हार्दिक हुंडिया ने जैन समाज से धार्मिक मंचों की गरिमा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सम्मान का आधार प्रसिद्धि नहीं, बल्कि धर्म, आचरण और जैन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता होनी चाहिए।
जैन धार्मिक मंचों पर सम्मान का आधार धर्म और आचरण हो: हार्दिक हुंडिया
जैन समाज से आत्ममंथन की अपील, कहा—धार्मिक मंचों की गरिमा और जैन सिद्धांतों को मिले प्राथमिकता
हार्दिक हुंडिया, कल्याणी मित्र। जैन धार्मिक एवं सामाजिक मंचों पर सम्मान और अतिथियों के चयन को लेकर हार्दिक हुंडिया ने समाज से आत्ममंथन करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म के मंचों पर ऐसे व्यक्तियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिनका जीवन और आचरण जैन धर्म के मूल सिद्धांतों एवं मूल्यों के अनुरूप हो।
हुंडिया ने कहा कि जैन धर्म अहिंसा, संयम, सदाचार और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों में केवल किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि या बड़े पद को देखकर सम्मान करना उचित नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जैन धर्म के नियमों का पालन करने वाले समाजजनों को उचित स्थान मिलना चाहिए और धार्मिक मंच की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर जैन धर्म से संबंधित सामग्री साझा करने को लेकर भी समाज से सजग रहने का आग्रह किया। हुंडिया के अनुसार, धर्म के विरुद्ध कही गई बातों को प्रसारित करने के बजाय जैन धर्म के वास्तविक सिद्धांतों, सकारात्मक विचारों और सत्य तथ्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
हार्दिक हुंडिया ने संतों और समाज के प्रमुख लोगों से भी आग्रह किया कि धार्मिक मंचों का उपयोग व्यक्तिगत प्रसिद्धि के बजाय धर्म प्रभावना और समाज को सही दिशा देने के लिए किया जाए। सम्मान देते समय व्यक्ति के पद के साथ उसके आचरण और धार्मिक मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन शासन में ऐसे साधु-संतों के प्रति उनका पूर्ण सम्मान है, जो साधु जीवन की मर्यादाओं और परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हुए स्वयं के साथ समाज के आत्मकल्याण की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
हुंडिया ने अंत में समाज से जैन धर्म के सिद्धांतों को समझने, उनका पालन करने और धार्मिक मंचों की गरिमा बनाए रखने की अपील की।
