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‘लोग क्या कहेंगे’ की बेड़ियों में बेटियों के सपने न बाँधें

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Published On: 7 October 2026
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‘लोग क्या कहेंगे’ की बेड़ियों में बेटियों के सपने न बाँधें

भावों का दर्पण | दिनांक: 05 अक्टूबर 2026
पूनम रमेश गांधी, राजस्थान

“लोग क्या कहेंगे”—इन शब्दों के सहारे कितनी ही बेटियों के सपनों के पंख काट दिए जाते हैं। उसके हँसने, रोने, अपनी पसंद बताने और आगे बढ़ने की इच्छा पर समाज की राय का पहरा लगा दिया जाता है। आखिर हर कदम पर बेटी से ही समाज की अपेक्षाओं का हिसाब क्यों माँगा जाता है?

बेटी को भी अपने सपने पूरे करने, अपनी पहचान बनाने और अपनी पसंद से आगे बढ़ने का अधिकार है। वह बोझ नहीं, घर की उम्मीद है। उसे रोकने के बजाय उससे पूछिए—“बेटी, तू क्या चाहती है? तेरे सपने क्या हैं?”

हर इच्छा और हर लक्ष्य को “शादी के बाद पूरा कर लेना” कहकर टाल देना उसकी उम्मीदों को कमजोर करता है। उसके सपनों को पूरा करने का अवसर आज भी मिलना चाहिए। विवाह को उसकी आकांक्षाओं के लिए प्रतीक्षा की शर्त न बनाएँ।

जब अपने ही परिवार में बेटी को समझने और उसका साथ देने की जगह नहीं मिलेगी, तो दूसरों से यह उम्मीद कैसे की जाएगी? माता-पिता का भरोसा उसे हिम्मत देता है। उसकी बात सुनना, उसकी क्षमताओं को पहचानना और आगे बढ़ने के अवसर देना उसके आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

जब वही बेटी कामयाब होती है, तो लोग कहते हैं—“बेटी हो तो ऐसी!” लेकिन उसका सम्मान केवल सफलता मिलने के बाद क्यों हो? उसके प्रयासों, इच्छाओं और संघर्षों की कदर भी होनी चाहिए।

अपनी बेटी को समझिए। उसे “लोग क्या कहेंगे” की बेड़ियों में बाँधने के बजाय विश्वास और सहयोग दीजिए, ताकि वह अपने सपनों की ओर बढ़ सके।

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