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कुक्षी के BAPS मंदिर में महंत स्वामी महाराज की 93वीं जन्म जयंती मनाई, गुरु महिमा और सत्संग का दिया संदेश

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Published On: 5 October 2026

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कुक्षी के BAPS मंदिर में महंत स्वामी महाराज की 93वीं जन्म जयंती मनाई, गुरु महिमा और सत्संग का दिया संदेश

नरेन्द्र सिरवी, कुक्षी

कुक्षी। BAPS स्वामीनारायण मंदिर में महंत स्वामी महाराज की 93वीं जन्म जयंती का महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में कुक्षी तथा आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों हरिभक्त और श्रद्धालु शामिल हुए। इस अवसर पर महंत स्वामी महाराज के जीवन, आध्यात्मिक कार्यों और उनके मार्गदर्शन से जुड़े प्रेरणादायी प्रसंग प्रस्तुत किए गए। संतों ने गुरु-शिष्य परंपरा, सत्संग और भगवान के प्रति निष्ठा का महत्व समझाया।

महोत्सव में मध्यप्रदेश के हरिभक्त परिवारों के अनुभवों को विशेष स्थान दिया गया। तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से प्रस्तुत प्रसंगों में बताया गया कि कठिन परिस्थितियों के बीच सत्संग और गुरु के मार्गदर्शन से उन्हें आत्मविश्वास तथा मानसिक शांति मिली। कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसादी वितरण के साथ हुआ।

हरिभक्त परिवारों के प्रेरणादायी अनुभव प्रस्तुत

पूज्य अमृतनिधिदास स्वामी ने मध्यप्रदेश के विभिन्न हरिभक्त परिवारों के जीवन से जुड़े प्रसंग प्रस्तुत किए। इनमें आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना करने वाले परिवारों के अनुभव शामिल रहे।

प्रस्तुत प्रसंगों के अनुसार, महंत स्वामी महाराज के आशीर्वाद, मार्गदर्शन और सत्संग से इन परिवारों को जीवन में नई दिशा मिली। परिवारों ने अपने अनुभवों में आत्मविश्वास, शांति और आध्यात्मिक स्थिरता प्राप्त होने की भावना व्यक्त की। फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी के माध्यम से इन प्रसंगों को श्रद्धालुओं के सामने रखा गया। प्रस्तुतियों ने उपस्थित हरिभक्तों को भावविभोर किया।

गुरु-शिष्य परंपरा का समझाया महत्व

पूज्य दिव्यस्वरूप स्वामीजी ने अपने वक्तव्य में गुरु-शिष्य परंपरा और गुरु की महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि गुरु भगवान के स्वरूप, सिद्धांतों और उपासना को अपने जीवन में प्रकट करते हैं।

उन्होंने कहा कि गुरु भगवान नहीं बनते, बल्कि अपने रोम-रोम में भगवान को धारण करते हैं। गुरु के जीवन और मार्गदर्शन से शिष्य को भगवान के सिद्धांतों को समझने तथा उन्हें व्यवहार में अपनाने की प्रेरणा मिलती है। उनके संबोधन में गुरु के प्रति श्रद्धा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का भाव प्रमुख रहा।

गुरु वंदना के भाव की व्याख्या

दिव्यस्वरूप स्वामीजी ने सनातन परंपरा में प्रचलित श्लोक “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः” के भाव को समझाया। उन्होंने बताया कि गुरु के माध्यम से भगवान की प्राप्ति और उनके सिद्धांतों को जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को गुरु की महिमा को आध्यात्मिक संबंध के रूप में समझने का संदेश दिया। उनके अनुसार, गुरु का मार्गदर्शन उपासना के भाव को जीवन से जोड़ता है। इस व्याख्या के माध्यम से उन्होंने गुरु वंदना में निहित श्रद्धा और समर्पण का महत्व प्रस्तुत किया।

राधा-कृष्ण के उदाहरण से समझाया एकात्म भाव

अपने उद्बोधन में दिव्यस्वरूप स्वामीजी ने राधा-कृष्ण का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि दोनों का संबंध प्रेम और एकात्म भाव का है। इसे बड़े या छोटे की तुलना से समझने के बजाय उनके अभिन्न संबंध के रूप में देखना चाहिए।

इसी उदाहरण के माध्यम से उन्होंने भगवान और उनके परम एकांतिक संत के बीच आध्यात्मिक संबंध की व्याख्या की। वक्तव्य में श्रद्धालुओं को प्रेम, उपासना और समर्पण के भाव से इस संबंध को समझने की प्रेरणा दी गई।

गुरु परंपरा के योगदान का उल्लेख

दिव्यस्वरूप स्वामीजी ने कहा कि भगवान स्वामीनारायण के सिद्धांतों, उपासना और आध्यात्मिक संदेश को विश्वभर में पहुंचाने में गुरु परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

उन्होंने गुणातीतानंद स्वामी, भगतजी महाराज, शास्त्रीजी महाराज, योगीजी महाराज, प्रमुखस्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस परंपरा ने आध्यात्मिक संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। महोत्सव में गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई।

आरती के बाद वितरित हुई खीर-पूरी की प्रसादी

कार्यक्रम के दौरान हरिभक्तों ने भक्ति और सत्संग का लाभ लिया। समापन पर सभी श्रद्धालु आरती में शामिल हुए। इसके बाद खीर-पूरी की प्रसादी की व्यवस्था की गई। महोत्सव में संतों के उद्बोधन और प्रेरक प्रस्तुतियों के माध्यम से सकारात्मक जीवनदृष्टि, पारिवारिक शांति तथा गुरु और भगवान के प्रति दृढ़ निष्ठा का संदेश दिया गया।

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