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Morena : धर्म से विचलित व्यक्ति को प्रेम से पुनः धर्ममार्ग पर लाना ही सच्चा स्थितिकरण अंग: आचार्य उदारसागर

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Published On: 5 September 2026
Morena

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Morena में आचार्यश्री उदारसागर ने समझाया ‘स्थितिकरण अंग’ का महत्व

Morena (मनोज जैन नायक)। । बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने जैन धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांत ‘स्थितिकरण अंग’ की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन अथवा सम्यक्चारित्र से विचलित हो रहे व्यक्ति को प्रेम, वात्सल्य और विवेक के माध्यम से पुनः धर्ममार्ग पर स्थापित करना ही स्थितिकरण अंग है।

आचार्यश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति को धर्म से दूर जाते देख उसकी आलोचना करना आसान है, लेकिन उसके भीतर धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास को पुनः जागृत करना कठिन कार्य है। सच्चा धर्म वही है, जिसमें व्यक्ति की कमियां गिनाने के बजाय उसे संभालने और सही मार्ग पर लाने का प्रयास किया जाए।

साधर्मी के दोषों को उजागर नहीं, सुधारने का प्रयास करें

आचार्यश्री ने उपगूहन अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि जिस प्रकार शरीर पर हुए घाव या फोड़े की गंदगी को दूर कर उसे ठीक करने का प्रयास किया जाता है, उसी प्रकार साधर्मी के दोषों को समाज के सामने उजागर करने के बजाय उन्हें ढंककर, दूर कर और सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति धर्ममार्ग से विचलित होने लगे, तब उसे पुनः धर्म में दृढ़ करना ही स्थितिकरण अंग की भावना है। इसके लिए केवल ज्ञान या उपदेश पर्याप्त नहीं है। प्रेम, आत्मीयता, विवेक और अपने आचरण के माध्यम से व्यक्ति के भीतर आत्मबल पैदा करना आवश्यक है।

शान्तिसागर महाराज का प्रेरक प्रसंग सुनाया

धर्मसभा में आचार्यश्री ने चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री 108 शान्तिसागर महाराज के जीवन से जुड़ा प्रेरक प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि उनके समय में एक दिगम्बर मुनिराज का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया था और वे आजीवन यम-सल्लेखना धारण किए हुए थे। अस्वस्थता के दौरान उन्होंने पानी पीने की इच्छा व्यक्त की।

आचार्य शान्तिसागर महाराज ने जब उन्हें देखा तो अपने से छोटे होने के बावजूद अत्यंत विनय और वात्सल्य के साथ उन्हें ‘नमोस्तु’ किया। इतने बड़े साधु द्वारा इस प्रकार सम्मान दिए जाने से मुनिराज प्रभावित हुए। शान्तिसागर महाराज के सहज व्यवहार और वात्सल्य से उनके भीतर पुनः आत्मबल और धर्मभाव जागृत हुआ और वे अपनी सल्लेखना में दृढ़ रहे।

आचार्यश्री ने इस प्रसंग को स्थितिकरण अंग का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा कि शान्तिसागर महाराज ने केवल उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपने व्यवहार और वात्सल्य से सामने वाले के भीतर धर्म के प्रति दृढ़ता उत्पन्न की।

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आलोचना के बजाय वात्सल्य से संभालें : मुनिश्री उपशांत सागर

धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि समाज में दूसरों की गलतियां देखने और बताने में लोग जितनी जल्दी करते हैं, उतनी तत्परता किसी को संभालने में नहीं दिखाते।

मुनिश्री ने कहा कि धर्म का उद्देश्य किसी को गिरा हुआ बताना नहीं, बल्कि गिरते हुए व्यक्ति को हाथ देकर उठाना है। यदि कोई व्यक्ति पूजा-पाठ, संयम, साधना अथवा धार्मिक गतिविधियों से दूर हो रहा है तो उसके प्रति उपेक्षा का भाव रखने के बजाय उसके पास जाकर प्रेम से बात करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि आखिर वह व्यक्ति धर्म से दूर क्यों हो रहा है। कई बार व्यक्ति को लंबे उपदेश की अपेक्षा अपनेपन और वात्सल्य की आवश्यकता होती है। कठोर शब्द किसी व्यक्ति को धर्म से और दूर कर सकते हैं, जबकि प्रेम से बोले गए शब्द उसे धर्म के करीब ला सकते हैं।

धर्म में स्थिरता के लिए आत्मबल जरूरी

मुनिश्री उपशांत सागर ने कहा कि स्थितिकरण का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को गलत रास्ते पर जाने से रोकना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ उसके भीतर धर्म के प्रति श्रद्धा, आत्मविश्वास और आत्मबल को पुनः जागृत करना है।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं धर्म में स्थित रहता है और दूसरों को भी धर्म में स्थिर करने का प्रयास करता है, वही स्थितिकरण अंग की वास्तविक भावना को समझ सकता है। समाज की मजबूती भी इसी भावना से संभव है।

एक-दूसरे को संभालने का संकल्प लें

धर्मसभा में संतों ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे दूसरों की कमियां खोजने के बजाय उन्हें संभालने और आगे बढ़ाने का प्रयास करें। परिवार और समाज में प्रेम, करुणा, सहयोग तथा वात्सल्य का वातावरण बने, यही धर्म की वास्तविक भावना है।

आचार्यश्री और मुनिश्री के प्रेरक प्रवचनों को धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक सुना। प्रवचनों के माध्यम से साधर्मी के प्रति सम्मान, करुणा और आत्मीयता रखने तथा धर्म से विचलित व्यक्ति को प्रेमपूर्वक पुनः धर्ममार्ग पर स्थापित करने का संदेश दिया गया।

Morena

धर्मसभा का मुख्य संदेश यही रहा कि आलोचना व्यक्ति को दूर कर सकती है, लेकिन प्रेम, वात्सल्य और सही मार्गदर्शन उसे फिर से धर्म के करीब ला सकता है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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