नागदा के पंडित दीपक पण्ड्या ने कर्मकांडी ब्राह्मणों की दिनचर्या, साधना, यात्रा और मेहनत का उल्लेख करते हुए यजमानों से सात्विक भोजन, उचित दक्षिणा और सम्मान की अपील की।
पंडित के दो घंटे के मंत्रोच्चार के पीछे दिनभर की साधना और मेहनत, पंडित पण्ड्या ने सम्मान की अपील की
कर्मकांडी ब्राह्मणों के श्रम, भोजन और दक्षिणा को लेकर समाज से संवेदनशीलता बरतने का आग्रह; युवा संस्कार परिवार ने किया समर्थन
संवाददाता – निलेश मेहता
नागदा। धार्मिक अनुष्ठानों में कर्मकांडी ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चार और पूजा-पाठ को केवल कुछ घंटों के कार्य के रूप में देखने की धारणा पर कर्मकांडी पंडित दीपक पण्ड्या ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कर्मकांडी ब्राह्मणों की दिनचर्या, धार्मिक अनुशासन, यात्रा, शारीरिक श्रम और यजमान के प्रति जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए समाज से उनके श्रम एवं समय का सम्मान करने की अपील की है।
पण्ड्या ने कहा कि सोशल मीडिया पर अल्प जानकारी के चलते कई बार ऐसी टिप्पणियां सामने आती हैं कि पंडित केवल दो घंटे मंत्र पढ़कर चले जाते हैं। जबकि उनके अनुसार किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के दिखाई देने वाले कुछ घंटों के पीछे लंबी तैयारी और दिनभर की मेहनत जुड़ी होती है।
सुबह की साधना से शुरू होती है दिनचर्या
पण्ड्या के अनुसार कई कर्मकांडी ब्राह्मणों की दिनचर्या सुबह तड़के शुरू हो जाती है। स्नान, संध्यावंदन, दैनिक पूजा एवं अन्य धार्मिक क्रियाओं को पूरा करने के बाद वे यजमान के यहां अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए निकलते हैं। कई अवसरों पर उन्हें 60 से 70 किलोमीटर तक यात्रा करनी पड़ती है।
यजमान के यहां पहुंचने के बाद पूजा सामग्री व्यवस्थित करने, वेदी-मंडप तैयार कराने और विधि-विधान के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने में कई घंटे लग सकते हैं। लगातार मंत्रोच्चार, हवन के दौरान धुएं के बीच बैठना और लंबे समय तक एक ही स्थान पर धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराना भी शारीरिक श्रम का हिस्सा है।
सात्विक और सुपाच्य भोजन उपलब्ध कराने की अपील
पंडित पण्ड्या ने यजमान परिवारों से भोजन व्यवस्था पर भी ध्यान देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अनुष्ठान कराने वाले आचार्यों के लिए अत्यधिक तेल-मसाले वाले भोजन के बजाय सादा, सात्विक एवं सुपाच्य भोजन उपलब्ध कराया जाना बेहतर है।
उनका कहना है कि कई बार पंडित सुबह से धार्मिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में यजमान परिवारों को उनके भोजन और आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता रखनी चाहिए।
दक्षिणा को बताया श्रम के सम्मान का माध्यम
पण्ड्या ने दक्षिणा को लेकर कहा कि इसे केवल धार्मिक औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार कर्मकांडी ब्राह्मण किसी परिवार के धार्मिक संस्कार एवं अनुष्ठान संपन्न कराने में अपना समय, ज्ञान और ऊर्जा लगाते हैं, इसलिए दक्षिणा तय करते समय उनके श्रम और समय का भी सम्मान होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि “ब्राह्मण केवल धन के लिए नहीं, सेवा और संस्कार के लिए आता है।” यजमान के परिवार के धार्मिक संस्कारों को विधिपूर्वक संपन्न कराने वाले आचार्य को अनुष्ठान के बाद सम्मानपूर्वक विदा किया जाना चाहिए।
पण्ड्या ने समाज से आग्रह किया कि किसी कर्मकांडी ब्राह्मण को पूजा या धार्मिक अनुष्ठान के लिए आमंत्रित करते समय केवल मंत्रोच्चार के समय को नहीं, बल्कि उसके पीछे की तैयारी, यात्रा, साधना और पूरे दिन के परिश्रम को भी ध्यान में रखा जाए।
पंडित दीपक पण्ड्या की इस अपील का ब्राह्मण समाज नागदा-युवा संस्कार परिवार ने भी समर्थन किया है।

