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संजा की लोककला पर बदलते दौर का असर, गोबर के मांडनों की जगह ले रहे स्टीकर-पोस्टर

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Published On: 5 October 2026

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संजा की लोककला पर बदलते दौर का असर, गोबर के मांडनों की जगह ले रहे स्टीकर-पोस्टर

पड़ाना। श्राद्ध पक्ष में घरों की दीवारों पर सजने वाले संजा बाई के पारंपरिक मांडनों का स्वरूप बदल रहा है। कभी बालिकाएं अपने हाथों से गोबर की आकृतियां बनाकर उन्हें फूल-पत्तियों और प्राकृतिक रंगों से सजाती थीं। अब बाजार में उपलब्ध कागजी स्टीकर और पोस्टर चिपकाकर संजा की पूजा की जा रही है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार इस बदलाव से मांडने बनाने की कला और उससे जुड़े सामूहिक लोकगीतों की परंपरा कमजोर पड़ रही है।

संजा की पूजा का क्रम बना हुआ है, लेकिन उसे तैयार करने की पारंपरिक प्रक्रिया का चलन कम होता जा रहा है। बदलती जीवनशैली, समय की कमी और तैयार सामग्री की उपलब्धता के बीच लोककला के संरक्षण का प्रश्न सामने आया है।

हाथों से बनती थीं अलग-अलग आकृतियां

पहले बालिकाएं घर की दीवार को लीपकर संजा के मांडने बनाने की तैयारी करती थीं। इसके बाद गोबर से प्रतिदिन अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती थीं। उन्हें फूलों, पत्तियों और प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता था। इस प्रक्रिया में बालिकाएं अपने हाथों से संजा तैयार करती थीं।

दीवार की तैयारी से लेकर आकृतियां बनाने और सजाने तक पूरा काम लोककला का हिस्सा था। रोज अलग मांडना बनाने से बालिकाओं को अपनी कल्पना और कौशल का उपयोग करने का अवसर मिलता था। बुजुर्गों का कहना है कि यही अभ्यास उन्हें परंपरा से जोड़ता था।

शाम को सामूहिक पूजा और लोकगीत

संजा सजाने के बाद शाम को बालिकाएं एकत्र होकर आरती और पूजा करती थीं। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत गाए जाते थे। संजा बाई से जुड़े गीतों की गूंज से शाम का वातावरण जीवंत हो उठता था।

‘संजा तू जिम ले…’ और ‘संजा बाई का लालजी…’ जैसे गीत इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं। घर जाने, चांद और अन्य लोक प्रसंगों से जुड़े गीत भी गाए जाते थे। सामूहिक गायन के माध्यम से बालिकाएं इन गीतों को सीखती और अगली पीढ़ी तक पहुंचाती थीं।

तैयार पोस्टरों से बदल रहा स्वरूप

अब कई स्थानों पर गोबर से मांडने बनाने के बजाय तैयार स्टीकर और पोस्टर दीवारों पर लगाए जा रहे हैं। बाजार में इनकी उपलब्धता और लगाने की सुविधा के कारण बालिकाएं इनका उपयोग कर रही हैं।

इससे संजा की पूजा का बाहरी स्वरूप बना रहता है, लेकिन हाथों से आकृतियां बनाने की प्रक्रिया पीछे छूट रही है। जिस कला को बालिकाएं प्रतिदिन अभ्यास से सीखती थीं, उसके लिए अवसर कम हो रहे हैं। साथ ही सामूहिक लोकगीतों की परंपरा भी पहले जैसी नहीं रह गई है।

समय की कमी और जीवनशैली का प्रभाव

स्थानीय विवरण के अनुसार बदलती जीवनशैली और समय की कमी से पारंपरिक मांडने बनाने का चलन घट रहा है। तैयार पोस्टर लगाने में अपेक्षाकृत कम समय लगता है, जबकि गोबर से संजा तैयार करने में दीवार लीपने, आकृतियां बनाने और सजावट की पूरी प्रक्रिया होती है।

यही बदलाव लोककला के संरक्षण की चिंता बढ़ा रहा है। पूजा जारी रहने के बावजूद उससे जुड़ा हस्तकौशल कम होने पर परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष कमजोर पड़ता है। संजा की पहचान उसके मांडनों और गीतों से भी जुड़ी हुई है।

बुजुर्गों ने जताई संरक्षण की चिंता

बुजुर्ग भागीरथ शर्मा और गंगाराम सिरोलिया का कहना है कि संजा केवल पूजा नहीं, बल्कि लोककला और संस्कारों से जुड़ी परंपरा है। गोबर से मांडने बनाना बालिकाओं को रचनात्मकता, धैर्य और अपनी संस्कृति से जोड़ने का माध्यम रहा है।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को यह कला सिखाने और पारंपरिक संजा को बढ़ावा देने के प्रयास जरूरी हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में गोबर के संजा मांडने और उनसे जुड़े लोकगीत केवल यादों तथा तस्वीरों तक सीमित रह सकते हैं।

नई पीढ़ी तक कला पहुंचाने की जरूरत

संजा की परंपरा को जीवित रखने के लिए पूजा के साथ मांडने बनाने और गीत सीखने की प्रक्रिया का संरक्षण भी आवश्यक बताया गया है। बुजुर्गों की चिंता है कि बालिकाओं को पारंपरिक कला का अभ्यास मिले, ताकि संजा का हस्तनिर्मित स्वरूप और उससे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियां आगे बढ़ सकें।

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