नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का आस संस्था ने किया स्वागत
जानकारी: मनीषा बागोले, जिला समन्वयक, आस संस्था, अलीराजपुर
अलीराजपुर। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर अभियान चला रही आस संस्था ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नाबालिगों की सुरक्षा से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का स्वागत किया है। संस्था द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, अदालत ने केंद्र सरकार से ऐसे वैधानिक नियम बनाने की संभावना पर विचार करने को कहा है, जिनके तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए नाबालिगों से संबंधित भारतीय कानूनों का पालन अनिवार्य हो।
आस संस्था का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल सेवाओं की कार्यप्रणाली में आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल किए जाने चाहिए। संस्था ने इस कदम को बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बताया है।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की याचिका पर सुनवाई
संस्था की ओर से उपलब्ध कराए गए विवरण के मुताबिक, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें मांग की गई कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को नाबालिगों की कानूनी स्थिति ध्यान में रखते हुए अपनी सेवाओं में सुरक्षा उपाय लागू करने के निर्देश दिए जाएं।
याचिका में नाबालिगों की स्वतंत्र रूप से अनुबंध करने की कानूनी क्षमता का प्रश्न उठाया गया। संगठन का कहना है कि ऑनलाइन सेवाओं तक बच्चों की पहुंच और प्लेटफॉर्म की उपयोग संबंधी शर्तों में इस पहलू की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल सामान्य उपयोगकर्ता नियम पर्याप्त मानने के बजाय विशेष व्यवस्था की जरूरत बताई गई है।
भारतीय कानून के अनुरूप हों डिजिटल प्लेटफॉर्म
प्रेस विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालन को भारतीय कानून के अनुरूप बनाने पर जोर दिया। अदालत ने केंद्र से इस विषय को इंटरमीडियरी नियमों के ढांचे में शामिल करने की संभावना पर विचार करने को कहा।
संस्था के मुताबिक, सुनवाई के दौरान यह बात सामने रखी गई कि प्लेटफॉर्म का सॉफ्टवेयर और संचालन व्यवस्था भारतीय कानूनों के अनुरूप होनी चाहिए। इसका उद्देश्य डिजिटल सेवाओं में नाबालिगों से संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना है। हालांकि, दिए गए विवरण में किसी नए नियम की अधिसूचना जारी होने का उल्लेख नहीं है।
स्वतंत्र अनुबंध के लिए आयु सीमा का मुद्दा
आस संस्था द्वारा दी गई जानकारी में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ स्वतंत्र रूप से अनुबंध करने के लिए 18 वर्ष की न्यूनतम आयु का पालन सुनिश्चित करने का मुद्दा उठाया गया है। यह विषय नाबालिगों की कानूनी क्षमता और ऑनलाइन सेवाओं की शर्तों से जुड़ा है।
इसे सभी नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट तत्काल बंद करने के आदेश के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। उपलब्ध विवरण में ऐसा प्रतिबंध लगाने की जानकारी नहीं है। केंद्र सरकार को संबंधित नियमों और सुरक्षा व्यवस्था पर विचार करने के लिए कहा गया है। आगे की व्यवस्था आधिकारिक निर्णय और नियमों से स्पष्ट होगी।
ऑनलाइन खतरों से बच्चों की सुरक्षा जरूरी
आस के निदेशक वसीम इक़बाल ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म द्वारा भारतीय कानूनों का पालन जरूरी है। उन्होंने ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के सामने मौजूद विभिन्न खतरों की ओर ध्यान दिलाया।
उनके अनुसार, बच्चों को बहला-फुसलाकर यौन शोषण, मानव तस्करी और सेक्सटॉर्शन का शिकार बनाए जाने का जोखिम रहता है। निजी डेटा का दुरुपयोग और साइबर बुलिंग भी चिंता के विषय हैं। इक़बाल ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय होने और प्रभावी सुरक्षा उपाय लागू होने से बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाने में मदद मिल सकती है।
केंद्र ने विषय की जांच करने की बात कही
संस्था के प्रेस विवरण के अनुसार, सुनवाई के दौरान केंद्र का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इस मुद्दे की जांच करेगी और आवश्यक कदम उठाएगी। इससे संबंधित नियमों और उनके क्रियान्वयन की व्यवस्था पर आगे विचार होने की जानकारी दी गई है।
अभी उपलब्ध सामग्री में नियम लागू करने की निश्चित तारीख, आयु सत्यापन की तकनीक अथवा प्लेटफॉर्म के लिए निर्धारित नई प्रक्रिया का विवरण नहीं है। इसलिए किसी खास व्यवस्था के लागू हो जाने का दावा नहीं किया जा सकता।
बाल अधिकार अभियान से जुड़ी है आस संस्था
आस संस्था जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की सहयोगी संस्था है। संगठन द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, जेआरसी अपने सहयोगी संगठनों के साथ देश के 782 जिलों में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए अभियान चला रहा है।
अलीराजपुर में जिला समन्वयक मनीषा बागोले ने संस्था की ओर से यह जानकारी उपलब्ध कराई। आस ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को बाल अधिकार संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कानूनों के प्रभावी पालन की जरूरत पर जोर दिया है। संस्था का कहना है कि ऑनलाइन सेवाओं में बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
