गुरु की पहचान वेश से नहीं, संयम और आचरण से होती है: आचार्यश्री उदारसागर
गुरु-मूढ़ता से बचकर सद्गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारने का संदेश
मनोज जैन नायक
मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने गुरु-मूढ़ता एवं कुगुरु विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि केवल साधु का वेश धारण करने से कोई सद्गुरु नहीं हो जाता। गुरु की वास्तविक पहचान उनके ज्ञान, संयम, त्याग, अपरिग्रह और आत्मकल्याण की साधना से होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को गुरु के प्रति श्रद्धा के साथ विवेक रखने और उनके उपदेशों को आचरण में उतारने की प्रेरणा दी।
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में सम्यग्दर्शन आत्मकल्याण का प्रथम सोपान है। इसकी निर्मलता के लिए देवमूढ़ता, गुरु-मूढ़ता और लोकमूढ़ता से बचना आवश्यक बताया गया है। गुरु-मूढ़ता का अर्थ ऐसे व्यक्ति को गुरु स्वीकार करना है, जो आत्मकल्याण के मार्ग का वास्तविक पथप्रदर्शक नहीं है। उन्होंने बताया कि रत्नकरण्डक श्रावकाचार में भी कुगुरु के सत्कार को गुरु-मूढ़ता कहा गया है।
श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक
आचार्यश्री ने समझाया कि गुरु बनना और गुरु कहलाना अलग बातें हैं। बाहरी रूप, प्रभावशाली व्यक्तित्व या मधुर वाणी देखकर किसी को गुरु मान लेना पर्याप्त नहीं है। गुरु वह होना चाहिए, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप की पहचान कराए और साधक को आत्मसंयम की दिशा में आगे बढ़ाए। सच्चा गुरु स्वयं राग-द्वेष, मोह और परिग्रह से दूर रहने का पुरुषार्थ करता है तथा दूसरों को भी वीतरागता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि गुरु-मूढ़ता का मूल कारण विवेक का अभाव है। जब व्यक्ति चमत्कार, प्रसिद्धि, भीड़, बाहरी आडंबर या सांसारिक लाभ से प्रभावित होकर गुरु स्वीकार करता है, तब उसका आध्यात्मिक विवेक कमजोर पड़ सकता है। श्रद्धा आवश्यक है, लेकिन वह गुरु के वास्तविक स्वरूप को समझने पर आधारित होनी चाहिए। जैन परंपरा में आरंभ और परिग्रह से विरत तथा ज्ञान एवं संयम से युक्त साधु आदर योग्य माने गए हैं।
अंधानुकरण से बचने का आह्वान
आचार्यश्री ने कहा कि जैन धर्म अंधानुकरण की शिक्षा नहीं देता। देव, शास्त्र और गुरु के स्वरूप को समझकर उत्पन्न श्रद्धा साधक को सही दिशा देती है। जो व्यक्ति स्वयं विषय-कषायों में लिप्त हो, आरंभ-परिग्रह में आसक्त हो और आत्मसंयम से दूर हो, उसे केवल बाहरी प्रभाव के कारण धर्मगुरु मान लेना उचित नहीं है। अयोग्य गुरु के प्रति ऐसा मोह ही गुरु-मूढ़ता है।
उन्होंने कहा कि सद्गुरु का उद्देश्य भक्तों को अपने व्यक्तित्व से बांधना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मा की ओर मोड़ना होता है। वे संसार के आकर्षण बढ़ाने के बजाय उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। सच्चे गुरु शिष्य को जिनवाणी, तत्त्वज्ञान, संयम, तप और आत्मचिंतन से जोड़ते हैं। गुरु-भक्ति तभी सार्थक है, जब उससे आत्मविकास और आचरण में सुधार हो।
आत्मकल्याण की राह दिखाए गुरु: मुनिश्री उपशांत सागर
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने संक्षिप्त प्रवचन में कहा कि गुरु वह है, जो संसार में उलझाने के बजाय उससे ऊपर उठने की राह बताए। उनकी पहचान वेश से अधिक संयम, त्याग, ज्ञान और आचरण से करनी चाहिए। कुगुरु के प्रति अंधश्रद्धा गुरु-मूढ़ता है, जबकि सद्गुरु के उपदेशों को विवेकपूर्वक स्वीकार करना सम्यग्दर्शन की दिशा में बढ़ना है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से गुरु के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने को कहा। उन्होंने समझाया कि केवल चरण स्पर्श, पूजा या जयकारे पर्याप्त नहीं हैं। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और आत्मशुद्धि को जीवन में अपनाना ही वास्तविक गुरुभक्ति है।
प्रवचन में गुरु की संख्या गिनने के बजाय उनके स्वरूप को पहचानने पर जोर दिया गया। श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि चमत्कार और सांसारिक उपलब्धियों की अपेक्षा त्याग, ज्ञान, संयम तथा वीतराग भाव को गुरु की पहचान की कसौटी बनाएं। विवेकपूर्ण श्रद्धा साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाती है।
