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मध्य प्रदेश में 10.99 करोड़ के टेंडर में कथित फर्जीवाड़ा, एक ही पते और मोबाइल से तीन फर्म संचालित होने का आरोप

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Published On: 4 September 2026
werewewew

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मध्य प्रदेश में 10.99 करोड़ के टेंडर में कथित फर्जीवाड़ा, एक ही पते और मोबाइल से तीन फर्म संचालित होने का आरोप

GeM पोर्टल पर फर्जी प्रतिस्पर्धा दिखाकर टेंडर हासिल करने का दावा, EOW ने मुख्य आरोपी समेत चार लोगों के खिलाफ दर्ज की FIR

भोपाल। मध्य प्रदेश के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग से जुड़े करीब 10.99 करोड़ रुपये के टेंडर में कथित अनियमितता और धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि सरकारी टेंडर हासिल करने के लिए एक ही पते, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी से तीन अलग-अलग फर्मों का संचालन किया गया। इन फर्मों के माध्यम से सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी GeM पोर्टल पर प्रतिस्पर्धा दिखाकर टेंडर हासिल किया गया।

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने प्रारंभिक जांच के बाद मुख्य आरोपी बताए जा रहे रणधीर पटेल सहित चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। अन्य आरोपियों में हेमलता, अशोक कुमार सिंह और देवेंद्र सिंह के नाम शामिल बताए गए हैं। जांच एजेंसी अब सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की संभावित भूमिका की भी जांच कर रही है।

टेंडर हासिल करने के लिए डमी फर्म बनाने का आरोप

EOW की जांच में कथित रूप से सामने आया कि टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए डमी फर्मों का इस्तेमाल किया गया। आरोप है कि रणधीर पटेल ने टेंडर में भाग लेने के उद्देश्य से फर्जी या आपस में जुड़ी हुई फर्में तैयार कीं। दस्तावेजों में इन फर्मों को अलग-अलग दर्शाया गया, जबकि उनके पते, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी समान होने की बात सामने आई है।

जांच एजेंसी को संदेह है कि GeM पोर्टल पर वास्तविक प्रतिस्पर्धा दिखाने के बजाय संबंधित फर्मों ने आपस में समन्वय कर टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया। इसके बाद कथित रूप से वास्तविक फर्म के नाम पर टेंडर प्राप्त कर लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम से सरकारी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और टेंडर आवंटन के दौरान दस्तावेजों की जांच व्यवस्था पर सवाल उठे हैं।

सस्ते उपकरण महंगे दामों पर बेचने का दावा

मामले में आरोप लगाया गया है कि बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सरकार को काफी अधिक दामों पर बेचा गया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी इस विषय को उठाते हुए दावा किया कि लगभग 3,754 रुपये मूल्य वाले UPS के लिए सरकार की ओर से 11,247 रुपये तक का भुगतान किया गया।

यदि यह आरोप जांच में प्रमाणित होता है तो एक UPS की खरीद पर बाजार मूल्य की तुलना में लगभग तीन गुना राशि का भुगतान किया गया। इसी तरह अन्य कंप्यूटर पार्ट्स और उपकरणों की कीमतों में भी कथित रूप से अंतर होने की आशंका जताई गई है। EOW अब खरीद आदेश, बाजार दर, भुगतान से संबंधित दस्तावेज और सप्लाई किए गए उपकरणों की गुणवत्ता का परीक्षण कर रही है।

टेंडर से पहले ही सप्लाई होने पर उठे सवाल

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू उपकरणों की सप्लाई और इंस्टॉलेशन की तारीखों से जुड़ा है। आरोप है कि जिस टेंडर के माध्यम से उपकरणों की खरीद दिखाई गई, उससे करीब दो महीने पहले ही संबंधित सामान की सप्लाई और इंस्टॉलेशन किया जा चुका था।

इस दावे ने पूरी टेंडर प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला दिया है। जांच का विषय यह है कि यदि टेंडर बाद में जारी हुआ तो उससे पहले उपकरणों की आपूर्ति किस आदेश और किस अधिकार के आधार पर की गई। EOW यह भी जांच रही है कि संबंधित विभाग के अधिकारियों को पहले से इसकी जानकारी थी या नहीं।

जांच एजेंसी टेंडर जारी होने की तारीख, तकनीकी एवं वित्तीय बोलियां, कार्यादेश, सप्लाई रिकॉर्ड, इंस्टॉलेशन रिपोर्ट और भुगतान की तारीखों का मिलान कर सकती है। इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि खरीद प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थी या पहले से तय व्यवस्था को औपचारिक रूप देने के लिए बाद में टेंडर कराया गया।

नामी कंपनी के नाम पर लोकल पार्ट्स लगाने का आरोप

जांच में यह आरोप भी सामने आया है कि टेंडर की शर्तों के अनुसार जिन कंपनियों के कंप्यूटर पार्ट्स और उपकरणों की आपूर्ति की जानी थी, उनके स्थान पर कुछ लोकल अथवा कम गुणवत्ता वाले पार्ट्स लगाए गए। कथित रूप से असली कंपनी के नाम का उपयोग करते हुए दूसरे उपकरणों की सप्लाई की गई।

अब यह जांच की जा रही है कि विभाग को दिए गए उपकरण निर्धारित तकनीकी मानकों पर खरे उतरते हैं या नहीं। इसके लिए खरीद से संबंधित बिल, सीरियल नंबर, वारंटी दस्तावेज, निर्माता कंपनी का विवरण और उपकरणों के तकनीकी विनिर्देशों की जांच की जा सकती है।

यदि उपकरण निर्धारित गुणवत्ता के नहीं पाए जाते हैं तो यह सरकारी धन के नुकसान के साथ उन हितग्राहियों के अधिकारों को भी प्रभावित करने वाला मामला होगा, जिनके लिए विभाग ने यह खरीद की थी।

चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज

EOW ने उपलब्ध दस्तावेजों और प्रारंभिक जांच के आधार पर रणधीर पटेल को मुख्य आरोपी बनाते हुए हेमलता, अशोक कुमार सिंह और देवेंद्र सिंह के खिलाफ FIR दर्ज की है। हालांकि, आरोपों की अंतिम पुष्टि विस्तृत जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

मामला दर्ज होने के बाद रणधीर पटेल से संबंधित साईंबाबा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश भी किए जाने की जानकारी सामने आई है। ब्लैकलिस्टिंग पर अंतिम निर्णय संबंधित विभाग और सक्षम प्राधिकारी द्वारा नियमों के तहत लिया जाएगा।

विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

EOW यह पता लगाने में जुटी है कि इतनी बड़ी राशि के टेंडर में कथित डमी फर्मों, बाजार से अधिक कीमत और गुणवत्ता से जुड़े तथ्यों की जांच विभागीय स्तर पर क्यों नहीं हो सकी। टेंडर की तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति देने वाले अधिकारियों, उपकरण प्राप्त करने वाली समिति तथा भुगतान प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों की भूमिका की समीक्षा की जा रही है।

जांच एजेंसी के अधिकारियों के अनुसार, मामले की जांच अभी जारी है। आगे की जांच में सरकारी अधिकारियों या अन्य निजी व्यक्तियों की संलिप्तता सामने आने पर उन्हें भी आरोपी बनाया जा सकता है।

कांग्रेस ने सरकार से मांगा जवाब

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस मामले को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दिव्यांगजनों के कल्याण के लिए बने विभाग में टेंडर प्रक्रिया के दौरान गंभीर गड़बड़ी हुई। उन्होंने डमी फर्मों, UPS की कथित रूप से बढ़ी हुई कीमत, टेंडर से पहले सप्लाई और स्थानीय स्तर के पार्ट्स लगाए जाने के आरोपों पर सरकार से जवाब मांगा है।

कांग्रेस ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। फिलहाल सरकार या संबंधित विभाग का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आने की प्रतीक्षा है।

दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड से खुलेगी पूरी परत

EOW अब GeM पोर्टल के डिजिटल रिकॉर्ड, फर्मों के पंजीयन दस्तावेज, बैंक खातों, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी, GST विवरण, भुगतान रिकॉर्ड और उपकरणों की सप्लाई से संबंधित दस्तावेजों की जांच कर रही है। एक ही संपर्क विवरण से कई फर्मों के संचालन के आरोप की पुष्टि के लिए तकनीकी साक्ष्यों का परीक्षण भी किया जाएगा।

जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सरकारी खजाने को वास्तविक रूप से कितना नुकसान हुआ और कथित फर्जीवाड़े में किन लोगों की क्या भूमिका रही। फिलहाल चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

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