श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिन गूंजे भगवान महावीर के संदेश
भक्ति, तप और साधना के साथ हुई धर्म आराधना, पांच मौलिक कर्तव्यों पर किया गया चिंतन
सचित्र एसआरपी-2: पूजा-अर्चना करते समाजजन।
सचित्र एसआरपी-3: प्रवचन देते श्रावक।
पर्यूषण महापर्व को जैन समाज में आत्मनिरीक्षण, संयम, क्षमा और साधना का विशेष अवसर माना जाता है। पर्व के दौरान श्रद्धालु मन, वचन और काया से शुद्ध आचरण करने तथा भगवान महावीर के सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह के सिद्धांतों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं।
हृदयरत्न महाराज साहब की पावन निश्रा
पर्यूषण महापर्व के अंतर्गत आयोजित होने वाले समस्त धार्मिक कार्यक्रम परम पूज्य हृदयरत्न महाराज साहब की पावन निश्रा में संपन्न हो रहे हैं। उनकी मंगल उपस्थिति से धर्मसभा में आध्यात्मिक ऊर्जा और उत्साह का संचार हो रहा है।
श्रीसंघ में विशेष आराधना, जप-तप और विधिवत धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए भिवंडी से किनाल जैन, सिद्धार्थ जैन एवं पारसमल जैन का आगमन हुआ। श्रीसंघ के पदाधिकारियों और समाज के प्रबुद्धजनों ने सभी आराधकों का भावभीना स्वागत किया।
मंगलवार से आगामी तीन दिनों तक श्रीसंघ में अष्टाह्निका व्याख्यान और प्रवचन आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में श्रद्धालुओं के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।
पांच मौलिक कर्तव्यों पर हुआ चिंतन
पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन आयोजित धर्मसभा में पांच प्रमुख कर्तव्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। आराधकों ने बताया कि पर्यूषण केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करते हुए परमात्मा की ओर अग्रसर करने वाला अनुष्ठान है।
श्रद्धालुओं से पर्व के दौरान अहिंसा, साधार्मिक भक्ति, क्षमापना, तप और चैत्य परिपाटी जैसे कर्तव्यों को अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया गया।
मन, वचन और काया से अहिंसा का पालन
व्याख्यान में बताया गया कि पर्यूषण के दिनों में किसी भी जीव की हिंसा न हो, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। अहिंसा का पालन केवल शारीरिक स्तर पर नहीं, बल्कि मन, वचन और काया से होना चाहिए।
मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना, वाणी से किसी को दुःख नहीं पहुंचाना और प्रत्येक जीव के प्रति दया एवं करुणा का भाव रखना अहिंसा की वास्तविक साधना है। जीवदया को भगवान महावीर के संदेशों का महत्वपूर्ण आधार बताया गया।
साधार्मिक भाइयों के प्रति रखें सहयोग का भाव
साधार्मिक भक्ति के बारे में बताया गया कि जैन समाज के भाइयों और बहनों के प्रति निस्वार्थ प्रेम, सम्मान तथा सहयोग की भावना रखना चाहिए। धर्मबंधुओं की सेवा और कठिन परिस्थितियों में उनकी सहायता करना सच्ची साधार्मिक भक्ति है।
श्रद्धालुओं से समाज में आपसी सद्भाव, एकता और सहयोग को बढ़ाने का आग्रह किया गया। कहा गया कि धर्म की सार्थकता तभी है, जब व्यक्ति अपने व्यवहार में करुणा, विनम्रता और सेवा भावना को स्थान दे।
क्षमा जैन दर्शन का मूल स्तंभ
धर्मसभा में क्षमापना के महत्व पर विशेष प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि क्षमा जैन दर्शन का मूल स्तंभ है। जीवन में जाने-अनजाने हुए अपराधों, मनमुटाव और कटुता को समाप्त कर सभी जीवों से क्षमा मांगनी चाहिए।
दूसरों को हृदय से क्षमा करना भी उतना ही आवश्यक है। मन में क्रोध, अहंकार और द्वेष रखने से आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हो सकती। क्षमापना मन की मलीनता दूर कर आपसी संबंधों में प्रेम और सद्भाव बढ़ाती है।
उपवास और अट्ठम तप की प्रेरणा
पर्यूषण काल में शरीर और इंद्रियों के संयम के लिए उपवास, एकासन और अट्ठम तप सहित विभिन्न तप-साधनाएं की जाती हैं। धर्मसभा में श्रद्धालुओं को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार तप करने की प्रेरणा दी गई।
लगातार तीन दिनों तक किए जाने वाले अट्ठम तप का धार्मिक महत्व भी समझाया गया। कहा गया कि तप केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि इच्छाओं, क्रोध और नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण करने का अभ्यास है।
प्रतिदिन जिनालय जाकर करें प्रभु दर्शन
श्रद्धालुओं को प्रतिदिन जिनालय पहुंचकर भगवान के दर्शन और पूजा करने का संदेश दिया गया। जिन प्रतिमा के समक्ष आत्मसमर्पण, ध्यान एवं प्रार्थना करने से मन को एकाग्रता और शांति मिलती है।
महापर्व के प्रथम दिन प्रभु भक्ति, स्नात्र पूजन, केसर पूजा, दुग्धाभिषेक, महाआरती, प्रभावना, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और सामूहिक जप-तप के कार्यक्रम आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया।
आज 11 वार्षिक कर्तव्यों पर होगा व्याख्यान
श्रीसंघ के पदाधिकारियों ने बताया कि पर्यूषण महापर्व के दूसरे दिन आयोजित विशेष व्याख्यान में जैन धर्म के 11 वार्षिक कर्तव्यों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। समाज के सभी श्रद्धालुओं से निर्धारित समय पर उपस्थित होकर धर्मलाभ लेने का आग्रह किया गया है।
आयोजकों ने कहा कि पर्यूषण महापर्व मनुष्य को संयम, सदाचार और आत्मचिंतन के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक समाजजन को पर्व की शिक्षाओं को दैनिक जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
ये परिवार रहे धार्मिक आयोजन के लाभार्थी
आराधना कराने पहुंचे श्रावकों के लिए आयोजित साधार्मिक भक्ति में प्रथम दिन प्रेमचंद जैन कानड़ वाले परिवार लाभार्थी रहा। स्नात्र पूजन के कायमी लाभार्थी के रूप में सज्जन सिंह-अनिल कुमार श्रीमाल परिवार ने धर्मलाभ लिया।
इस अवसर पर श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप बरड़िया, विजय जैन, श्रेयांश पारख, अशोक श्रीमाल, संजय बरड़िया, गौरव श्रीमाल, सुभाष बावेल, संतोष बरड़िया, पारस पारख, विजय बरड़िया, मोहनलाल ललवानी, श्वेता अंशुल श्रीमाल, तृप्ति लोढ़ा, अनुराधा बरड़िया, दीप्ति बरड़िया और दशा श्रीमाल सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
