रक्षाबंधन के दूसरे दिन ग्राम कुंडाली में सदियों पुरानी भुजरियां परंपरा निभाई गई। ग्रामीणों ने तालाब में भुजरियां विसर्जित कर मंदिरों में अर्पित कीं और एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछकर प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया।
कुंडाली भुजरियां परंपरा: आपसी प्रेम, भाईचारे और कुशलक्षेम पूछने की सदियों पुरानी परंपरा
कुंडाली। कुंडाली भुजरियां परंपरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गांव की उस पुरानी परंपरा का प्रतीक है, जो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने और आपसी प्रेम, भाईचारा एवं सौहार्द बनाए रखने का संदेश देती है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भुजरियां का एक-दूसरे से आदान-प्रदान कर कुशलक्षेम पूछते हैं और रिश्तों में प्रेम एवं अपनत्व बनाए रखने की कामना करते हैं।
कुंडाली भुजरियां परंपरा में हुआ पारंपरिक आयोजन
ग्राम कुंडाली में रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरियां का आयोजन पारंपरिक उत्साह के साथ किया गया। घर-घर रखी गई भुजरियां को ग्रामीण मुख्य बाजार में एकत्रित करते हैं। इसके बाद सभी भुजरियों को हनुमान मंदिर स्थित तालाब पर ले जाया गया, जहां पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार उन्हें विसर्जित किया गया।
इसके बाद ग्रामीणों ने भुजरियां ग्राम के विभिन्न मंदिरों में भगवान के चरणों में अर्पित कीं और गांव में एकता, अखंडता, प्रेम, भाईचारे एवं आपसी सौहार्द की कामना की।
दुख की घड़ी में परिवारों के साथ खड़े होने की परंपरा
इस परंपरा की सबसे खास बात यह रही कि मंदिरों में भुजरियां अर्पित करने के बाद ग्रामीण उन परिवारों के घर भी पहुंचे, जिनके यहां बीते समय में किसी सदस्य का निधन हुआ है।
ग्रामीण उनके यहां भुजरियां लेकर पहुंचे और परिवार की कुशलक्षेम पूछी। इस दौरान दुख की घड़ी में परिवार के साथ खड़े होने और उन्हें सामाजिक एवं भावनात्मक संबल देने की परंपरा भी निभाई गई।
इस तरह कुंडाली भुजरियां परंपरा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक रिश्तों और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने की भावना को भी मजबूत करती दिखाई दी।
छोटी परंपरा, बड़ी सीख
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आज भी निभाई जा रही ऐसी छोटी-छोटी परंपराएं जीवन में बड़ी सीख देती हैं। भुजरियां हमें याद दिलाती हैं कि रिश्ते, सामाजिक मर्यादा, आपसी संबंध और एक-दूसरे का सुख-दुख में साथ देना ही समाज की असली ताकत है।
बदलते समय में जहां लोग अपने व्यस्त जीवन में एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, वहीं कुंडाली की यह पुरानी परंपरा आज भी लोगों को जोड़ने का काम कर रही है।
भुजरियां का आदान-प्रदान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कुशलता जानने, प्रेम बांटने और सामाजिक एकता को मजबूत करने का माध्यम बनी हुई है।
नई पीढ़ी तक पहुंचे कुंडाली भुजरियां परंपरा
ग्रामीणों का मानना है कि ऐसी परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से गांव की संस्कृति, रिश्तों की गरिमा और आपसी भाईचारे की भावना जीवित रहती है।
कुंडाली भुजरियां परंपरा इस बात का उदाहरण है कि भारतीय ग्रामीण संस्कृति में त्योहार केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज के लोगों को आपस में जोड़ने का भी माध्यम हैं।
रक्षाबंधन के दूसरे दिन निभाई जाने वाली भुजरियां की यह परंपरा लोगों को एक-दूसरे से मिलने, उनकी कुशलक्षेम जानने और सुख-दुख में साथ खड़े रहने का अवसर देती है। यही कारण है कि बदलते दौर में भी ग्राम कुंडाली के लोग इस परंपरा को पूरी आत्मीयता के साथ निभा रहे हैं।
भुजरियां का यह आयोजन गांव की एकता, अखंडता, प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करने के साथ आने वाली पीढ़ी को भी अपनी संस्कृति एवं सामाजिक मूल्यों से जुड़े रहने का संदेश देता है।

