दिल्ली ऋषभोदय से गुरु वाणी: पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी बोले- संयम ही मनुष्य जीवन का सच्चा श्रृंगार
धर्मसभा में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने छह सूत्रों में बताया जीवन का सार, कहा- इच्छाओं पर विराम ही दीक्षा और सच्चे गुरु के प्रति समर्पण से प्रशस्त होता है आत्मकल्याण का मार्ग
संवाददाता: राजेश जैन दद्दू, इंदौर
दिल्ली। दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने दिल्ली ऋषभोदय में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मानव जीवन में संयम, भक्ति, गुरु आस्था और परोपकार का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक और सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि संयम में है। जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है, वही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मंगल देशना में पट्टाचार्य श्री ने जीवन को सार्थक बनाने के लिए छह महत्वपूर्ण सूत्र बताए। उन्होंने संयम को जीवन का श्रृंगार बताते हुए संसार के मोह और राग-द्वेष से दूर रहने, भगवान की भक्ति करने, सच्चे गुरु में आस्था रखने, इच्छाओं पर नियंत्रण करने और जरूरतमंदों की सहायता करते हुए उन्हें धर्म का मार्ग दिखाने की प्रेरणा दी।
संयम ही जीवन का वास्तविक श्रृंगार
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि संयम अत्यंत दुर्लभ है। धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व इतना अधिक है कि देवगण भी संयममय जीवन की भावना रखते हैं। मनुष्य को अपने जीवन में संयम को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।
उन्होंने संयम के दो महत्वपूर्ण स्वरूपों की चर्चा करते हुए कहा कि प्राणियों की रक्षा करना प्राणि-संयम है, जबकि भोग-विलास और इंद्रियों के विषयों से विरक्ति रखना इन्द्रिय-संयम है।
उन्होंने समझाया कि केवल बाहरी आचरण ही संयम नहीं है। मन, वचन और कर्म पर नियंत्रण भी संयम की साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इच्छाओं की अनंत दौड़ मनुष्य को अशांत करती है, जबकि संयम उसे आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।
अविद्या और मोह के कारण संसार में भटकता है जीव
दूसरे सूत्र में पट्टाचार्य श्री ने संसार भ्रमण से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि अविद्या, मोह, राग और द्वेष के कारण जीव संसार की विभिन्न गतियों में भटकता रहता है।
मनुष्य यदि शाश्वत सुख की प्राप्ति चाहता है तो उसे यथार्थ तत्वों का बोध करना होगा। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझकर ही जन्म-मरण के आवागमन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सांसारिक आकर्षण क्षणिक हैं। व्यक्ति जीवनभर जिन वस्तुओं और सुविधाओं के पीछे भागता है, वे स्थायी सुख नहीं दे सकतीं। स्थायी सुख के लिए आत्मचिंतन, तत्वज्ञान और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना आवश्यक है।
भगवत् भक्ति से मिलता है आत्मिक सुख
तीसरे सूत्र में पट्टाचार्य श्री ने भगवान की भक्ति का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि भगवत् भक्ति मनुष्य के जीवन में सकारात्मक और आध्यात्मिक परिवर्तन लाने वाली होती है।
जैन दर्शन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रभु की भक्ति से पुण्य का अर्जन होता है और व्यक्ति अपने जीवन को धर्ममय बनाने की दिशा में प्रेरित होता है। सच्ची भक्ति व्यक्ति को आत्मशुद्धि की ओर ले जाती है और मुक्ति मार्ग की भावना को मजबूत करती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि भक्ति केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उसका प्रभाव व्यक्ति के आचरण में भी दिखाई देना चाहिए। भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए उन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास ही भक्ति को सार्थक बनाता है।
सच्चे और संयमी गुरु में रखें आस्था
चौथे सूत्र में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने गुरु के चयन और उनके प्रति आस्था के विषय में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को विवेकपूर्वक सच्चे, संयमी, ज्ञानी और ध्यान में स्थित गुरु को अपना आराध्य बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल बाहरी प्रभाव से किसी को अपना मार्गदर्शक नहीं मानना चाहिए। धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए ऐसे गुरु की आवश्यकता होती है, जिनके जीवन में संयम, ज्ञान और साधना दिखाई दे।
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि आस्था निर्दोष परमात्मा में और समर्पण सच्चे गुरु के प्रति होना चाहिए। सही गुरु जीवन की दिशा बदल सकता है और साधक को आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
इच्छाओं को रोकना ही दीक्षा का वास्तविक भाव
पांचवें सूत्र में पट्टाचार्य श्री ने दीक्षा का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए कहा कि इच्छाओं पर विराम लगाना ही दीक्षा का मूल भाव है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। यही अनंत इच्छाएं मनुष्य को सांसारिक बंधनों में उलझाए रखती हैं।
जो भव्य जीव भावपूर्वक संयम धारण करता है, उसके लिए आत्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है। जैन दर्शन में संयम और दीक्षा को उच्च आध्यात्मिक अवस्था की ओर बढ़ने का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण दीक्षा भले ही धारण न कर सके, लेकिन अपने दैनिक जीवन में इच्छाओं को सीमित करके संयम की भावना अवश्य विकसित कर सकता है।
किसी को ठुकराएं नहीं, सहयोग के साथ धर्म का मार्ग दिखाएं
अपनी मंगल देशना के छठे सूत्र में पट्टाचार्य श्री ने करुणा, सेवा और सामाजिक दायित्व का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संसार में सभी व्यक्तियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। समय बदलता रहता है, इसलिए किसी निर्धन, असहाय या जरूरतमंद व्यक्ति को हीन दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सामर्थ्यवान व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह जरूरतमंद की सहायता करे। निर्धन को आर्थिक सहयोग, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी और रोगी को औषधि उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए।
इसके साथ ही व्यक्ति को सत्य और धर्म का बोध कराने की प्रेरणा भी देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी को ठुकराने के बजाय उसका हाथ पकड़कर सही दिशा दिखाना ही धर्म की भावना के अनुरूप है।
छह सूत्रों में दिया जीवन को सार्थक बनाने का संदेश
पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज की मंगल देशना में संयम से लेकर सेवा तक जीवन के विभिन्न पक्षों को समाहित किया गया। उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि मनुष्य जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के लिए मिला दुर्लभ अवसर है।
संयम धारण करना, मोह और राग-द्वेष को कम करना, भगवान की भक्ति करना, सच्चे गुरु के प्रति श्रद्धा रखना, इच्छाओं को सीमित करना और जरूरतमंदों की सहायता करना—इन सूत्रों को जीवन में अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को धर्ममय और सार्थक बना सकता है।
धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने पट्टाचार्य श्री की मंगल देशना का श्रवण कर आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की। अंत में जैन शासन की जय और गुरु चरणों में नमोस्तु के भाव के साथ धर्मसभा संपन्न हुई।
