कई बाधाओं को पार कर खड़ा किया ‘हैप्पी इंडियन विलेज’, HIV संक्रमित बच्चों का जीवन संवार रहे रवि बापटले
लातूर। समाज में HIV से संक्रमित लोगों को लेकर लंबे समय से मौजूद भेदभाव और गलत धारणाओं के बीच महाराष्ट्र के लातूर में रवि बापटले ने सेवा और मानवीय संवेदना की एक अलग मिसाल पेश की है। लातूर के पास स्थापित उनका ‘हैप्पी इंडियन विलेज’ उन HIV संक्रमित बच्चों और जरूरतमंद लोगों के लिए आश्रय बना है, जिन्हें कभी अपने ही लोगों और समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा। आज यहां करीब 110 लोग रह रहे हैं, जबकि वर्षों के दौरान लगभग 300 लोग यहां से आगे बढ़कर अपना जीवन शुरू कर चुके हैं।
रवि बापटले ने इस सेवालय की शुरुआत ऐसे समय में की थी, जब HIV को लेकर समाज में जागरूकता बेहद कम थी और संक्रमित लोगों के प्रति भेदभाव आम था। उनका उद्देश्य केवल आश्रय देना नहीं, बल्कि बच्चों को शिक्षा, उपचार, आत्मसम्मान और बेहतर भविष्य के अवसर उपलब्ध कराना रहा है।
एक घटना ने बदल दी रवि बापटले की जिंदगी
रवि बापटले का जन्म लातूर के उदगीर तालुका के धोंडिहिप्परगा गांव में हुआ। उनके जीवन की दिशा वर्ष 2006 में घटी एक घटना के बाद बदल गई। उनके अनुसार, गांव में एक HIV संक्रमित बच्चे को जीवन के अंतिम समय में भी सम्मान और उचित संस्कार नहीं मिल सके। इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
इसी के बाद रवि ने तय किया कि वे समाज से उपेक्षित HIV संक्रमित बच्चों और अन्य जरूरतमंद लोगों के लिए काम करेंगे। उस समय वे एक मराठी अखबार में पत्रकारिता करने के साथ अध्यापन से भी जुड़े हुए थे। लेकिन अपने सेवा मिशन को पूरा समय देने के लिए उन्होंने पेशेवर जीवन से अलग होने का फैसला किया।
सेवा के लिए नौकरी छोड़ी, विवाह नहीं करने का लिया निर्णय
रवि ने अपने इस मिशन को जीवन का उद्देश्य बनाने के लिए कई व्यक्तिगत फैसले भी किए। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और परिवार को बताया कि वे विवाह नहीं करेंगे, ताकि अपना पूरा समय जरूरतमंद बच्चों और HIV संक्रमित लोगों की सेवा में लगा सकें।
उनकी इस पहल के बारे में जानकारी मिलने पर एक मित्र के रिश्तेदार ने लातूर से करीब 15 किलोमीटर दूर लगभग छह एकड़ जमीन दान में दी। जमीन मिलने के बाद ऐसा लगा कि अब सेवालय की शुरुआत आसान हो जाएगी, लेकिन वास्तविक संघर्ष इसके बाद शुरू हुआ।
गांव के विरोध से लेकर बुनियादी सुविधाओं तक का संघर्ष

रवि बापटले के मुताबिक, HIV संक्रमित लोगों के लिए आश्रय बनाने की उनकी योजना का स्थानीय स्तर पर काफी विरोध हुआ। उन्हें सामाजिक बहिष्कार जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। आर्थिक संसाधन भी बेहद सीमित थे।
उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में जाकर लोगों से आर्थिक सहयोग मांगना शुरू किया। वर्ष 2007 में दान में मिली जमीन पर झोपड़ी बनाकर काम शुरू करने की कोशिश की गई, लेकिन रवि के अनुसार कुछ लोगों ने उस झोपड़ी को तोड़ दिया। बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं हासिल करने में भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उनकी पहल के विरोध में कुछ लोगों ने प्रदर्शन भी किया।
इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद रवि ने अपना काम बंद नहीं किया।
शुरुआत में थे सिर्फ चार-पांच बच्चे
हैप्पी इंडियन विलेज की शुरुआत बहुत छोटे स्तर पर हुई। शुरुआती दिनों में रवि के पास केवल चार-पांच बच्चे थे। इन बच्चों के रहने और इलाज के साथ सबसे बड़ी चुनौती उनकी शिक्षा की थी।
HIV को लेकर मौजूद भ्रांतियों के कारण बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराना भी आसान नहीं था। रवि ने स्कूल प्रबंधन और स्थानीय लोगों को समझाने की लगातार कोशिश की कि HIV संक्रमित बच्चों के साथ पढ़ने से दूसरे बच्चों को सामान्य संपर्क के जरिए संक्रमण नहीं होता।
इस कठिन दौर में उनके बड़े भाई और कुछ दोस्तों ने उनका साथ दिया। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं और बच्चों को स्कूलों में शिक्षा मिलने लगी।
शिक्षा से बदली बच्चों की जिंदगी
रवि बापटले की कोशिश केवल बच्चों को आश्रय देने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने शिक्षा को उनके पुनर्वास और आत्मनिर्भरता का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बनाया। समय के साथ हैप्पी इंडियन विलेज के बच्चे स्कूल और कॉलेज तक पहुंचे।
उनके मुताबिक, यहां पले-बढ़े कई बच्चे उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद रोजगार से जुड़ चुके हैं और आत्मनिर्भर जीवन जी रहे हैं। जो बच्चे कभी सामाजिक भेदभाव के कारण शिक्षा से वंचित होने की स्थिति में थे, उनमें से कई अब अपने भविष्य की नई कहानी लिख रहे हैं।
सेवालय में रह रहे करीब 110 लोग
आज हैप्पी इंडियन विलेज में करीब 110 लोग रह रहे हैं। यहां बच्चों और अन्य जरूरतमंद लोगों के रहने, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का ध्यान रखने का प्रयास किया जाता है।
रवि के अनुसार, अब तक करीब 300 लोग यहां रहने के बाद आगे अपने जीवन की नई शुरुआत कर चुके हैं। इनमें कई ऐसे युवा भी हैं, जिन्होंने शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी और परिवार के साथ सामान्य सामाजिक जीवन की ओर कदम बढ़ाया है।
35 लड़कियों की कराई शादी
हैप्पी इंडियन विलेज में पली-बढ़ी लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ उनके वैवाहिक जीवन में भी सहयोग किया गया। रवि बताते हैं कि अब तक यहां से जुड़ी करीब 35 लड़कियों की शादी कराई जा चुकी है।
उनके अनुसार, विवाह के बाद गर्भावस्था के दौरान उचित चिकित्सकीय देखभाल और उपचार के चलते इन महिलाओं के बच्चों में HIV संक्रमण नहीं पाया गया। आधुनिक चिकित्सा और नियमित उपचार की मदद से HIV के मां से बच्चे में संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
रवि बताते हैं कि सेवालय से अपना नया जीवन शुरू कर चुकी कई महिलाएं आज भी प्रसव और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर हैप्पी इंडियन विलेज से जुड़ाव बनाए रखती हैं।
KBC तक पहुंची सेवा कार्यों की कहानी
समय के साथ रवि बापटले और हैप्पी इंडियन विलेज के कार्यों को व्यापक पहचान मिलने लगी। उनकी सेवा यात्रा को मराठी टेलीविजन कार्यक्रमों के साथ हिंदी ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे बड़े मंच पर भी जगह मिली। इन माध्यमों से उनके कार्यों के बारे में देशभर के लोगों को जानकारी मिली और सहयोग भी प्राप्त हुआ।
प्रसिद्ध भजन गायिका और पद्मश्री सम्मानित अनुराधा पौडवाल ने भी सेवालय के लिए सहयोग करते हुए यहां दस कमरों के निर्माण में सहायता की। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की ओर से भी बच्चों के लिए 10 लाख रुपये की सहायता दिए जाने की जानकारी है।
HIV के प्रति भेदभाव खत्म करना सबसे बड़ी जरूरत
रवि बापटले की इस पूरी यात्रा का एक महत्वपूर्ण संदेश HIV को लेकर समाज में मौजूद भेदभाव को खत्म करना है। HIV के साथ जीवन जी रहे व्यक्ति को सामान्य सामाजिक संपर्क, साथ बैठने, पढ़ने या भोजन करने से संक्रमण नहीं फैलता। इसके बावजूद जागरूकता की कमी के कारण कई लोगों को आज भी सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
रवि का मानना है कि बच्चों को किसी ऐसी परिस्थिति के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। उन्हें भी दूसरे बच्चों की तरह प्यार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिलना चाहिए।
सेना में नहीं जा सके, सेवा को बनाया जीवन का मिशन
रवि बापटले कभी सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे, लेकिन उनका वह सपना पूरा नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने समाज के ऐसे वर्ग की सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया, जिसे कभी मुख्यधारा से अलग कर देखा जाता था।
लगभग दो दशक के संघर्ष के बाद आज हैप्पी इंडियन विलेज सिर्फ एक आश्रय स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता और आत्मसम्मान की कहानी बन चुका है। चार-पांच बच्चों से शुरू हुआ यह सफर आज सैकड़ों जिंदगियों को छू चुका है। रवि की कोशिश अब भी यही है कि HIV के साथ जीवन जी रहे बच्चों को दया नहीं, बल्कि समान अवसर, उचित उपचार, शिक्षा और सम्मान मिले।
