मंजिल निश्चित हो, तभी जीवन की यात्रा सार्थक होगी: मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
इंदौर के दलाल बाग में धर्मसभा को किया संबोधित, बोले- केवल चलते रहना पर्याप्त नहीं, लक्ष्य और सही दिशा का ज्ञान होना जरूरी; गुरु के सामने निष्कपट होकर करें आत्मनिरीक्षण
संवाददाता: राजेश जैन दद्दू
इंदौर। जीवन में केवल निरंतर चलते रहना सफलता की गारंटी नहीं है। व्यक्ति को सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि उसकी वास्तविक मंजिल क्या है और वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। लक्ष्य निश्चित होने के बाद ही किया गया पुरुषार्थ जीवन को सार्थक बना सकता है। यह प्रेरणादायी संदेश मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने इंदौर के दलाल बाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं को दिया।
धर्मसभा में मुनि श्री ने जीवन के लक्ष्य, पुरुषार्थ, आत्मनिरीक्षण, मानसिक दृढ़ता और गुरु के महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में लगातार व्यस्त रहता है, अनेक जिम्मेदारियां निभाता है और सफलता प्राप्त करने के लिए मेहनत करता है, लेकिन यदि उसके सामने स्पष्ट लक्ष्य नहीं है तो उसका पुरुषार्थ उसे वास्तविक मंजिल तक नहीं पहुंचा सकता।
केवल रास्ता जानना काफी नहीं, मंजिल भी होनी चाहिए तय
मुनि श्री ने कहा कि किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए सबसे पहली आवश्यकता लक्ष्य निर्धारित करने की है। केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं है कि किस रास्ते पर चलना है, बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर पहुंचना कहां है।
उन्होंने कोल्हू के बैल का उदाहरण देते हुए समझाया कि बैल दिनभर चलता रहता है। लगातार चलने से उसका शरीर थक जाता है और उसे लगता है कि उसने बहुत लंबी यात्रा कर ली, लेकिन वास्तविकता में वह उसी स्थान के आसपास घूमता रहता है और किसी मंजिल तक नहीं पहुंचता।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य की स्थिति भी कई बार ऐसी ही हो जाती है। वह जीवनभर मेहनत करता है, अनेक जिम्मेदारियां निभाता है और दिन-रात व्यस्त रहता है, लेकिन यदि उसने अपनी मंजिल तय नहीं की तो बहुत अधिक परिश्रम के बावजूद उसे यह अनुभव हो सकता है कि जीवन जहां से शुरू हुआ था, वहीं ठहरा हुआ है।
‘मुझे क्या मिला’ नहीं, ‘मैं क्या बन रहा हूं’ यह पूछें
मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि परिवार, नौकरी, व्यवसाय अथवा समाज में कार्य करते समय व्यक्ति अक्सर अपने योगदान का हिसाब लगाने लगता है। उसके मन में विचार आता है कि उसने इतना कुछ किया, लेकिन बदले में उसे क्या मिला?
उन्होंने कहा कि बार-बार इस तरह की अपेक्षा व्यक्ति के पुरुषार्थ को कमजोर कर सकती है। इसके स्थान पर मनुष्य को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि “मैं क्या बन रहा हूं और मेरी वास्तविक मंजिल के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा क्या है?”
यह प्रश्न व्यक्ति को दूसरों की कमियां खोजने के बजाय अपने भीतर देखने के लिए प्रेरित करता है। आत्मनिरीक्षण से ही व्यक्ति अपनी वास्तविक स्थिति को समझ सकता है और जीवन में सुधार की दिशा तय कर सकता है।
अपनी कमजोरी और कषाय को पहचानना जरूरी
मुनि श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक प्रगति के लिए अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना अत्यंत आवश्यक है। मोह, भय, अहंकार, अपेक्षा और कषाय जैसे भाव व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में बड़ी बाधा बन सकते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि व्यक्ति को पूरी ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जब तक अपनी कमजोरी की पहचान नहीं होगी, तब तक उसे दूर करने का प्रयास भी सही दिशा में नहीं हो सकता।
दूसरों की गलतियां और कमजोरियां आसानी से दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तविक साधना तब शुरू होती है जब व्यक्ति स्वयं के भीतर झांककर अपनी कमियों को स्वीकार करता है।
गुरु के सामने बालक की तरह निष्कपट बनें
धर्मसभा में गुरु की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि गुरु के सामने व्यक्ति को बिल्कुल बालक की तरह सरल और निष्कपट होना चाहिए। जो अनुभव हो रहा है और मन के भीतर जो चल रहा है, उसे गुरु के सामने उसी रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने डॉक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई मरीज अपनी बीमारी के लक्षण डॉक्टर से छिपाता है तो सही उपचार करना मुश्किल हो जाता है। इसी प्रकार यदि साधक गुरु के सामने अपने दोष, कमजोरियां और अनुभव छिपाता है तो आत्मिक उपचार की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, लेकिन उसके लिए शिष्य को अपने भीतर की वास्तविक स्थिति ईमानदारी से उनके सामने रखनी होगी।
शरीर की थकान से ज्यादा खतरनाक है मन की हार
मुनि श्री ने मानसिक शक्ति के महत्व पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि शरीर की थकान विश्राम करने से दूर हो सकती है, लेकिन यदि मन हार जाए तो व्यक्ति भीतर से कमजोर होने लगता है।
उन्होंने कहा कि मन से हारा हुआ व्यक्ति मुश्किल से दोबारा सचेत और सक्रिय हो पाता है। इसलिए जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, आशा को समाप्त नहीं होने देना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि यदि जीवन को उत्साह और ऊर्जा के साथ जीना है तो आशाओं के दीप हमेशा जलाए रखना चाहिए। कठिन समय स्थायी नहीं होता, लेकिन उस समय व्यक्ति का दृष्टिकोण उसके आगे के जीवन की दिशा निर्धारित कर सकता है।
सही दिशा में निरंतर पुरुषार्थ का दिया संदेश
मुनि श्री ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल चलते रहना नहीं, बल्कि सही दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए। इसके लिए लक्ष्य निश्चित करना, अपनी बाधाओं की पहचान करना और निरंतर पुरुषार्थ करना आवश्यक है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन की वास्तविक मंजिल को पहचानिए, अपने भीतर मौजूद बाधाओं को समझिए, गुरु के सामने निष्कपट रहिए और परिस्थितियों से निराश हुए बिना लगातार आगे बढ़ते रहिए।
अंतरराष्ट्रीय भजन गायक सुधीर व्यास ने लिया आशीर्वाद
धर्मसभा के दौरान अंतरराष्ट्रीय भजन गायक सुधीर व्यास ने मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज को श्रीफल भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध भजन भी प्रस्तुत किया। भजन की प्रस्तुति ने धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
धर्मसभा में चक्रवर्ती अध्यक्ष आकाश आलोक कोल, नवीन गोधा, हुकमचंद जैन काका, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, महामंत्री हर्ष जैन, पत्रकार संजय पटौदी, राकेश विनायका, डॉ. विशाल जैन, पत्रकार राहुल सेठी, राजेश जैन दद्दू, विपुल बाझल और भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कोकिलाबेन हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने भी लिया आशीर्वाद
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि कोकिलाबेन हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने भी धर्मसभा में पहुंचकर मुनि श्री के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
दलाल बाग में आयोजित धर्मसभा के दौरान मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज का संदेश जीवन को लक्ष्यपूर्ण बनाने, स्वयं की कमजोरियों को पहचानने और कठिन परिस्थितियों में भी आशा तथा पुरुषार्थ बनाए रखने पर केंद्रित रहा। उन्होंने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि जीवन की यात्रा तभी सार्थक होती है, जब व्यक्ति अपनी मंजिल को पहचानकर सही दिशा में निरंतर आगे बढ़ता रहे।
