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मृत्यु की तैयारी नहीं, आत्मजागरण की साधना है समाधिमरण, जीवन को बदलने वाला संदेश

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Published On: 28 September 2026
मृत्यु की तैयारी नहीं, आत्मजागरण की साधना है समाधिमरण, जीवन को बदलने वाला संदेश

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समाधिमरण: मृत्यु नहीं, आत्मा के प्रति अंतिम सजगता

समाधि के भेद और भेद-विज्ञान से समझिए जीवन की अंतिम साधना

लेखक: डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चंदेरी
राष्ट्रीय गौरव शास्त्री, जैन दर्शन एवं ज्योतिष

समाधिमरण का नाम आते ही मनुष्य के सामने मृत्यु का दृश्य उभर आता है। ऐसा लगता है जैसे जीवन की पूरी कहानी समाप्त होने के बाद अंतिम अध्याय में समाधि का उल्लेख होता है। किंतु जैन दर्शन समाधिमरण को केवल मृत्यु की घटना के रूप में नहीं, बल्कि मृत्यु के समय आत्म-परिणामों की निर्मलता की साधना के रूप में देखता है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—समाधिमरण मृत्यु को रोकने की साधना नहीं, बल्कि मृत्यु के समय राग-द्वेष को रोकने की साधना है। देह का छूटना जीव के हाथ में नहीं है, लेकिन देह छूटते समय परिणाम कैसे हों, इस दिशा में जीवनभर की साधना अपना प्रभाव डाल सकती है।

इसीलिए समाधिमरण केवल अंतिम समय की चर्चा नहीं है। यह उस पूरे जीवन की समीक्षा है, जिसमें मनुष्य देह, धन, परिवार, प्रतिष्ठा, सुविधा और संबंधों के बीच रहते हुए अपने भीतर के राग-द्वेष को कितना पहचान पाया और कितना क्षीण कर पाया।

समाधि के भेद: बाहरी मृत्यु एक, भीतर की यात्रा अलग

जैन परंपरा में समाधि को सामान्य मृत्यु के अर्थ में नहीं समझा गया है। अनशन, इच्छा-निरोध, कषाय-क्षय और आत्मस्वरूप में स्थित होने की भावना इसके गहरे आयाम हैं। परंपरा में समाधिमरण के संदर्भ में भक्तप्रत्याख्यान, इङ्गिनी और प्रायोपगमन जैसे भेदों का उल्लेख मिलता है।

इनका मूल भाव बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि देह और भोग के प्रति आसक्ति को क्रमशः शिथिल करते हुए आत्मोपयोग की ओर बढ़ना है। इन भेदों को केवल मृत्यु की अलग-अलग पद्धतियां समझ लेना समाधि के वास्तविक अर्थ को सीमित कर देता है।

समाधि का वास्तविक विज्ञान बाहरी क्रिया से अधिक अंतरंग परिणामों का विज्ञान है। कोई व्यक्ति भोजन कम कर सकता है, बोलना कम कर सकता है या शांत होकर बैठ सकता है, लेकिन यदि भीतर राग, भय, मोह, मान और ममता का ज्वार चल रहा है तो केवल बाहरी निश्चलता को समाधि नहीं कहा जा सकता।

इसके विपरीत, जिसने जीवनभर अपने परिणामों को संभालने का अभ्यास किया है और जिसके भीतर क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम और अपरिग्रह की भावना विकसित हुई है, उसके लिए अंतिम समय की साधना कोई अचानक किया गया प्रयास नहीं रह जाती। वह उसके पूरे जीवन की परिणति बन जाती है।

भेद-विज्ञान: मैं शरीर नहीं हूं

समाधिमरण की आत्मा को समझना हो तो जैन दर्शन के भेद-विज्ञान को समझना होगा।

मैं शरीर नहीं हूं।
मैं धन नहीं हूं।
मैं घर नहीं हूं।
मैं पद नहीं हूं।
मैं प्रतिष्ठा नहीं हूं।
मैं संबंधों का स्वामी नहीं हूं।

मैं इन सबका उपयोग करने वाला चेतन जीव हूं।

शरीर बदलता है। बाल काले से सफेद होते हैं, त्वचा में परिवर्तन आता है, शारीरिक शक्ति घटती है और इंद्रियां कमजोर होती हैं। लेकिन इन परिवर्तनों को जानने वाला ज्ञाता-द्रष्टा चेतन कौन है? यही प्रश्न भेद-विज्ञान की शुरुआत है।

जब तक मनुष्य ‘मेरा शरीर’, ‘मेरा घर’, ‘मेरा धन’, ‘मेरा परिवार’ और ‘मेरा पद’ कहते-कहते अंततः ‘मैं’ को भी इन्हीं वस्तुओं में खोजता रहेगा, तब तक परिग्रह केवल बाहर नहीं, भीतर भी बना रहेगा।

भेद-विज्ञान कहता है कि वस्तु अपनी जगह है और आत्मा अपनी जगह। देह अपनी जगह है और देही अपनी जगह। परिग्रह बाहर हो सकता है, लेकिन ममत्व भीतर पैदा होता है।

यही अंतर समझ में आने लगे तो वैराग्य भागना नहीं रह जाता, बल्कि भीतर की स्वतंत्रता बनने लगता है।

समाधिमरण की तैयारी बुढ़ापे में नहीं, आज से

अक्सर कहा जाता है कि बुढ़ापे में धर्म करेंगे। लेकिन बुढ़ापा केवल आयु का नाम नहीं है। शरीर कभी भी अपनी सीमाएं बता सकता है। स्मृति कमजोर हो सकती है, चलना कठिन हो सकता है और दूसरों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

फिर प्रश्न उठता है कि जिस मोह को हमने दशकों में मजबूत किया है, क्या उसे अंतिम कुछ दिनों में छोड़ देना इतना आसान होगा?

जिस व्यक्ति ने जीवनभर छोटी-सी वस्तु खोने पर रातभर चिंता की हो, उससे अंतिम समय में समता की अपेक्षा क्यों? जिसे जीवनभर अपमान याद रहा हो, उससे अंतिम समय में क्षमा की अपेक्षा क्यों? जिसने प्रतिष्ठा को अपनी पहचान बना लिया हो, उससे अंतिम समय में मान छोड़ने की अपेक्षा क्यों?

इसीलिए समाधिमरण अंतिम दिनों का पाठ नहीं है। यह प्रतिदिन के परिणामों की पाठशाला है।

शरीर की सेवा और देहासक्ति में अंतर

समाधिमरण की चर्चा करते हुए शरीर की उपेक्षा को वैराग्य समझ लेना उचित नहीं है। शरीर धर्मसाधना का साधन है। इसलिए स्वच्छ रहना, उचित भोजन करना, आवश्यक चिकित्सा लेना, सुरक्षित रहना और उपलब्ध साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना धर्मविरोधी नहीं है।

वाशिंग मशीन का उपयोग करने से कोई अपरिग्रही नहीं रह जाता और उसे छोड़ देने मात्र से कोई वैरागी नहीं बन जाता। प्रश्न वस्तु का नहीं, ममत्व का है।

वाहन का उपयोग करें, लेकिन वाहन प्रतिष्ठा का प्रतीक न बने। सुविधा लें, लेकिन सुविधा के बिना मन अशांत न हो। धन रखें, लेकिन धन जाने पर आत्मा का संतुलन न जाए। परिवार से प्रेम करें, लेकिन प्रेम को स्वामित्व में न बदलें।

यही भेद-विज्ञान का व्यवहारिक रूप है।

जब देह कहे—अब मैं पहले जैसी नहीं हूं

जीवन का एक समय आता है जब शरीर स्वयं अपना परिचय बदलने लगता है। सीढ़ियां कठिन लगती हैं, दूर तक चलना संभव नहीं होता, लंबे समय तक बैठना कठिन हो जाता है और दृष्टि एवं श्रवण पहले जैसे नहीं रहते।

उस समय शरीर की सीमा स्वीकार करना पराजय नहीं है। वैराग्य शरीर से युद्ध नहीं करता, बल्कि शरीर के प्रति ममत्व को पहचानता है।

जहां वाहन की आवश्यकता हो वहां वाहन लें। जहां सहारे की आवश्यकता हो वहां सहारा लें। जहां चिकित्सा जरूरी हो वहां चिकित्सा लें और जहां विश्राम आवश्यक हो वहां विश्राम करें।

धर्म का उद्देश्य देह को अनावश्यक कष्ट देना नहीं, बल्कि कषायों को क्षीण करना है। विशिष्ट व्रत, अनशन या समाधिमरण जैसे विषयों में शास्त्रीय विधि, साधक की वास्तविक स्थिति और योग्य आचार्य के मार्गदर्शन का विशेष महत्व है।

समाधि का सबसे कठिन भेद—अपने भीतर उतरना

दूसरों को त्याग करते देखना सरल है। किसी को वस्त्र छोड़ते देखना सरल है। किसी को उपवास करते या मौन रखते देखना भी सरल है। लेकिन स्वयं के भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को देखना कठिन है।

हम दूसरों के दोष तुरंत देख लेते हैं, लेकिन अपने परिणामों को देखने में वर्षों लग जाते हैं।

समाधि की वास्तविक शुरुआत शायद वहीं होती है, जहां मन पहली बार स्वयं से कहता है—समस्या केवल बाहर नहीं है, मेरे भीतर भी है।

किसी ने मुझे अपमानित किया, लेकिन मेरे भीतर इतना क्रोध क्यों उठा? किसी ने मेरी वस्तु ले ली, लेकिन मेरा मन इतना व्याकुल क्यों हुआ? किसी दूसरे की प्रशंसा हुई तो मेरे भीतर ईर्ष्या क्यों आई?

यही आत्मावलोकन धीरे-धीरे भेद-विज्ञान को जन्म देता है।

अंतिम क्षण में क्या बचेगा?

एक दिन घर यहीं रह जाएगा। संपत्ति यहीं रह जाएगी। पद यहीं रह जाएगा। प्रशंसा यहीं रह जाएगी और शरीर भी यहीं रह जाएगा।

साथ जाएगा तो जीव के कर्मबंध और अपने परिणामों के संस्कार।

इसलिए समाधिमरण का प्रश्न यह नहीं है कि मृत्यु के समय हमारे पास कितना धन था। प्रश्न यह है कि उस समय हमारे भीतर कितना राग था, कितना द्वेष था, कितना भय था, कितना ममत्व था और कितनी समता थी।

यहीं समाधिमरण मृत्यु से ऊपर उठकर आत्मचिंतन बन जाता है।

समाधिमरण: जीवन की अंतिम परीक्षा नहीं, पूरे जीवन का परिणाम

समाधिमरण की सबसे सुंदर व्याख्या शायद यही हो सकती है कि यह मृत्यु की तैयारी कम और जीवन के प्रत्येक क्षण को सही ढंग से जीने की तैयारी अधिक है।

आज किसी को क्षमा कर दीजिए।
आज अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह छोड़ दीजिए।
आज क्रोध के समय स्वयं को रोक लीजिए।
आज किसी की सफलता में प्रसन्न होना सीखिए।
आज कुछ समय अपने भीतर उतरिए।

आज स्वयं से पूछिए—मैं कौन हूं और जिन वस्तुओं को ‘मेरा’ कहता हूं, उनमें वास्तव में मेरा क्या है?

यही प्रश्न धीरे-धीरे भेद-विज्ञान को जगाता है। जब भेद-विज्ञान जागता है, तब संसार वही रहता है, लेकिन संसार के प्रति हमारी दृष्टि बदलने लगती है।

तब वैराग्य घर छोड़ने से पहले ममत्व छोड़ने की प्रक्रिया बनता है। अपरिग्रह वस्तुओं की संख्या से अधिक आसक्ति की तीव्रता का प्रश्न बनता है। संयम केवल नियम नहीं रहता, बल्कि परिणामों की रक्षा बन जाता है।

और तब समाधिमरण मृत्यु का भय नहीं रह जाता—वह आत्मा की ओर लौटने की सजगता बन जाता है।

आज का प्रश्न

यदि मृत्यु आज नहीं भी आने वाली, तब भी समाधिमरण की तैयारी आज क्यों?

क्योंकि मृत्यु का समय हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन आज का परिणाम हमारे हाथ में है।

आज का क्रोध घट सकता है।
आज का मान झुक सकता है।
आज का लोभ कम हो सकता है।
आज का मोह पहचाना जा सकता है।
आज आत्मा और देह का भेद समझा जा सकता है।

और शायद यही समाधिमरण का सबसे बड़ा रहस्य है—

मृत्यु के समय समता पाने की तैयारी मत कीजिए; आज से ऐसा जीवन जीना प्रारंभ कीजिए, जिसकी अंतिम परिणति स्वयं समता बन जाए।

समाधिमरण मृत्यु का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर किए गए आत्म-जागरण की अंतिम शांति है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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