात्मिक उपलब्धि है।
सच्ची भक्ति मंदिर में प्रज्वलित दीपक से आगे बढ़कर स्त्री के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का प्रकाश फैलाने में है। जिस दिन समाज देवी की पूजा के साथ जीवित स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा करना सीख जाएगा, जिस दिन बेटियों को बोझ नहीं, अवसर माना जाएगा और जिस दिन महिलाओं की गरिमा से समझौता नहीं होगा, उसी दिन नवरात्रि की साधना अपने वास्तविक अर्थ में सफल होगी।
आइए, इस नवरात्रि संकल्प लें कि हम नारी को केवल देवी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र, सक्षम और सम्मानित मनुष्य के रूप में स्वीकार करेंगे।

