मजबूरियों को परीक्षा मानकर धैर्य और सहनशीलता से करें सामना: ब्रह्माकुमार भगवान भाई
सारंगपुर सब जेल में ब्रह्माकुमारीज का ‘कर्म गति एवं व्यवहार शुद्धि’ कार्यक्रम, बंदियों को कराया राजयोग मेडिटेशन; नशामुक्त जीवन जीने की दिलाई शपथ
रिपोर्टर – मनोज कुमार पुष्पद
सारंगपुर। जीवन में आने वाली मजबूरियों और कठिन परिस्थितियों को परेशानी मानकर निराश होने के बजाय उन्हें परीक्षा समझकर धैर्य और सहनशीलता के साथ सामना करना चाहिए। मनुष्य यदि अपनी सोच और संस्कारों में सकारात्मक परिवर्तन लाए तो कठिन परिस्थितियों से निकलकर अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है। यह विचार माउंट आबू, राजस्थान से आए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने सारंगपुर सब जेल में आयोजित ‘कर्म गति एवं व्यवहार शुद्धि’ कार्यक्रम में बंदियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
ब्रह्माकुमारीज संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य बंदियों को आत्मचिंतन, सकारात्मक सोच, नैतिक मूल्यों और राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से जीवन में सुधार के लिए प्रेरित करना था। कार्यक्रम के दौरान बंदियों को बुरी आदतों और नशे से दूर रहकर अपराधमुक्त एवं सकारात्मक जीवन जीने का संकल्प भी दिलाया गया।
कारागृह नहीं, इसे सुधारगृह के रूप में देखें
ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने कहा कि जेल में बिताए जाने वाले समय को केवल सजा के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस समय का उपयोग आत्मचिंतन और स्वयं के संस्कारों में सुधार के लिए किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “यह कारागृह नहीं, बल्कि सुधारगृह है। यहां स्वयं में सुधार लाने और अपने संस्कारों में परिवर्तन करने का अवसर मिलता है। एक-दूसरे से बदला लेने के बजाय स्वयं को बदलने की भावना रखें।”
उन्होंने बंदियों से कहा कि जेल में मिलने वाले एकांत समय में अपने जीवन पर गंभीरता से विचार करें। स्वयं से पूछें कि इस संसार में आने का उद्देश्य क्या है, जीवन को किस दिशा में ले जाना है और अब तक किए गए कर्मों से क्या सीख मिली है। इस प्रकार का आत्ममंथन मनुष्य की सोच और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
गलतियों से सीखें, उन्हें दोबारा जीवन में न आने दें
भगवान भाई ने कहा कि जिन गलतियों और परिस्थितियों के कारण व्यक्ति को जेल तक आना पड़ा, उनसे सीख लेकर भविष्य में उन्हें दोहराने से बचना चाहिए। कारागृह को संस्कार परिवर्तन का केंद्र बनाते हुए यहां से बाहर निकलने के बाद एक बेहतर और जिम्मेदार नागरिक के रूप में जीवन जीने का लक्ष्य बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बदले की भावना मनुष्य को अशांति की ओर ले जाती है, जबकि स्वयं को बदलने का संकल्प जीवन को नई दिशा प्रदान करता है। जिस परमात्मा को शांति, दया, करुणा और क्षमा का सागर कहा जाता है, उसके बच्चों के रूप में मनुष्य को भी अपने जीवन में इन गुणों को धारण करने का प्रयास करना चाहिए।
क्रोध, ईर्ष्या और नफरत हैं मनुष्य के वास्तविक दुश्मन
भगवान भाई ने अपने संबोधन में कहा कि ईर्ष्या, क्रोध, लड़ाई-झगड़ा, चोरी, लोभ, लालच, मोह, अहंकार और नफरत जैसी बुराइयां मनुष्य की वास्तविक शत्रु हैं। इनके प्रभाव में आकर व्यक्ति कई बार ऐसे निर्णय ले लेता है, जिनका परिणाम उसे लंबे समय तक भुगतना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को कोई भी कार्य करने से पहले उसके परिणामों के बारे में विचार करना चाहिए। ऐसा कोई कर्म नहीं करना चाहिए, जिसके कारण भविष्य में पछताना पड़े या परिवार और समाज में सम्मान प्रभावित हो। जीवन में नैतिक मूल्यों, सद्गुणों और सकारात्मक विचारों को अपनाकर ही श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण किया जा सकता है।
मनुष्य जीवन अनमोल, सकारात्मक परिवर्तन को बनाएं लक्ष्य
भगवान भाई ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत अनमोल है। इसे नकारात्मक विचारों, विवादों और गलत कार्यों में गंवाने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाने में लगाना चाहिए। परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। जीवन में सुख और दुख दोनों आते हैं, लेकिन कठिन समय में धैर्य और सहनशीलता बनाए रखना आवश्यक है।
उन्होंने बंदियों को संदेश दिया कि जीवन में आने वाली मजबूरियों को परीक्षा मानें। जिस प्रकार परीक्षा व्यक्ति की क्षमता को परखती है, उसी प्रकार कठिन परिस्थितियां भी मनुष्य के धैर्य और आत्मबल की परीक्षा लेती हैं। संयम के साथ उनका सामना करने से अनेक परेशानियों से बचा जा सकता है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और नफरत जैसी आंतरिक कमजोरियों को दूर कर व्यक्ति अपने चरित्र को मजबूत बना सकता है। यदि जेल में रहते हुए इन कमजोरियों पर विजय पाने का प्रयास किया जाए तो कारागृह वास्तव में सुधारगृह की भूमिका निभा सकता है।
मेडिटेशन से विचार और संस्कारों में संभव है बदलाव
स्थानीय ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की राजयोग शिक्षिका बीके प्रीति बहन ने कहा कि जब मनुष्य विषय-वासनाओं और नकारात्मक विचारों के प्रभाव में आ जाता है, तब उससे गलतियां होने की संभावना बढ़ जाती है। मन और विचारों को नियंत्रित करने के लिए नियमित मेडिटेशन, सकारात्मक चिंतन और आध्यात्मिक ज्ञान को जीवन में अपनाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि राजयोग मेडिटेशन व्यक्ति को स्वयं के विचारों को समझने और नकारात्मकता से बाहर निकलने में मदद करता है। नियमित अभ्यास से व्यक्ति अपने व्यवहार और संस्कारों में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
जेल अधीक्षक विकास जैन ने कार्यक्रम को बताया उपयोगी
सारंगपुर सब जेल के अधीक्षक विकास जैन ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा सोचने और बुरी आदतों को छोड़ने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। उन्होंने जेल परिसर में बंदियों के लिए प्रेरणादायी कार्यक्रम आयोजित करने पर ब्रह्माकुमारीज संस्था का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने भविष्य में भी बंदियों के मानसिक, नैतिक और व्यवहारिक सुधार के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने के लिए संस्था को आमंत्रित किया।
कार्यक्रम में धर्मेंद्र जी ने कहा कि यहां बताई गई बातों को बंदी यदि केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए अपने व्यवहार और दैनिक जीवन में अपनाएं, तो वे बुरी आदतों से मुक्त होकर सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
राजयोग मेडिटेशन कराया, बंदियों ने ली नशामुक्ति की शपथ
कार्यक्रम के अंतिम चरण में ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने कमेंट्री के माध्यम से बंदियों को राजयोग मेडिटेशन कराया। इस दौरान अपराधमुक्त जीवन जीने, मनोबल मजबूत करने, नकारात्मक विचारों से दूर रहने, बुरी आदतों को छोड़ने और संस्कारों में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए विभिन्न संकल्प कराए गए।
इसके बाद उपस्थित बंदियों को नशे से दूर रहने और नशामुक्त जीवन अपनाने की शपथ दिलाई गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बंदियों के साथ ब्रह्माकुमारी संस्था के सदस्य और जेल स्टाफ उपस्थित रहा।
आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि व्यक्ति की परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, आत्मचिंतन, धैर्य, सहनशीलता, सकारात्मक सोच और दृढ़ संकल्प के जरिए जीवन में बदलाव की नई शुरुआत की जा सकती है।
