दिल्ली में गुलाबी ठंड के साथ क्यों बढ़ने लगती है सुस्ती? जानिए क्या हैं ‘सीज़नल ब्लूज़’ और इससे निपटने के तरीके
लाइफस्टाइल डेस्क। मौसम बदलते ही कुछ लोगों को सुबह बिस्तर छोड़ना मुश्किल लगने लगता है। दिनभर थकान रहती है, काम में ध्यान कम लगता है और पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में भी मन नहीं लगता। आम बोलचाल में इसे ‘सीज़नल ब्लूज़’ कहा जाता है। हालांकि, सर्दियों में होने वाली हर सुस्ती को अवसाद मान लेना सही नहीं है। जब उदासी के लक्षण गंभीर हों, रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालें और हर साल एक खास मौसम में लौटें, तो यह सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर यानी SAD का संकेत हो सकता है।
मौसम बदलने से मन पर असर क्यों पड़ सकता है?
ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा NHS के अनुसार, SAD का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। माना जाता है कि सर्दियों में दिन की रोशनी कम मिलने से शरीर की जैविक घड़ी और नींद तथा मनोदशा से जुड़ी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे रसायनों में बदलाव की भी संभावित भूमिका है। इसका मतलब यह नहीं कि दिल्ली में ठंड शुरू होते ही हर व्यक्ति को यह समस्या होगी; मौसम का असर अलग-अलग लोगों में अलग हो सकता है।
किन संकेतों पर ध्यान दें?
लगातार उदासी, ऊर्जा की कमी, अधिक नींद आना, ध्यान लगाने में कठिनाई और लोगों से मिलने-जुलने की इच्छा कम होना ऐसे संकेत हैं जिन पर गौर करना चाहिए। सर्दियों से जुड़े SAD में कुछ लोगों की भूख भी बढ़ सकती है, खासकर मीठी या अधिक कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों के लिए। केवल एक-दो दिन आलस महसूस होने से SAD का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। डॉक्टर लक्षणों की अवधि, उनकी गंभीरता और पिछले वर्षों में उनके दोहराने के तरीके को देखकर आकलन करते हैं। NHS के अनुसार, किसी खास मौसम में दो साल या उससे अधिक समय से अवसाद के लक्षण आने पर SAD का निदान किया जा सकता है।
सीज़नल ब्लूज़ से राहत के लिए क्या करें?
दिन में प्राकृतिक रोशनी मिलने पर कुछ समय बाहर बिताना मददगार हो सकता है। नियमित व्यायाम, सोने-जागने का समय तय रखना और परिवार या दोस्तों से संपर्क बनाए रखना भी मनोदशा संभालने के व्यावहारिक तरीके हैं। यदि दिनचर्या बिगड़ रही है, तो अपनी परेशानी किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें। इन कदमों से राहत मिल सकती है, लेकिन गंभीर या लगातार बने रहने वाले लक्षणों के लिए स्वास्थ्य पेशेवर की सलाह जरूरी है।
लाइट थेरेपी या दवा खुद शुरू न करें
SAD के उपचार में बातचीत आधारित थेरेपी, विशेष रूप से कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT), दवाएं और कुछ मामलों में लाइट थेरेपी शामिल हो सकती हैं। कौन-सा तरीका उपयुक्त है, यह व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। लाइट बॉक्स का उपयोग शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना समझदारी है, खासकर यदि आंखों की कोई बीमारी है या ऐसी दवा चल रही है जिससे प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है। विटामिन डी को भी अपने आप SAD का निश्चित इलाज नहीं मानना चाहिए; इसके लाभ पर शोध के नतीजे मिले-जुले हैं।
कब मदद लेना जरूरी है?
यदि उदासी, अत्यधिक नींद या थकान के कारण काम, पढ़ाई या रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करें। हर साल ठंड के आसपास यही परेशानी लौटती है, तो यह जानकारी भी उन्हें बताएं। स्वयं दवा लेने के बजाय सही आकलन कराना बेहतर होगा। यदि कभी खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आएं, तो तुरंत नजदीकी आपातकालीन चिकित्सा सेवा या किसी भरोसेमंद व्यक्ति की मदद लें। मौसम के साथ मनोदशा में बदलाव को समझना और समय पर सहायता लेना, दोनों ही देखभाल के अहम हिस्से हैं।
