Uttam Arjav Dharma: मन, वचन और कर्म की सरलता से होती है आत्मा की शुद्धि—आर्यिका सुदृढ़मति माताजी
कंचन बाग स्थित दिगम्बर जैन समवशरण मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन; दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन श्रद्धालुओं ने की उत्तम आर्जव धर्म की आराधना
इंदौर। दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन कंचन बाग स्थित दिगम्बर जैन समवशरण मंदिर में उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक आराधना की गई। आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्री सुदृढ़मति माताजी एवं आर्यिका श्री सुलेखमति माताजी के पावन सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में समाजजनों ने शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त किया। मंदिर परिसर सुबह से ही भगवान के जयकारों, मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत से गुंजायमान रहा।
अभिषेक और शांतिधारा के साथ हुई शुरुआत
धार्मिक कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकाल मूलनायक भगवान श्री 1008 शांतिनाथ भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा से हुई। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान का अभिषेक किया और विश्व शांति, समाज की सुख-समृद्धि तथा सभी जीवों के कल्याण की मंगल कामना की। शांतिधारा के दौरान विधिवत मंत्रोच्चार किया गया, जिससे पूरे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक और शांतिमय वातावरण बन गया।
अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात देव-शास्त्र-गुरु, सोलहकारण, पंचमेरु और दशलक्षण धर्म की पूजा की गई। श्रद्धालुओं ने भगवान शांतिनाथ के समक्ष अर्घ्य समर्पित कर धर्म के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। पूजा के दौरान महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
मन में जो हो, वही व्यवहार में दिखाई दे
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका श्री सुदृढ़मति माताजी ने उत्तम आर्जव धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के मन में जो भावना हो, वही उसकी वाणी और व्यवहार में भी प्रकट होनी चाहिए। मन में कुछ और रखना तथा बाहर कुछ और बोलना या प्रदर्शित करना कुटिलता की श्रेणी में आता है।
उन्होंने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म का आत्मा की शुद्धि से गहरा संबंध है। आर्जव का अर्थ सरलता, सहजता और निष्कपटता है। जब व्यक्ति मन, वचन और काया से एकरूप हो जाता है, तभी वह वास्तविक रूप से आर्जव धर्म का पालन कर सकता है। छल-कपट से मुक्त जीवन ही व्यक्ति को आंतरिक शांति और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।
माया, कपट और दिखावे से बचना जरूरी
आर्यिका श्री ने कहा कि मनुष्य अनेक प्रकार की माया, कपट, छल और दिखावे में फंस जाता है। अपने वास्तविक दोषों को छिपाना, अपने गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और दूसरों को प्रभावित करने के लिए झूठा रूप धारण करना कपट के ही अलग-अलग रूप हैं। मन में कुछ और रखकर बाहर कुछ और कहना भी आत्मा की सरलता को समाप्त करता है।
उन्होंने कहा कि केवल दूसरों के सामने धार्मिकता का प्रदर्शन करना वास्तविक धर्म नहीं है। प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए स्वयं को वास्तविकता से अधिक श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास भी व्यक्ति को धर्म के मूल उद्देश्य से दूर कर देता है। धर्म का संबंध बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर होने वाले सकारात्मक परिवर्तन से है।
कपट छोड़ने से जीवन में आती है सरलता
आर्यिका सुदृढ़मति माताजी ने कहा कि कपट व्यक्ति के मन को अशांत बनाता है और उसके संबंधों को भी प्रभावित करता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में सच्चाई, सरलता और निष्कपटता अपनाता है, उसके विचार और व्यवहार में स्वाभाविक पवित्रता दिखाई देती है। आर्जव धर्म मनुष्य को अपने दोष स्वीकार करने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहें, बल्कि धर्म के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में उतारने का प्रयास करें। मन, वचन और कर्म में समानता रखते हुए छल, दिखावा और कुटिलता का त्याग करना ही उत्तम आर्जव धर्म की सच्ची साधना है।
समाजजनों ने उत्साहपूर्वक लिया धर्मलाभ
मंदिर के प्रचार प्रमुख प्रवीण जैन ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के अवसर पर मंदिर में प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, स्वाध्याय एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कार्यक्रम में मंदिर समिति के अध्यक्ष सुमत लुहाड़िया, कार्याध्यक्ष अजीत जैन और हसमुख गांधी सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
सभी श्रद्धालुओं ने आर्यिका संघ से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आयोजन के दौरान समाजजनों ने आत्मशुद्धि, सत्य, सरलता और निष्कपटता को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
