दसलक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की आराधना, मुनिश्री उपशांत सागर ने बताया उपवास और संयम का महत्व
Morena। दसलक्षण महापर्व के अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन निरंतर किया जा रहा है। महापर्व के सातवें दिन ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा में उत्तम तप धर्म की महिमा का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि, संयम और कर्मों की निर्जरा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि तप के प्रभाव से कर्मों के आवरण क्षीण होते हैं और आत्मा के स्वाभाविक गुणों का प्राकट्य होने लगता है। वहीं, दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की पूजा की जाएगी।
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में तप की महिमा को समझाने के लिए कच्चे आम का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कच्चे आम के भीतर मिठास का गुण मौजूद रहता है, लेकिन कच्चे होने के कारण उसकी मिठास पूरी तरह प्रकट नहीं हो पाती। उचित ताप मिलने पर वही आम पककर मधुर हो जाता है। इसी प्रकार आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति जैसे स्वाभाविक गुण विद्यमान हैं, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं कर पाती। तप एक प्रकार का आध्यात्मिक ताप है, जो कर्मों के आवरण को क्षीण करने और आत्मा के स्वाभाविक गुणों को प्रकट करने में सहायक बनता है।
तप के साथ मन और भावनाओं का संयम आवश्यक
आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना या भूख-प्यास सहन करना नहीं है। बाहरी तप के साथ आंतरिक तप और मन का संयम भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति उपवास करता है, लेकिन उसके भीतर क्रोध, मान, माया, लोभ और विषय-कषायों का प्रभाव कम नहीं होता, तो तप का आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। वास्तविक तप वही है, जिसमें शरीर के साथ मन, वचन और व्यवहार में भी संयम विकसित हो।
कच्चे घड़े का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि कच्चा घड़ा पानी को धारण करने में सक्षम नहीं होता। अग्नि में तपने के बाद वही मिट्टी मजबूत घड़े का रूप धारण कर लेती है और शुभ कार्यों में मंगल कलश के रूप में प्रतिष्ठित होती है। इसी प्रकार संसार के विषयों और कषायों में फंसा जीव कर्मों के प्रभाव से जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है। तप और संयम की साधना के माध्यम से जब कर्मों की निर्जरा होती है, तब आत्मा की शुद्धता प्रकट होने लगती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार तप, व्रत और संयम को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। आचार्यश्री ने कहा कि तप की अग्नि में शरीर को कष्ट देने के बजाय कर्मों को क्षीण करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। केवल भोजन का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आत्मा को परभाव से हटाकर स्वभाव की ओर ले जाना और कषायों को शांत करना भी तप का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
भूखे रहना मात्र उपवास नहीं: मुनिश्री उपशांत सागर
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि तप का वास्तविक उद्देश्य शरीर को पीड़ा देना नहीं, बल्कि मन, वचन और काया को संयमित करते हुए विषय-कषायों से दूर होना है। उन्होंने बताया कि केवल अन्न, जल या फल का त्याग करके भूखे रहना ही व्रत या उपवास नहीं कहलाता। उपवास का वास्तविक अर्थ आत्मा के निकट रहना है।

मुनिश्री ने कहा कि जब उपवास के साथ क्रोध, मान, माया, लोभ और इंद्रिय विषयों का त्याग किया जाता है, तभी तप आत्मशुद्धि का प्रभावी माध्यम बनता है। बाहरी तप के साथ आंतरिक तप भी आवश्यक है, क्योंकि साधना का उद्देश्य आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी क्षमता के अनुसार तप, व्रत, उपवास और संयम को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। तप आत्मबल को बढ़ाने, कर्मों की निर्जरा करने और मोक्षमार्ग की साधना में सहायक माना गया है।
जिनालयों में धार्मिक आयोजनों की धूम
नगर के विभिन्न जिनालयों में दसलक्षण महापर्व को लेकर धार्मिक उत्साह का वातावरण बना हुआ है। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री ‘व्याकरणाचार्य’ के निर्देशन में प्रातःकालीन बेला में भगवान जिनेंद्र प्रभु का जलाभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन और संगीतमय विशेष पूजन किया जाता है। इन धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग लेकर भगवान की आराधना करते हैं।
शाम के समय महेंद्रकुमार शास्त्री शास्त्र गद्दी पर विराजमान होकर दसलक्षण धर्म के अंतर्गत प्रतिदिन एक धर्म की व्याख्या करते हैं। वे धर्म के सिद्धांतों और उनके व्यावहारिक महत्व को सरल भाषा में उपस्थित साधर्मी बंधुओं को समझाते हैं। इसके बाद महाआरती, प्रश्न मंच और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
आठवें दिन होगी उत्तम त्याग धर्म की पूजा
दसलक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की आराधना के दौरान श्रद्धालुओं को आत्मसंयम, कर्मों की निर्जरा और आंतरिक शुद्धता का संदेश दिया गया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने तप, व्रत और संयम के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की पूजा की जाएगी, जिसके अंतर्गत त्याग, आत्मसंयम और परिग्रह से दूरी जैसे आध्यात्मिक विषयों पर धार्मिक मार्गदर्शन दिया जाएगा।
