नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महामुनिराज ने तिरुक्कुरल, तमिल संस्कृति और जैन धर्म की ऐतिहासिक विरासत पर विचार व्यक्त किए।
िज्ञान भवन से आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महामुनिराज का आह्वान—“भारत के इतिहास को मत छिपाओ”
दैनिक स्वराज वाणी
नई दिल्ली। रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू, इंदौर।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में श्रमण संस्कृति के महाश्रमण पंचम पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महामुनिराज ने भारतीय इतिहास और जैन संस्कृति के योगदान को लेकर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में महाकवि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित प्रसिद्ध तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ को जैन आगम पर आधारित ग्रंथ बताया। उन्होंने तमिलनाडु की संस्कृति, इतिहास और विरासत में जैन धर्म के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा, “भारत के इतिहास को मत छिपाओ।”
राजेश जैन दद्दू के अनुसार, आचार्य श्री के संबोधन के दौरान सभागार में नौ बार णमोकार मंत्र गूंजा और 21 बार तालियां बजीं। इस दौरान ‘नमोस्तु शासन जयवंत हो’ के जयघोष भी हुए। उन्होंने दावा किया कि कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने भी तमिलनाडु की संस्कृति में जैन परंपरा के योगदान का उल्लेख किया।
आचार्य श्री ने कहा कि जैन संस्कृति मात्र 2600 वर्ष पुरानी नहीं, बल्कि अनादि काल से चली आ रही है। उन्होंने भगवान महावीर स्वामी की छवि और जैन संस्कृति का सम्मान बनाए रखने तथा धार्मिक परंपराओं का निर्वाह करने का संदेश दिया।
नोट: तिरुक्कुरल की धार्मिक उत्पत्ति और तमिल संस्कृति के इतिहास संबंधी कथन आचार्य श्री के विचारों के रूप में प्रस्तुत हैं। प्रधानमंत्री द्वारा इतिहास छिपाने के आरोप तथा उपराष्ट्रपति के कथित वक्तव्य की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

