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दूसरों के दोष नहीं, गुणों को देखें, यही उपगूहन अंग की भावना: आचार्यश्री उदारसागर महाराज

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Published On: 2 September 2026
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दूसरों के दोष नहीं, गुणों को देखें, यही उपगूहन अंग की भावना: आचार्यश्री उदारसागर महाराज

बोले- कर सको तो आत्म-निंदा करो, परनिंदा नहीं; आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार ही धर्म की वास्तविक दिशा

संवाददाता: मनोज जैन नायक

मुरैना। धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति की दृष्टि दूसरों की कमियां तलाशने वाली नहीं, बल्कि उनके गुणों को पहचानने और ग्रहण करने वाली होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति से कोई भूल हो जाए तो उसकी गलती को समाज के सामने उजागर कर उसे अपमानित करने के बजाय सही मार्ग दिखाकर सुधार का अवसर देना चाहिए। यही उपगूहन अंग की वास्तविक भावना है। यह प्रेरणादायी संदेश ज्ञान रत्नाकर परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।

आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, आत्मसुधार और गुणग्राही दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति को दूसरों के दोषों की चर्चा करने से पहले स्वयं के भीतर झांकना चाहिए। अपने दोषों को पहचानना और उनमें सुधार करना ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

भूल करने वाले को सही रास्ता दिखाना हमारा दायित्व

आचार्यश्री ने उपगूहन अंग का महत्व समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार किसी मार्ग पर चलते हुए कोई व्यक्ति रास्ता भटक जाए तो हमारा कर्तव्य उसे और अधिक भटकने देना नहीं, बल्कि सही दिशा दिखाना है। इसी प्रकार धर्म और मोक्षमार्ग पर चलने वाले किसी साधर्मी से भूल हो जाए तो उसकी निंदा और आलोचना करने के बजाय उसे सुधार का अवसर देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी की कमजोरी या भूल को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाना धर्म की भावना नहीं है। व्यक्ति को इस बात का प्रयास करना चाहिए कि उसकी वजह से किसी दूसरे व्यक्ति का सम्मान प्रभावित न हो और उसे अपनी गलती सुधारने का अवसर मिल सके।

अपने गुणों का प्रदर्शन नहीं, दूसरों के गुणों का करें सम्मान

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि अपने गुणों को छिपाना और दूसरों के गुणों को सामने लाना श्रेष्ठ भावना मानी गई है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति लगातार अपने गुणों और उपलब्धियों का प्रदर्शन करता है, जबकि दूसरों की कमियों और दोषों को उजागर करता रहता है, तो ऐसी प्रवृत्ति आत्मकल्याण के मार्ग में बाधा बन सकती है।

उन्होंने कर्म सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरों को नीचा दिखाने और उनके दोषों को प्रचारित करने की भावना शुभ परिणाम देने वाली नहीं होती। ऐसी प्रवृत्ति कर्मबंध की दृष्टि से भी उचित नहीं मानी गई है।

सम्यग्दृष्टि की पहचान है गुणग्राही दृष्टि

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धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति की दृष्टि हमेशा गुणग्राही होती है। वह हर समय दूसरों में दोष खोजने के बजाय उनके भीतर मौजूद अच्छे गुणों को पहचानने का प्रयास करता है।

उन्होंने इसे समझाने के लिए चुम्बक का उदाहरण दिया। आचार्यश्री ने कहा कि अनेक प्रकार की वस्तुओं के बीच रखे जाने के बावजूद चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। ठीक इसी तरह मनुष्य को भी संसार में रहते हुए लोगों के दोषों को पकड़ने के बजाय उनके अच्छे गुणों को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।

‘आत्म-निंदा करो, लेकिन परनिंदा मत करो’

आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा, “कर सको तो आत्म-निंदा करो, पर परनिंदा मत करो।”

उन्होंने कहा कि भगवान के सामने व्यक्ति को अपने दोष स्वीकार करने चाहिए। जब मनुष्य स्वयं की कमियों को पहचानता है, तभी उनमें सुधार करने की संभावना पैदा होती है। अपनी गलतियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

दूसरों की कमियां गिनाने में समय व्यतीत करने से स्वयं का कोई कल्याण नहीं होता। यदि व्यक्ति वास्तव में आत्मकल्याण चाहता है तो उसे सबसे पहले अपने भीतर झांकना होगा।

आत्मनिरीक्षण से खुलता है आत्मसुधार का मार्ग

आचार्यश्री ने कहा कि आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार धर्म की वास्तविक दिशा है। व्यक्ति जितना समय दूसरों के दोष देखने में लगाता है, यदि उसका कुछ हिस्सा भी स्वयं की कमियों को पहचानने में लगाए तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को परनिंदा से दूर रहने और जीवन में ऐसी दृष्टि विकसित करने की प्रेरणा दी, जो हर व्यक्ति में मौजूद अच्छे गुणों को देख सके। धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के प्रेरणादायी विचारों को ध्यानपूर्वक सुना।

‘जैन वाङ्मय में परमाणु सिद्धान्त’ पुस्तक का हुआ विमोचन

sdfsधर्मसभा के दौरान धार्मिक एवं साहित्यिक गतिविधि के रूप में ‘जैन वाङ्मय में परमाणु सिद्धान्त’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया। यह पुस्तक ब्रह्मचारिणी डॉ. समता दीदी द्वारा रचित है।

पुस्तक का विमोचन परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज के मंगल सान्निध्य में संपन्न हुआ। इस अवसर पर सुरेश कुमार जैन शास्त्री, मारौरा (इंदौर) और ब्रह्मचारिणी डॉ. समता दीदी ने आचार्यश्री को श्रीफल भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में सुरेश कुमार जैन शास्त्री मारौरा (इंदौर), विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री, अनिल कुमार जैन प्राचार्य, नीलेश जैन, प्रेमचंद जैन, बाबूलाल जैन, दिनेश जैन, रज्जू जैन सहित समाज के अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।

मंगलाचरण से हुआ धर्मसभा का शुभारंभ

धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती शशी जैन द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात ब्रह्मचारिणी डॉ. समता दीदी और सुरेश कुमार जैन शास्त्री, मारौरा (इंदौर) द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन किया गया।

कार्यक्रम का सफल एवं कुशल संचालन विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने आचार्यश्री के मंगलकारी प्रवचनों का लाभ लिया।

श्रद्धालुओं ने लिया गुणग्राही दृष्टि अपनाने का संकल्प

आचार्यश्री उदारसागर महाराज के प्रवचन का मुख्य संदेश व्यक्ति को दूसरों की आलोचना और परनिंदा से दूर रहकर स्वयं के भीतर सुधार करने पर केंद्रित रहा। उन्होंने समझाया कि जीवन में दूसरों के दोष देखना आसान है, लेकिन धर्म का वास्तविक पुरुषार्थ स्वयं की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने में है।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने उपगूहन अंग की भावना को जीवन में आत्मसात करने, परनिंदा से बचने, आत्मनिरीक्षण करने और दूसरों के दोषों के बजाय उनके गुणों को देखने एवं ग्रहण करने की भावना विकसित करने का संकल्प लिया।

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