IAS पी. नरहरि की फर्जी फेसबुक प्रोफाइल से ठगी का आरोप, रिटायर्ड इंजीनियर के 1.56 लाख रुपये गए
ग्वालियर में फर्नीचर बेचने के बहाने संपर्क किया गया; पुलिस मोबाइल नंबर, सोशल मीडिया प्रोफाइल और लेनदेन की जांच कर रही है
ग्वालियर। आईएएस अधिकारी पी. नरहरि के नाम से बनाई गई कथित फर्जी फेसबुक प्रोफाइल के जरिए ग्वालियर के एक सेवानिवृत्त इंजीनियर से 1.56 लाख रुपये की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता मैथिली शरण गुप्ता का कहना है कि फेसबुक पर आई फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने के बाद उनसे फर्नीचर बेचने के बहाने संपर्क किया गया। रकम भेजने के बाद उन्हें ठगी का संदेह हुआ और उन्होंने पुलिस में शिकायत की। पुलिस मामले से जुड़े फोन नंबर, प्रोफाइल और भुगतान की जानकारी जुटा रही है।
18 सितंबर को आई थी फ्रेंड रिक्वेस्ट
मुरार क्षेत्र के कल्पना नगर निवासी 71 वर्षीय मैथिली शरण गुप्ता सिंचाई विभाग में कार्यपालन यंत्री रहे हैं। उनके अनुसार, 18 सितंबर को उन्हें फेसबुक पर पी. नरहरि के नाम वाली प्रोफाइल से फ्रेंड रिक्वेस्ट मिली। उन्होंने प्रोफाइल को वास्तविक समझकर अनुरोध स्वीकार कर लिया।
शिकायत के अनुसार, इसके बाद प्रोफाइल चलाने वाले व्यक्ति ने उनसे मोबाइल नंबर मांगा। बातचीत आगे बढ़ने पर उन्हें सुमित कुमार नाम के व्यक्ति का नंबर दिया गया। सुमित को सीआरपीएफ कमांडेंट बताया गया था। यह परिचय भी ठगी के लिए इस्तेमाल की गई कहानी का हिस्सा था या नहीं, इसकी पुष्टि जांच से होगी। आईएएस पी. नरहरि की इस कथित फर्नीचर बिक्री में कोई भूमिका सामने नहीं आई है; उनके नाम का इस्तेमाल फर्जी प्रोफाइल बनाने के लिए किए जाने का आरोप है।
ट्रांसफर का हवाला देकर दिया फर्नीचर बेचने का प्रस्ताव
गुप्ता को बताया गया कि सुमित का ट्रांसफर हो चुका है और वह अपना फर्नीचर बेचना चाहते हैं। इसके बाद फर्नीचर की तस्वीरें व्हाट्सएप पर भेजी गईं। गुप्ता को सामान पसंद आया और बातचीत में उसकी कीमत 95 हजार रुपये तय हुई।
यहां से बातचीत ऑनलाइन भुगतान तक पहुंची। शिकायत के मुताबिक, फर्नीचर का सौदा 95 हजार रुपये में तय होने के बावजूद उनसे कुल 1.56 लाख रुपये ले लिए गए। उपलब्ध जानकारी में अतिरिक्त रकम किन-किन कारणों से और कितनी किस्तों में मांगी गई, इसका स्पष्ट विवरण नहीं है। इन लेनदेन की क्रमवार जांच से ही ठगी का पूरा तरीका सामने आएगा।
मामले में यह भी जांच का विषय है कि भुगतान किन खातों या माध्यमों में गया, संबंधित मोबाइल नंबर किसके नाम पर हैं और फर्जी प्रोफाइल किसने बनाई। पुलिस की जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति की पहचान आरोपी के रूप में निश्चित तौर पर बताना उचित नहीं होगा।
पहचान पर भरोसा बना ठगों का हथियार
इस घटना में ठगी की शुरुआत किसी आकर्षक विज्ञापन से नहीं, बल्कि एक परिचित नाम वाली सोशल मीडिया प्रोफाइल से हुई। शिकायत में बताए गए घटनाक्रम के अनुसार, पहले अधिकारी के नाम से भरोसा बनाया गया और फिर फर्नीचर बेचने के लिए दूसरे व्यक्ति से बात कराई गई। तस्वीरें भेजने और कीमत तय होने के बाद भुगतान मांगा गया।
किसी नाम या तस्वीर वाली प्रोफाइल को देखकर उसकी वास्तविक पहचान की पुष्टि नहीं की जा सकती। खासकर जब बातचीत फेसबुक से व्हाट्सएप और फिर भुगतान तक पहुंच जाए, तो संबंधित व्यक्ति को पहले से उपलब्ध किसी विश्वसनीय नंबर पर अलग से संपर्क करके जानकारी जांचना जरूरी है। सामान देखे बिना या बेचने वाले की पहचान सत्यापित किए बिना अग्रिम रकम भेजना जोखिम बढ़ा सकता है।
पुलिस जांच में क्या सामने आना बाकी
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की है। जांच में कथित फर्जी फेसबुक प्रोफाइल, चैट, कॉल विवरण और रकम भेजने के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे। इन्हीं साक्ष्यों से पता चल सकेगा कि गुप्ता से संपर्क करने वाले लोग कौन थे और रकम कहां पहुंची।
ऑनलाइन वित्तीय ठगी होने पर राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर तत्काल सूचना दी जा सकती है। शिकायत पर भी दर्ज कराई जा सकती है। समय पर शिकायत करना आगे की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण है।
ग्वालियर का यह मामला सोशल मीडिया पर पहचान की पुष्टि किए बिना किए गए आर्थिक लेनदेन के खतरे को सामने लाता है। फिलहाल 1.56 लाख रुपये की कथित ठगी की शिकायत पुलिस जांच के अधीन है।
