जैन धर्म जाति नहीं, अनादि और शाश्वत आध्यात्मिक परंपरा
मुरैना (मनोज जैन नायक) । जैन दर्शन केवल जीवन जीने की पद्धति या किसी विशेष सामाजिक समुदाय की पहचान नहीं है, बल्कि यह अनादि और शाश्वत आध्यात्मिक परंपरा है। अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और आत्मकल्याण जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित जैन दर्शन प्रत्येक जीव के आध्यात्मिक उत्थान और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलता है। जैन मान्यता के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को व्यवस्थित जीवन, श्रम, अनुशासन और आत्मसंयम की दिशा प्रदान की। उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत का भी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। जैन परंपरा में भारतवर्ष के नाम को भी सम्राट भरत से जोड़ा जाता है।
अहिंसा और सह-अस्तित्व का संदेश
जैन धर्म का मूल संदेश ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ है, जिसका अर्थ है कि जीव एक-दूसरे के उपकारक हैं। अहिंसा को सर्वोच्च जीवन-मूल्य मानने वाला जैन दर्शन मनुष्य को करुणा, संयम, सह-अस्तित्व और आत्मनियंत्रण का संदेश देता है।
आज जब दुनिया हिंसा, तनाव, असहिष्णुता और संघर्ष जैसी चुनौतियों से गुजर रही है, ऐसे समय में जैन दर्शन के अहिंसा और सह-अस्तित्व के सिद्धांत और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। जैन धर्म मनुष्य को केवल बाहरी उपलब्धियों की ओर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की दिशा में भी प्रेरित करता है।
जातिगत पहचान से अलग है धार्मिक पहचान
आधुनिक सामाजिक व्यवस्था में कई बार जैन को धर्म के बजाय जातिगत पहचान के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टिकोण जैन दर्शन की व्यापकता और मौलिकता को सीमित करता है। जाति सामाजिक, पारिवारिक या वंशगत पहचान हो सकती है, जबकि धर्म व्यक्ति की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा विषय है।
जैन समाज में विभिन्न सामाजिक जातियां और उपसमूह मौजूद हैं। खंडेलवाल, पोरवाल, मोदी, सिंघई, गोलछा, पटवारी सहित कई सामाजिक पहचानें जैन समाज में प्रचलित हैं। इनकी सामाजिक पहचान अलग-अलग हो सकती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इन सभी की मूल पहचान जैन धर्म से जुड़ी हुई है।
धार्मिक पहचान को लेकर जागरूकता जरूरी
आगामी राष्ट्रीय जनगणना के संदर्भ में भी धार्मिक पहचान को लेकर जागरूकता आवश्यक है। जनगणना प्रपत्र में धर्म और जाति से संबंधित जो आधिकारिक प्रावधान एवं विकल्प उपलब्ध हों, उन्हें समझकर प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वास्तविक धार्मिक और सामाजिक पहचान का सही उल्लेख करना चाहिए।
यदि सरकारी प्रपत्र में धर्म के लिए पृथक विकल्प उपलब्ध हो, तो जैन धर्मावलंबियों को अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से ‘जैन’ के रूप में दर्ज करानी चाहिए। यह केवल किसी दस्तावेज में एक शब्द दर्ज कराने का विषय नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक पहचान और परंपरा के प्रति जागरूकता से भी जुड़ा हुआ है।
धर्म केवल नाम नहीं, आचरण भी है
धार्मिक पहचान केवल नाम के पीछे ‘जैन’ लिखने तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति के विचार, व्यवहार, संस्कार और जीवन मूल्यों में भी दिखाई देती है। अहिंसा, संयम, सत्य, अपरिग्रह और आत्मचिंतन जैसे सिद्धांत जैन जीवन-दर्शन की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं।
साथ ही, जहां सरकारी अथवा प्रशासनिक दस्तावेजों में धर्म की जानकारी दर्ज की जाती है, वहां अपनी वास्तविक धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से अंकित कराना जागरूक नागरिकता का हिस्सा है।
नई पीढ़ी को जैन दर्शन से जोड़ने की आवश्यकता
आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन समाज अपनी गौरवशाली परंपरा और मौलिक सिद्धांतों के प्रति अधिक जागरूक बने। नई पीढ़ी को जैन धर्म की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक विरासत से परिचित कराने के साथ उसके मूल सिद्धांतों को जीवन में अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जाना चाहिए।
जैन धर्म को केवल किसी जाति या सामाजिक समूह की पहचान के रूप में देखने के बजाय इसे अहिंसा, आत्मसंयम, करुणा और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग बताने वाली स्वतंत्र एवं शाश्वत परंपरा के रूप में समझना आवश्यक है।
जैन दर्शन का संदेश किसी एक समाज तक सीमित नहीं है। जीव मात्र के प्रति करुणा, हिंसा से दूर रहने, आवश्यकताओं को सीमित करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश पूरी मानवता के लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए जैन समाज के लिए अपनी धार्मिक पहचान और परंपरा के प्रति जागरूक होना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी है कि आने वाली पीढ़ियों तक जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों को सही स्वरूप में पहुंचाया जाए।
जैन धर्म की पहचान जाति से नहीं, बल्कि उसके शाश्वत सिद्धांतों, आस्था, आचरण और आध्यात्मिक दर्शन से है। अहिंसा और आत्मसंयम पर आधारित यह परंपरा भारतीय संस्कृति की प्राचीन आध्यात्मिक धारा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लेखक — अरिहंत जैन मलगुवां
