इंदौर के दलाल बाग में 16 से 25 सितंबर तक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में श्रावक संस्कार शिविर आयोजित हो रहा है। आयोजकों के अनुसार 6 हजार से अधिक शिविरार्थियों ने पंजीयन कराया है।
*गृहस्थ में साधुता की साधना: श्रावक संस्कार शिविर का अद्भुत प्रयोग**
* डॉ. जैनेंद्र जैन*
संतों के प्रवचन सुनना सहज है, सुनकर आचरण करना कठिन है और गृहस्थ होकर भी साधु-सा जीवन जी लेना तो कल्पना से परे लगता है। पर यह कल्पना इंदौर की धरा पर साकार होने जा रही है।
पर्यूषण पर्व के पावन अवसर पर दिनांक 16 से 25 सितंबर तक दलाल बाग, छत्रपति नगर की वसुंधरा पर एक ऐसा इतिहास रचा जाने वाला है, जो जैन धर्म के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होगा। श्रमण संस्कृति के महाश्रमण, तीर्थंकर-सम उपकारी, जगतपूज्य मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में होने जा रहा है – *विश्व का अद्वितीय श्रावक संस्कार शिविर।*
यह कोई सामान्य शिविर नहीं, यह जीवन की दिशा बदलने वाली प्रयोगशाला है।
*6 हजार शिविरार्थी, एक संकल्प*
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू के अनुसार इस शिविर में देश-विदेश से 6 हजार से अधिक शिविरार्थियों ने अपना पंजीयन कराया है। सोचिए, 6 हजार लोग, 10 दिनों के लिए अपना घर, परिवार, मोबाइल, बिस्तर और वैभव का त्याग कर, बाहरी दुनिया की चकाचौंध से दूर, एक साधक के रूप में जीवन जिएंगे। वे अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर, 10 लक्षण धर्म पर्व की आराधना करेंगे।
यह यात्रा 1993 में ललितपुर (उ.प्र.) से मात्र 125 शिविरार्थियों से प्रारंभ हुई थी। आज वटवृक्ष बनकर 6000 तक पहुँच गई है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है – यहाँ सामान्य श्रावक से लेकर IAS, डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, उद्योगपति, व्यापारी और उच्च शिक्षित वर्ग भी एक धोती-दुपट्टे में, समान रूप से साधना करता है। यहाँ न कोई बड़ा है, न कोई छोटा। सब एक ही पंक्ति में, मौनपूर्वक, एक समय आहार करते हैं।
*ढोंग का नहीं, ढंग का धर्म*
पूज्य सुधासागर जी महाराज का मूल मंत्र है – “ढोंग का नहीं, ढंग का धर्म”। इस शिविर में यही संस्कार दिया जाता है। पत्तेदार सब्जी और जमीकंद का त्याग, केश-तेल, दर्पण, कंघा और सौंदर्य प्रसाधनों से दूरी, उपवास और संयम – यह सब सिखाता है कि भौतिकता के बिना भी आनंदपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
इस शिविर की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? इस शिविर में संस्कारित हुए अनेक शिविरार्थियों ने संसार के वैभव को छोड़कर जैनेश्वरी मुनि दीक्षा धारण कर ली और आज पूरे देश में श्रमण संस्कृति को गौरवान्वित कर रहे हैं। यह शिविर केवल शिविर नहीं, वैराग्य की प्रथम पाठशाला है।
*अहिंसा और वात्सल्य का संगम*
सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में हो रहे इस शिविर की एक और अद्भुत परम्परा है। सभी शिविरार्थियों को नगर के जैन परिवार अपने घर अतिथि के रूप में ले जाकर, बड़े वात्सल्य से शुद्ध, सात्विक और मर्यादित आहार कराते हैं। कौन शिविरार्थी किसके घर जाएगा, यह व्यवस्था भी सुनियोजित है। यह केवल आहार नहीं, यह आत्मीयता का, अतिथि देवो भवः का जीवंत उदाहरण है।
*पुण्यार्जक परिवार का समर्पण*
ऐसे विशाल आयोजन के लिए उदार हृदय और निरभिमानी मन चाहिए। इस वर्ष इस पुण्य का सम्पूर्ण व्यय वहन करने और सुंदर व्यवस्था करने का सौभाग्य नगर के महादानी, सेठ चामुंडराय की उपाधि से अलंकृत श्री आकाश-आलोक जैन (कोयला परिवार) ने प्राप्त किया है। उनका समर्पण वास्तव में अभिनंदनीय है।
मिनी बुंदेलखंड के रूप में प्रसिद्ध छत्रपति नगर, दलाल बाग में होने वाला यह शिविर निश्चय ही इंदौर में स्वर्णिम इतिहास रचेगा। इसकी स्मृति लोगों के मन-मस्तिष्क पर चंदन और कस्तूरी की गंध की तरह सदैव अंकित रहेगी।
यह शिविर हमें सिखाएगा कि धर्म केवल मंदिर में पूजा करने का नाम नहीं, धर्म तो अनुशासित, संयमित और ढंग से जीने की कला का नाम है।
*लेखक – छत्रपति नगर दिगंबर जैन समाज एवं जिनालय ट्रस्ट के कार्याध्यक्ष एवं वरिष्ठ समाजसेवी हैं।*
