आकांक्षाओं से मुक्ति ही आत्मकल्याण का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर में चातुर्मासरत परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए जैन दर्शन के नि:कांक्षित अंग की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी समस्या बाहरी वस्तुओं की कमी नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती आकांक्षाएं हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। मनुष्य जीवनभर इच्छाओं की पूर्ति के पीछे दौड़ता रहता है, लेकिन उसकी चाहतों का अंत नहीं होता। इसलिए इच्छाओं को पूरा करने के बजाय उनके वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है।
पंचेंद्रियों के सुख की चाह
आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक संसारी जीव पंचेंद्रिय विषयों के सुख की आकांक्षा रखता है। आंखों को सुंदर दृश्य, कानों को मधुर शब्द, नाक को सुगंध, जिह्वा को स्वादिष्ट भोजन और त्वचा को स्पर्श का सुख चाहिए।
मनुष्य इन इच्छाओं को पूरा करने में अपना पूरा जीवन लगा देता है, लेकिन इंद्रियों की तृप्ति स्थायी नहीं होती। कुछ समय का सुख मिलने के बाद मन फिर किसी नई वस्तु की इच्छा करने लगता है।
बढ़ती इच्छाओं पर किया विचार
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य सुख-सुविधाओं, धन-संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा को सफलता का आधार मानने लगा है। जिसके पास साइकिल है वह मोटरसाइकिल चाहता है, मोटरसाइकिल वाला कार और कार वाला बड़ी कार की इच्छा करता है। इसी तरह पद मिलने के बाद बड़ा पद और धन मिलने के बाद अधिक धन की चाह पैदा होती रहती है।
ऐसे में मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वास्तव में उसकी इच्छाएं पूरी हो रही हैं या वह स्वयं इच्छाओं के पीछे लगातार भाग रहा है।

भौतिक सुख क्षणिक
आचार्यश्री ने कहा कि संसार का कोई भी भौतिक सुख स्थायी नहीं है। जिस वस्तु को पाकर आज मनुष्य अत्यंत प्रसन्न होता है, कुछ समय बाद वही वस्तु सामान्य लगने लगती है और मन नई उपलब्धि की तलाश में निकल पड़ता है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि में है। संतुष्ट मनुष्य सीमित साधनों में भी सुखी रह सकता है।
चक्रवर्ती का उदाहरण
आचार्यश्री ने चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि उसके पास छह खंड का साम्राज्य, अपार धन, सत्ता और वैभव होता है, लेकिन जीवन की अंतिम घड़ी में इनमें से कुछ भी उसके साथ नहीं जाता। धन, सत्ता और साम्राज्य सब यहीं रह जाते हैं।
उन्होंने कहा कि जब इतना वैभवशाली व्यक्ति भी संसार से खाली हाथ जाता है तो सामान्य मनुष्य को धन, पद और प्रतिष्ठा पर इतना अभिमान नहीं करना चाहिए।
मुनिश्री उपशांत सागर ने बताया नि:कांक्षित का अर्थ
मुनिश्री उपशांत सागर ने कहा कि संसार में अनेक राजा, महाराजा और सम्राट हुए, जिन्होंने अपार वैभव अर्जित किया, लेकिन समय के साथ उनका धन और राजपाट समाप्त हो गया। प्रत्येक मनुष्य को एक दिन संसार से विदा होना है। इसलिए जीवन रहते यह विचार करना चाहिए कि जो वस्तु साथ नहीं जाने वाली, उसके पीछे पूरा जीवन क्यों लगाया जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि नि:कांक्षित का अर्थ परिवार और आवश्यकताओं की उपेक्षा करना नहीं है। गृहस्थ जीवन में आवश्यक साधनों का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन साधन जीवन का उद्देश्य नहीं बनना चाहिए। धन पास रहे, लेकिन उसके प्रति अत्यधिक आसक्ति न हो।

आत्मकल्याण की ओर बढ़ने का संदेश
मुनिश्री ने कहा कि नि:कांक्षित का अर्थ सांसारिक विषयों और भोगों के प्रति ऐसी लालसा नहीं रखना है, जिससे मनुष्य धर्म और आत्मकल्याण को भूल जाए। जैन दर्शन में यह सम्यग्दर्शन की निर्मलता का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि सच्चा श्रद्धालु संसार के सुखों को जीवन की अंतिम उपलब्धि नहीं मानता। बाहरी सुख क्षणिक हैं, जबकि आत्मा का वास्तविक सुख भीतर स्थित है। इसलिए मनुष्य को अनावश्यक इच्छाओं और आसक्ति से मुक्त होकर धर्म, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
