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अद्भुत रहा श्रावक संस्कार शिविर का प्रथम दिवस – “क्रोध शक्ति नहीं, कमजोरी की निशानी है” – मुनिपुंगव सुधासागर जी

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Published On: 16 September 2026
अद्भुत रहा श्रावक संस्कार शिविर का प्रथम दिवस - "क्रोध शक्ति नहीं, कमजोरी की निशानी है" - मुनिपुंगव सुधासागर जी

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*अद्भुत रहा श्रावक संस्कार शिविर का प्रथम दिवस – “क्रोध शक्ति नहीं, कमजोरी की निशानी है” – मुनिपुंगव सुधासागर जी*

राजेश जैन दद्दू
*इंदौर।* दलाल बाग परिसर में चल रहे *श्रावक संस्कार शिविर* के प्रथम दिवस धर्म और संस्कारों से ओत-प्रोत अद्भुत दृश्य देखने को मिला। हजारों की संख्या में शिविरार्थी एवं धर्मप्रेमी समाजजन गुरुदेव की अमृतवाणी सुनने के लिए उपस्थित रहे। पूरा वातावरण भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि महापर्व पर्युषण पर्व के प्रथम दिन तीर्थ चक्रवर्ती जगतगुरु महाश्रमण मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने *उत्तम क्षमा धर्म* की व्याख्या करते हुए कहा कि –

> *”क्रोध शक्ति नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है।”*

व्यक्ति जब अपने से कमजोर, गरीब या अपने अधीन व्यक्ति पर क्रोध करता है, तब वह अपनी ताकत नहीं बल्कि अपनी कमजोरी प्रदर्शित करता है। गुरुदेव ने कहा कि अपने से कमजोर पर क्रोध नहीं करना चाहिए, अपने से अधिक शक्तिशाली पर भी क्रोध नहीं करना चाहिए और अपने पूजनीय – माता-पिता, गुरु एवं भगवान – के प्रति भी किसी परिस्थिति में क्रोध नहीं करना चाहिए। गुरु देव ने आज चार सूत्र अत्यंत मार्मिक संदेश देते हुए कहा –

> *”सहारा नहीं दे सकते तो धक्का मत देना।*
> *गिरे हुए को उठा नहीं सकते तो गिराना मत।*
> *आँसू नहीं पोंछ सकते तो रुलाना मत।”*
वर्तमान शासन नायक
भगवान महावीर के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान के सामने झुकना भक्ति है, लेकिन किसी छोटे से छोटे जीव की रक्षा के लिए झुक जाना अहिंसा और करुणा है।

> *”मेरे लिए झुकोगे तो भक्त बनोगे, चींटी को बचाने के लिए झुकोगे तो भगवान बनोगे।”*
सच्ची भक्ति की परीक्षा तब होती है जब परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल न हों। भगवान और गुरु के प्रति श्रद्धा स्वार्थ पर आधारित नहीं होनी चाहिए। काम पूरा हो तो भगवान को मानना और काम न हो तो भगवान से नाराज हो जाना भक्ति नहीं है।
भगवान श्रीराम के चरित्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि राज्य और अयोध्या का सुख छिन जाने के बाद भी श्रीराम ने माता कैकेयी के प्रति क्रोध नहीं किया। पूजनीय के प्रति सम्मान परिस्थिति बदलने से नहीं बदलना चाहिए।
समाज को सुंदर सूत्र देते हुए गुरुदेव ने कहा –

> *”जो हमारे पूजनीय हैं, उन्हें अपने अनुकूल बनाने का प्रयास मत करो; स्वयं उनके अनुकूल बनने का प्रयास करो। और जो हमसे कमजोर हैं, उन्हें अपने समान बनाने का प्रयास करो।”*

यही उत्तम क्षमा, करुणा, अहिंसा और सच्चे संस्कार का मार्ग है। केवल “मिच्छामि दुक्कड़म्” कहकर क्षमा माँगना नहीं, बल्कि क्षमा को व्यवहार और जीवन का हिस्सा बनाना है।धर्मसभा में हजारों की उपस्थिति
संस्कार शिविर के प्रथम दिवस हजारों की संख्या में समाजजन की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। शिविरार्थियों में अनुशासन, मौन, संयम और गुरुभक्ति का अद्भुत भाव देखने को मिला।
धर्मसभा में संजय पाटोदी आनंद नवीन गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आकाश आलोक कोल डॉ जैनेन्द्र जैन प्रिंसिपल टोंग्या, हुकुमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय धुर्रा
सोनाली बागड़िया, मुक्ता जैन भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।
*निष्कर्ष : संस्कार शिविर का पहला दिन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर बन गया।*

*क्रोध छोड़ें • क्षमा अपनाएँ*
*कमजोर को सहारा दें • पूजनीयों के प्रति विनय रखें*
*अहिंसा को जीवन में उतारें • भक्ति को स्वार्थ से मुक्त करें*

*उत्तम क्षमा धर्म की जय।*
*मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज की जय।*

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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