श्राद्ध पक्ष में बनाई संजा बाई को पड़ाना में विसर्जित कर दी गई विदाई, 16 दिन तक कन्याओं ने बनाईं दीवारों पर आकृतियाँ
भाद्रपद पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या तक चला संजा पर्व, गीत-पूजन के बाद नदी में हुआ विसर्जन
पड़ाना। श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, यह तो सभी जानते हैं, लेकिन इन 16 दिनों में संजा बनाने की परंपरा भी रही है। आज भी शहरों और गाँवों में घरों की दीवारों पर गोबर से संजा बनाई जाती है। ग्राम पड़ाना में संजा माता की विदाई के साथ इस वर्ष का संजा पर्व संपन्न हुआ।
भाद्रपद पूर्णिमा से पितृ मोक्ष अमावस्या तक चलता है पर्व
भाद्रपद माह की शुक्ल पूर्णिमा से पितृ मोक्ष अमावस्या तक कन्याओं द्वारा संजा बाई का पर्व मनाया जाता है। यह परंपरा अधिकांशतः मालवा, निमाड़, राजस्थान सहित अन्य क्षेत्रों में प्रचलित है।
16 दिन तक बनीं अलग-अलग आकृतियाँ
श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों तक रोज लड़कियों ने दीवारों पर अलग-अलग प्रकार की आकृतियाँ बनाईं। शाम को पूजा-अर्चना कर संजा बाई के गीत गाए गए और प्रसाद का भोग लगाया गया।
सर्वपितृ अमावस्या पर नदी में विसर्जन
पर्व के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या पर 16 दिन में बनाई गईं सूखी आकृतियों को नदी में विसर्जित किया गया। पूजा-अर्चना के बाद शनिवार को संजा बाई को विदाई दी गई।
इन बालिकाओं ने बनाईं संजा
ग्राम पड़ाना में 16 दिनों तक एक से बढ़कर एक संजा बाई की आकृतियाँ संस्कृतिका सेन, पीहू पाटीदार, नेनु सेन, कनक सेन, हर्षिता गुर्जर और करुणा सेन सहित अन्य लड़कियों ने बनाईं।
