निपुणरत्न विजयजी व जापानी भक्तों को दर्शन सागरजी की कृति भेंट
गुरु बिन जीवन अधूरा
भायंदर। श्री थराद त्रिस्तुतिक जैन संघ में चातुर्मास हेतु बिराजमान पुण्य सम्राट परम पूज्य आचार्य श्री विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य रत्न, प्रखर प्रवचनकार, मुनिराज श्री निपुणरत्न विजयजी व पर्व पर्युषण की आराधना करने आए जापानी भक्तों को गुरु दर्शन सागर सूरीश्वरजी म.सा. के जीवन पर आधारित पुस्तक ‘मेरे गुरुवर, दर्शन सागर गागर में सागर’ प्रदान की गई। इस पावन अवसर ने भायंदर क्षेत्र में गुरु महिमा के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति का विशेष वातावरण निर्मित किया।
पर्युषण पर्व के दौरान बना यह विशेष अवसर
पर्युषण पर्व, जो जैन धर्म के सबसे पावन पर्वों में से एक माना जाता है, के दौरान आयोजित इस कार्यक्रम ने आध्यात्मिक आराधना के साथ-साथ गुरु-भक्ति के भाव को भी सशक्त रूप से प्रदर्शित किया। जापान से विशेष रूप से पर्युषण की आराधना हेतु पधारे भक्तों की उपस्थिति ने इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप भी प्रदान किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि जैन धर्म एवं गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा केवल भारत तक ही सीमित नहीं, बल्कि विश्वभर में व्याप्त है।
थराद भवन में हुआ पुस्तक भेंट का कार्यक्रम
भायंदर (वेस्ट) के थराद भवन में पुस्तक की लेखिका संगीता बागरेचा-बाफना (संगी) ने यह पुस्तक गुरुदेव व जापान की तुलसी जैन को भेंट की। इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने इस पावन क्षण को श्रद्धापूर्वक देखा। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस अवसर को गुरु-शिष्य परंपरा की एक अनूठी मिसाल बताया। पुस्तक भेंट के इस औपचारिक कार्यक्रम में धार्मिक गरिमा एवं भावनात्मक उत्साह दोनों का सुंदर मेल देखने को मिला।
निपुणरत्नजी ने बताया गुरु शब्द का गहरा अर्थ
इस अवसर पर निपुणरत्नजी ने कहा कि गुरु का महत्व सिर्फ ज्ञान देने में नहीं, बल्कि दृष्टि देने में है। उन्होंने कहा कि ‘गु’ का अर्थ है अंधकार, ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। जो आपके भीतर के अज्ञान, भ्रम और अहंकार के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीपक जलाए, वही गुरु है। उनके इस प्रेरणादायक संबोधन ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को गुरु के वास्तविक स्वरूप से अवगत कराया। मुनिराज ने अपने प्रवचन में यह भी कहा कि आज के भौतिकवादी युग में गुरु की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वे ही व्यक्ति को सही मार्ग दिखाने में सक्षम होते हैं।
तुलसी जैन ने कहा—बोध गुरु से ही मिलता है
तुलसी जैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ज्ञान तो किताबों में भी है, पर बोध गुरु से ही मिलता है। उनके इस कथन ने उपस्थित लोगों के मन में गुरु के प्रति श्रद्धा को और गहरा किया। जापान से आई इस भक्त की बातों ने यह भी दर्शाया कि गुरु महिमा की यह भावना केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर के जैन अनुयायियों में समान रूप से व्याप्त है। उनके अनुभव और भाव भारतीय श्रद्धालुओं के लिए भी अत्यंत प्रेरणादायक रहे।
लेखिका ने गुरु को बताया आइना
पुस्तक की लेखिका संगीता बागरेचा-बाफना ने कहा कि गुरु आइना है। माता-पिता शरीर देते हैं, गुरु जीवन का अर्थ देते हैं। वो आपके दोष नहीं गिनाता, आपको आपका स्वरूप दिखा देता है। इसीलिए कबीर ने कहा है कि,
“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।”
लेखिका के इन विचारों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को गुरु-शिष्य संबंध की गहराई एवं महत्व को भलीभांति समझाया। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक लिखने के पीछे उनका उद्देश्य गुरुदेव दर्शन सागर सूरीश्वरजी म.सा. के जीवन एवं शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना था, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके आदर्शों से प्रेरणा ले सकें।
युथ फोरम अध्यक्ष की रही उपस्थिति
इस अवसर पर युथ फोरम के अध्यक्ष दीपक जैन भी उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और अधिक बढ़ा दिया, तथा युवाओं में भी गुरु महिमा के प्रति जागरूकता का संदेश गया। युवा पीढ़ी की इस कार्यक्रम में सहभागिता यह दर्शाती है कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति नई पीढ़ी में भी रुचि एवं श्रद्धा बरकरार है।
गुरु-शिष्य परंपरा को मिला नया आयाम
इस पूरे आयोजन ने भायंदर क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को एक बार फिर उजागर किया। पुस्तक भेंट के इस अनूठे कार्यक्रम ने न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं बल्कि जापान से आए भक्तों को भी भारतीय संस्कृति एवं जैन धर्म की गहराई से परिचित कराया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने इस अवसर को अपने जीवन का एक स्मरणीय क्षण बताया और गुरुदेव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
आध्यात्मिक संदेश के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के प्रति नमन करते हुए यह संकल्प लिया कि वे गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाएंगे। इस भव्य एवं भावपूर्ण आयोजन ने भायंदर क्षेत्र में गुरु महिमा एवं जैन धर्म की शिक्षाओं को नई ऊर्जा प्रदान की, जिससे आने वाले समय में भी इस प्रकार के आध्यात्मिक कार्यक्रमों के आयोजन की परंपरा जारी रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
