प्रभात पट्टन तहसील के गांवों में धूमधाम से मना पशुधन पोला पर्व
किसानों ने बैल जोड़ियों का किया आकर्षक श्रृंगार, वायगांव और बिसनूर में प्रतियोगिता आयोजित कर दिए पुरस्कार
रिपोर्टर: आशीष ठाकरे
दैनिक स्वराज वाणी | प्रभात पट्टन/बैतूल। प्रभात पट्टन तहसील क्षेत्र के विभिन्न गांवों में गुरुवार को पशुधन पोला पर्व पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। किसानों ने अपने बैलों को विशेष रूप से सजाया और बैंड-बाजे के साथ उन्हें पोला मैदान तक लेकर पहुंचे। इस अवसर पर बैल जोड़ियों का सामूहिक पूजन किया गया तथा बेहतर सजावट वाली जोड़ियों को पुरस्कार देकर पशुपालकों का सम्मान किया गया।
पोला पर्व के कारण गांवों में गुरुवार को खेती से जुड़े अधिकांश काम बंद रहे। किसान सुबह से ही अपने बैलों के श्रृंगार और पूजा की तैयारियों में जुट गए थे। गांवों में सजे-धजे बैलों का भ्रमण कराया गया। इस दौरान बच्चों, महिलाओं और ग्रामीणों में विशेष उत्साह दिखाई दिया।
एक दिन पहले से शुरू हो गई थीं तैयारियां
पोला पर्व के एक दिन पहले ही किसानों ने अपने पशुओं की देखभाल और सजावट की तैयारियां शुरू कर दी थीं। बैलों की तेल, घी और हल्दी से मालिश की गई। इसके बाद उन्हें स्नान कराकर पोला पर्व के लिए तैयार किया गया।
पर्व के दिन बैलों को मोरपंख, रंग-बिरंगे कपड़ों, झालरों, घंटियों, घुंघरुओं और अन्य पारंपरिक सजावटी सामग्री से सजाया गया। कई किसानों ने बैलों के सींगों को भी आकर्षक रूप दिया। सजे हुए बैलों को गांव की गलियों और प्रमुख मार्गों से निकालकर पोला मैदान तक ले जाया गया।
पोला मैदान में परंपरा के अनुसार तोरण के नीचे बैल जोड़ियों को ले जाया गया और उनका सामूहिक नंदी पूजन किया गया। ग्रामीणों ने खेती में पशुधन के योगदान को याद करते हुए बैलों के स्वस्थ रहने और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की।
खेतों में रहा अवकाश, पशुधन के प्रति जताया आभार
पोला पर्व किसानों और पशुधन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक माना जाता है। खेती के काम में बैलों के योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए किसान इस दिन उन्हें विश्राम देते हैं। इसी परंपरा के चलते पर्व के दिन खेतों में काम नहीं किया गया।
किसानों ने कहा कि बैल लंबे समय से ग्रामीण कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। आधुनिक कृषि यंत्रों के बढ़ते उपयोग के बावजूद ग्रामीण संस्कृति में पशुधन और विशेष रूप से बैलों का सम्मान आज भी बना हुआ है। पोला पर्व इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
वायगांव में बैल सजाओ प्रतियोगिता
ग्राम वायगांव में समाप्त होती बैल पोला परंपरा को पुनर्जीवित और संरक्षित करने के उद्देश्य से आयोजन समिति द्वारा बैल सजाओ प्रतियोगिता आयोजित की गई। समिति पिछले कई वर्षों से पारंपरिक तरीके से सजाई गई बैल जोड़ियों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार देकर किसानों को प्रोत्साहित कर रही है।
इस वर्ष भी बैंड-बाजे के साथ वृषभराज का स्वागत और अभिनंदन किया गया। प्रतियोगिता के दौरान बैलों की सजावट, पारंपरिक स्वरूप और प्रस्तुति के आधार पर पुरस्कार प्रदान किए गए।
समिति से जुड़े ग्राम पटेल सहदेव धोटे, गुड्डी पटेल, राजेश मकोड़े और गजानन धोटे ने बताया कि श्रवण दरवाई की बैल जोड़ी को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार के रूप में बैलों की सजावट में उपयोग होने वाली झूल, ऐंठन और पैजन भेंट की गई।
पंडरी वागदरे की बैल जोड़ी ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इस जोड़ी के पशुपालक को घंटी और घुंघरू पुरस्कार स्वरूप दिए गए। पंडरी चढ़ोकार की बैल जोड़ी को तृतीय पुरस्कार के रूप में पीतल की चेन और पैजन प्रदान की गई।
बिसनूर में भी सजी बैल जोड़ियां
ग्राम बिसनूर में भी पोला आयोजन समिति द्वारा बैल सजाओ प्रतियोगिता आयोजित की गई। कार्यक्रम में किसानों ने अपनी बैल जोड़ियों को पारंपरिक तरीके से सजाकर प्रस्तुत किया। ग्रामीणों ने सजी हुई बैल जोड़ियों को देखा और पशुपालकों के प्रयासों की सराहना की।
आयोजन समिति के मंछित लोखंडे ने बताया कि प्रतियोगिता में धनराज दाते की बैल जोड़ी को प्रथम स्थान मिला। अर्जुन बावने की बैल जोड़ी ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दोनों विजेताओं को समिति की ओर से स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
परंपरा और पशुधन के सम्मान का पर्व
मंछित लोखंडे ने कहा कि पोला पर्व ग्रामीण संस्कृति और पशुधन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। खेती में पशुओं के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को ग्रामीण परंपराओं और कृषि संस्कृति की जानकारी मिलती है।
उन्होंने कहा कि बैल सजाओ प्रतियोगिताओं का उद्देश्य केवल पुरस्कार देना नहीं, बल्कि पोला पर्व की परंपरा को जीवित रखना और पशुपालकों को अपने पशुओं की बेहतर देखभाल के लिए प्रोत्साहित करना है।
कार्यक्रमों के दौरान बैंड-बाजे की धुन और ग्रामीणों के उत्साह से वातावरण उल्लासपूर्ण बना रहा। किसानों ने बैलों का पूजन कर उन्हें विशेष आहार दिया। वायगांव, बिसनूर और आसपास के गांवों में आयोजित कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में ग्रामीणों, किसानों, पशुपालकों और बच्चों ने भाग लिया।
