दूसरों के दोष मन में रखने से जीवन अशांत और संकुचित हो जाता है: आचार्य उदारसागर
उपगूहन अंग की महत्ता समझाई, निंदा छोड़ गुणग्राही बनने का दिया संदेश
मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर के श्री दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपगूहन अंग की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं से दूसरों के दोषों को देखने और उन्हें मन में संचित करने के बजाय उनके गुणों को ग्रहण करने की भावना रखने का आह्वान किया।
आचार्य श्री ने कहा कि गुणग्राही बनना कठिन है, जबकि दूसरों के दोष ढूंढना बेहद आसान है। मनुष्य यदि लगातार दूसरों की कमियों को देखता और उन्हें अपने मन में स्थान देता रहे तो उसका स्वयं का जीवन अशांत और संकुचित हो जाता है। इसलिए जीवन में दूसरों के गुणों को देखने और उनसे प्रेरणा लेने का प्रयास करना चाहिए।
दूसरों की गलतियां ढूंढने की आदत से बचें
आचार्य श्री ने एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि एक व्यक्ति को दूसरों की गलतियां ढूंढने की आदत थी। जब भी वह किसी व्यक्ति की कोई गलती देखता, उसके प्रतीक के रूप में अपने घर के दरवाजे पर एक पत्थर रख देता था। प्रतिदिन ऐसा करते-करते उसके घर के सामने पत्थरों का ढेर लग गया और अंततः आने-जाने का रास्ता ही बंद हो गया।
उन्होंने कहा कि यही स्थिति हमारे जीवन में भी होती है। हम दूसरों के दोषों को अपने मन में एकत्र करते रहते हैं और धीरे-धीरे हमारे भीतर नकारात्मकता बढ़ती जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि हमारा अपना जीवन ही अशांत और सीमित हो जाता है।
दोष सुधारने की भावना जरूरी
आचार्य श्री ने चित्रकार का उदाहरण देते हुए कहा कि एक चित्रकार ने सुंदर चित्र बनाकर उसके नीचे लिख दिया कि जिसे इसमें कोई गलती दिखाई दे, वह उसे सुधार दे। लोगों ने अपनी-अपनी दृष्टि से चित्र में अनेक कमियां निकालकर उसमें सुधार कर दिए। शाम तक चित्र की स्थिति ऐसी हो गई कि उसे पहचानना भी मुश्किल हो गया।
उन्होंने कहा कि दूसरों में दोष ढूंढने के बजाय अपने भीतर सुधार करने की भावना रखनी चाहिए। यदि हम किसी की गलती देखते हैं तो उसका उपहास या निंदा करने के बजाय उसे सही मार्ग दिखाने का प्रयास करना चाहिए।

निंदा नहीं, सुधार का भाव रखें
आचार्य श्री ने कहा कि यदि किसी धर्मात्मा या साधर्मी से कोई भूल हो जाए तो उसकी सम्यग्दृष्टि और धर्मभावना को सुरक्षित रखते हुए उसके दोष को ढंकना तथा उसे सही मार्ग दिखाना ही उपगूहन अंग की भावना है। किसी की निंदा करना धर्म का मार्ग नहीं है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को निंदा से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि निंदा करने से नीच गोत्र कर्म का बंध होता है। इसलिए मनुष्य को दूसरों की कमियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय उनके गुणों को पहचानने और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीपाल चरित्र से समझाया कर्मों का प्रभाव
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने श्रीपाल चरित्र के माध्यम से कर्म सिद्धांत की गहराई को समझाया। उन्होंने बताया कि श्रीपाल अत्यंत सुंदर थे। अल्प अवस्था में ही उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और उन्हें व्रतों को अंगीकार करने का अवसर भी मिला। इसके बावजूद उनके जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियां आईं।
श्रीपाल को समुद्र में गिराए जाने और फांसी जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। आचार्य श्री ने उनके पूर्व भव का प्रसंग बताते हुए कहा कि पूर्व पर्याय में राजा श्रीकंठ जंगल की एक गुफा में गए थे, जहां उन्होंने एक दिगंबर मुनिराज के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था।
आचार्य श्री के अनुसार उसी दोषपूर्ण भाव और कर्म के परिणामस्वरूप आगे चलकर श्रीपाल को जीवन में अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि कर्म का सिद्धांत अत्यंत सूक्ष्म और अटल है। मनुष्य अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं सकता।
वर्तमान के भाव ही भविष्य का निर्माण करते हैं
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति, साधु या साधर्मी के प्रति निंदा, उपहास अथवा दोषदृष्टि रखने से बचना चाहिए। श्रीपाल का जीवन यह संदेश देता है कि वर्तमान में किए गए भाव ही भविष्य का निर्माण करते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि दूसरों के दोषों को इकट्ठा करने के बजाय उनके गुणों को अपने जीवन में उतारें। यदि किसी साधर्मी से कोई भूल हो जाए तो उसकी निंदा करने के बजाय प्रेमपूर्वक समझाकर उसे धर्ममार्ग पर आगे बढ़ाने का प्रयास करें। यही उपगूहन अंग की वास्तविक सार्थकता है।

गुणों को देखना ही सच्ची साधना
आचार्य श्री ने कहा कि दोष देखना सरल है, लेकिन गुण देखना साधना है। जो व्यक्ति दूसरों के गुणों को पहचानकर उन्हें अपने जीवन में अपनाता है, वही वास्तविक अर्थों में गुणग्राही कहलाता है। गुणग्राही दृष्टि व्यक्ति को नकारात्मकता से दूर कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाती है।
प्रवचन के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने उपगूहन अंग की भावना को आत्मसात करने, दोषदृष्टि छोड़ने, गुणग्राही बनने और साधर्मी के प्रति वात्सल्य भाव रखने का संकल्प लिया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु हुए शामिल
धर्मसभा का सफल संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री, मुरैना ने किया। मंगलाचरण श्रीमती गुंजन जैन ने प्रस्तुत किया। इसके पश्चात सम्मानीयजनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री के मंगलकारी एवं प्रेरणादायी प्रवचन को श्रद्धापूर्वक सुना। प्रवचन के दौरान मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने दूसरों के दोषों के बजाय उनके गुणों को देखने का संकल्प लिया।

