Dr. Ramshankar Chanchal: झाबुआ की मिट्टी से निकला एक कालजयी व्यक्तित्व
साहित्य साधना से बनाई अलग पहचान
टीकमगढ़। (बंटी सिरवैया) Dr. Ramshankar Chanchal झाबुआ की साहित्यिक पहचान को प्रदेश और देश के व्यापक मंच तक पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से झाबुआ की संस्कृति, प्रकृति, जनजीवन और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी स्वर दिया है। उनका साहित्य केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन और समाज को संवेदना के साथ देखने की दृष्टि भी प्रदान करता है।
08 अप्रैल 1957 को जन्मे डॉ. रामशंकर त्रिवेदी ‘चंचल’ ने हिन्दी और समाजशास्त्र में एम.ए. तथा न्यायशास्त्र में एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी रचनाएं देश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन और डिजिटल माध्यमों के जरिए भी उनकी साहित्यिक आवाज पाठकों और श्रोताओं तक पहुंची है।
साहित्यिक उपलब्धियों का व्यापक संसार
Dr. Ramshankar Chanchal की रचनात्मक यात्रा विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देती है। उनकी साहित्यिक कृतियों से जुड़ी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘काली’ तथा बहुभाषीय रहस्यमयी कृति ‘रहस्य’ उनकी रचनात्मक क्षमता का परिचय देती हैं। उनकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है और शैक्षणिक स्तर पर भी उन्हें स्थान मिला है।
कक्षा एक से लेकर एम.ए. स्तर तक उनकी रचनाओं का पाठ्यक्रम में शामिल होना उनके साहित्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। फिजी में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनका आमंत्रित होना भी उनकी साहित्यिक यात्रा का उल्लेखनीय पड़ाव रहा।
नई कविताओं में संवेदना और प्रेम
डॉ. चंचल की नई कविताओं में प्रेम, विरह, प्रकृति और मानवीय रिश्तों की गहरी अनुभूति दिखाई देती है। उनकी पंक्ति “मेरा नाम आए जब भी तो तेरे नाम साथ हो” प्रेम और समर्पण की भावना को व्यक्त करती है।
इसी तरह उनकी काव्य अभिव्यक्ति “मेरी साँसों में, खुशबू नहीं जब तक तेरी दूरी है” रिश्तों की गहराई और विरह की अनुभूति को सामने लाती है। उनकी कविताएं पाठक को केवल भावुक नहीं करतीं, बल्कि उसे रुककर सोचने और अपने भीतर झांकने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

झाबुआ की संस्कृति को दिया व्यापक मंच
Dr. Ramshankar Chanchal के साहित्य की प्रमुख विशेषता झाबुआ के स्थानीय परिवेश से गहरा जुड़ाव है। उन्होंने आदिवासी अंचल की प्रकृति, संस्कृति, सामाजिक जीवन और लोगों की संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।
झाबुआ की मिट्टी, जंगल, नदी और वहां के जनजीवन को साहित्य के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। उनकी निरंतर साहित्यिक सक्रियता ने स्थानीय परिवेश को राष्ट्रीय साहित्यिक विमर्श से जोड़ने में योगदान दिया।
इंसानियत और सद्भाव का संदेश
उनकी रचनाओं में प्रेम, करुणा, भाईचारा और मानवता जैसे मूल्य प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनका साहित्य किसी एक वर्ग या सीमित क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य को उसकी मूल संवेदनाओं के साथ देखने की कोशिश करता है।
उनकी साहित्यिक दृष्टि का मूल भाव यही है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति के सुख-दुःख को समझा जाए और मानवीय रिश्तों को संवेदना के साथ जिया जाए। यही विचार उनकी कविताओं को व्यापक मानवीय अर्थ प्रदान करता है।
युवाओं के लिए प्रेरणादायी यात्रा
Dr. Ramshankar Chanchal की निरंतर साहित्य साधना नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह साबित किया कि किसी छोटे या अपेक्षाकृत दूरस्थ अंचल से उठने वाली साहित्यिक आवाज भी देश-दुनिया तक पहुंच सकती है।
उनकी रचनात्मक यात्रा बताती है कि साहित्य के लिए निरंतर लेखन, अनुभव, संवेदनशीलता और समाज से जुड़ाव आवश्यक है। उन्होंने अपनी लेखनी को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का माध्यम न बनाकर समाज और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया।
‘नई संवेदना’ का अर्थ
Dr. Ramshankar Chanchal के साहित्य की ‘नई संवेदना’ दरअसल मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की दृष्टि है। उनकी रचनाएं प्रेम, प्रकृति, रिश्तों और सामाजिक सरोकारों के बीच गहरे संबंधों को सामने लाती हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा यह संदेश देती है कि सच्चे साहित्य की कोई सीमा नहीं होती। झाबुआ की मिट्टी से निकली उनकी आवाज आज व्यापक साहित्यिक संसार में अपनी पहचान बना चुकी है। उनकी साधना और रचनात्मक सक्रियता उन्हें झाबुआ के साहित्यिक परिदृश्य का विशिष्ट और कालजयी व्यक्तित्व बनाती है।
— बंटी सिरवैया, टीकमगढ़, मध्यप्रदेश
