मानव शरीर नश्वर और अपवित्र होते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है : आचार्य उदारसागर
दोष नहीं, गुण देखने की हो दृष्टि; रत्नत्रय की साधना के लिए मानव जीवन को बनाएं माध्यम
मुरैना। मनोज जैन नायक। नगर के जैन उपासना स्थल में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने निर्विचिकित्सा अंग की विस्तृत व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, धर्मात्माओं और मानव जीवन के महत्व का संदेश दिया। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म और धर्मात्मा के प्रति मन में कभी घृणा, ग्लानि अथवा मात्सर्य का भाव नहीं रखना चाहिए। दूसरों की साधना, तपस्या और धर्माराधना को देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उनके गुणों की अनुमोदना करना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि जिसके भीतर गुणग्राहकता का भाव होता है, वही वास्तव में धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है। मनुष्य को दूसरों के दोष तलाशने के बजाय उनके भीतर मौजूद गुणों को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई विशेष गुण अवश्य होता है।
रत्नत्रय की साधना का माध्यम है मानव शरीर
आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने मानव शरीर की उपयोगिता समझाते हुए कमल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कमल कीचड़ में खिलता है और पंक में उत्पन्न होने के कारण ही पंकज कहलाता है। इसी प्रकार मानव शरीर नश्वर और अपवित्र होते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी शरीर के माध्यम से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र अर्थात रत्नत्रय की आराधना संभव है।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन केवल भोग-विलास के लिए नहीं मिला है। इसे आत्मकल्याण, साधना और आत्मशुद्धि का माध्यम बनाना चाहिए। जीवन की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब मनुष्य अपने भीतर के विकारों को दूर करते हुए आत्मा के स्वरूप को पहचानने का प्रयास करे।
आचार्य श्री ने कहा कि जो व्यक्ति रत्नत्रयधारी साधक से मात्सर्य करता है, वह वास्तव में रत्नत्रय से प्रेम नहीं करता। केवल बाहरी संयम, धार्मिक वेशभूषा अथवा दिखावा पर्याप्त नहीं है। जब तक मन के भीतर ईर्ष्या, द्वेष और कषाय मौजूद हैं, तब तक आत्मशुद्धि पूर्ण नहीं हो सकती।
दोष नहीं, गुण देखने की हो दृष्टि
आचार्य श्री ने बलभद्र के प्रसंग के माध्यम से गुणग्राही दृष्टि का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि बलभद्र ने कुत्ते के दांतों में भी गुण देख लिया था। इससे हमें प्रेरणा मिलती है कि हमारी दृष्टि दोषग्राही नहीं, बल्कि गुणग्राही होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसमें केवल गुण ही हों, लेकिन ऐसा भी कोई नहीं है जिसमें कोई गुण न हो। आवश्यकता इस बात की है कि हम सामने वाले व्यक्ति के गुणों को देखने और उनसे सीखने की दृष्टि विकसित करें।
मिठाई और दोने का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जब तक मिठाई रहती है, तब तक उसके साथ रखा दोना भी उपयोगी और महत्वपूर्ण लगता है, लेकिन मिठाई समाप्त होते ही वही दोना कचरे में फेंक दिया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तविक महत्व बाहरी आवरण का नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद वस्तु और उसके गुण का होता है।

बाहरी वेशभूषा नहीं, गुण और चरित्र है पहचान
मिर्जागालिव कवि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने बाहरी वेशभूषा और दिखावे के मोह पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके कपड़ों, रूप, पद अथवा बाहरी वैभव से नहीं होती। व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके गुण, चरित्र और आचरण से निर्धारित होता है।
उन्होंने कहा कि बाहरी आवरण के कारण मिलने वाला सम्मान स्थायी और वास्तविक सम्मान नहीं कहा जा सकता। सच्चा सम्मान व्यक्ति के सद्गुणों और उसके व्यवहार से प्राप्त होता है।
आचार्य श्री ने निर्विचिकित्सा का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि यह केवल घृणा का त्याग करना नहीं है, बल्कि धर्म, धर्मात्मा और धर्म के साधनों के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम रखना तथा दूसरों के गुणों की अनुमोदना करना भी है। जब मन से ईर्ष्या, घृणा और मात्सर्य समाप्त होते हैं तथा गुणग्राहकता का भाव विकसित होता है, तभी धर्म जीवन में प्रभावी रूप से उतरता है।
मोह कम होगा तो जीवन में आएगी शांति
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने भगवान महावीर के संदेशों को जीवन से जोड़ते हुए कहा कि भगवान महावीर ने बाहरी विजय से अधिक आत्मविजय को महत्व दिया। उन्होंने कहा कि जिसने अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, उसने बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया। जिसने लोभ को नियंत्रित कर लिया, उसने बड़ी संपत्ति प्राप्त कर ली और जिसने मोह को कम कर लिया, उसके जीवन में शांति का प्रवेश होने लगा।
मुनिश्री ने कहा कि आत्मचिंतन से जीवन में वैराग्य और विवेक का जन्म होता है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि संसार का सुख केवल प्रतिबिंब है और वास्तविक सुख आत्मा में है, तो उसकी अनावश्यक दौड़ धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य धन कमाए, लेकिन धन को अपना स्वामी न बनाए। परिवार में रहे, लेकिन अत्यधिक मोह में न डूबे। सम्मान मिले तो अहंकार न करे और अपमान मिले तो टूटे नहीं। आत्मचिंतन और संयम के माध्यम से जीवन को संतुलित बनाया जा सकता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित
धर्मसभा का कुशल संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री, मुरैना ने किया। उन्होंने प्रवचन के विभिन्न प्रसंगों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करते हुए श्रद्धालुओं को विषय से जोड़े रखा।
कार्यक्रम का मंगलाचरण नीलेश जैन, सागर ने किया। इसके पश्चात सम्मानीयजनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के प्रेरणादायी विचारों का श्रवण किया।
धर्मसभा के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने जीवन में गुणग्राही दृष्टि अपनाने, दूसरों के गुणों की अनुमोदना करने तथा ईर्ष्या, घृणा और कषायों को कम करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

