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विफलता हमारा भ्रम, सफलता मूल स्वरूप: मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

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Published On: 22 August 2026

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विफलता हमारा भ्रम, सफलता मूल स्वरूप: मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

दलाल बाग में धर्मसभा को किया संबोधित, बोले— अध्यात्म व्यक्ति को समर्थ बनाने की बड़ी पूंजी; मध्य प्रदेश में अल्पसंख्यक आयोग के गठन पर भी हुई चर्चा

इंदौर। “विफलता हमारा भय और भ्रम है, जबकि सफलता हमारा मूल स्वरूप है। कोई भी व्यक्ति विफल होने के लिए कार्य नहीं करता। सफलता मनुष्य का स्वभाव है और स्वभाव को कोई बदल नहीं सकता।” ये प्रेरक विचार राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने शनिवार को इंदौर के दलाल बाग में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों से जुड़े पदाधिकारी उपस्थित रहे। मुनिश्री ने जीवन में सफलता, आत्मविश्वास, अध्यात्म, आत्मनिर्भरता और धार्मिक दायित्वों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने श्रद्धालुओं को परिस्थितियों से भयभीत होने के बजाय अपने भीतर की शक्ति पहचानने और जीवन में स्वयं आगे बढ़ने का संदेश दिया।

जल की शीतलता की तरह सफलता हमारा स्वभाव

मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने सफलता और असफलता के अंतर को समझाते हुए जल के स्वभाव का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जल का मूल स्वभाव शीतलता है। उसे कुछ समय के लिए गर्म किया जा सकता है, लेकिन उसकी शीतलता के मूल स्वभाव को समाप्त नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में परिस्थितियां उसके स्वभाव को कुछ समय के लिए प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन उसके भीतर मौजूद मूल शक्ति समाप्त नहीं होती। उन्होंने कहा कि स्वभाव को कुछ समय के लिए “विभाव” में बदला जा सकता है, किंतु स्वभाव कभी नष्ट नहीं होता।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि जीवन में आने वाली असफलताओं को स्थायी सत्य मानकर निराश नहीं होना चाहिए। मनुष्य के भीतर आगे बढ़ने और सफल होने की क्षमता हमेशा मौजूद रहती है।

अध्यात्म व्यक्ति को समर्थ बनाने की बड़ी पूंजी

मुनिश्री ने अध्यात्म के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अध्यात्म व्यक्ति को समर्थ बनाने की बहुत बड़ी पूंजी है। व्यक्ति जब आध्यात्मिक रूप से स्वयं को मजबूत करता है तो उसके भीतर आत्मविश्वास, धैर्य और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति विकसित होती है।

उन्होंने कहा कि भगवान में जिन शक्तियों का अनुभव किया जाता है, वही शक्तियां भक्त के अनुभव में भी आने लगती हैं। आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और वास्तविक स्वरूप से परिचित कराती है।

धर्मसभा में उन्होंने बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने भीतर की शक्ति को पहचानने पर जोर दिया।

‘स्वयं एक कदम चलना सीखो’


मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने जैन धर्म के मूल संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति को स्वयं सुखी, समृद्ध, निरावलंबी और पूर्ण बनने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब-जब मनुष्य दूसरों का आलंबन लेता है, तब उसकी अपनी शक्तियां कमजोर होने लगती हैं। दुनिया के पीछे चलते रहने के बजाय व्यक्ति को स्वयं एक कदम आगे बढ़ने का साहस करना चाहिए।

मुनिश्री ने कहा, “तुम स्वयं एक कदम चलना सीखो। तुम चले और गिर गए तो कोई बात नहीं, कम से कम तुमने साहस तो किया। जो स्वयं एक कदम चल सकता है, वह आगे सौ कदम भी चल सकता है।”

इस संदेश के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मनिर्भरता और प्रयास का महत्व समझाया।

असफल होने के डर से प्रयास न छोड़ें

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में कई बार व्यक्ति असफलता के डर से प्रयास करना ही छोड़ देता है। यह भय ही उसकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। यदि व्यक्ति पहला कदम उठाने का साहस करता है तो भविष्य में बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करने की संभावना भी पैदा होती है।

उन्होंने कहा कि गिरना या किसी प्रयास में तत्काल सफलता नहीं मिलना जीवन का अंत नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति ने स्वयं आगे बढ़ने का प्रयास किया।

धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के इन विचारों को ध्यानपूर्वक सुना।

मंदिर हमारी आस्था का केंद्र

धर्मसभा के दौरान मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने मंदिरों की व्यवस्था और समाज के धार्मिक दायित्वों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि मंदिर हमारी आस्था का केंद्र हैं और उनकी व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से चलाना समाज के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि मंदिर समिति द्वारा निर्धारित व्यवस्था शुल्क का समय पर भुगतान करना श्रद्धालुओं का नैतिक और धार्मिक दायित्व है। धार्मिक संस्थानों की व्यवस्था समाज के सहयोग से ही संचालित होती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए समय पर सहयोग देना चाहिए।

मध्य प्रदेश में अल्पसंख्यक आयोग को लेकर हुई चर्चा

दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद के प्रमुख सतीश जैन ने बताया कि कार्यक्रम में अखिल भारतीय जैन अल्पसंख्यक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं महाराष्ट्र सरकार में राज्य मंत्री ललित गांधी ने भी मुनिश्री के दर्शन किए।

उनके साथ महासंघ के महामंत्री सौरभ भंडारी, मध्य प्रदेश संयोजक डॉ. संजीव जैन, उमेश जैन सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। सभी ने मुनिश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस दौरान ललित गांधी ने मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज से मध्य प्रदेश में भी अल्पसंख्यक आयोग के गठन के विषय पर चर्चा की।

विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने लिया आशीर्वाद

धर्मसभा में उज्जैन दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद के महामंत्री सुनील जैन, विश्व हिंदू परिषद से अनिल कासलीवाल और धर्मेंद्र सेठी सहित विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी मुनिश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

चातुर्मास आयोजन समिति की ओर से मनीष गोधा, नवीन-अनिल गोधा, हर्ष जैन, आकाश जैन, धर्मेंद्र जैन, गिरीश जैन (गिन्नी ग्रुप), राहुल जैन सहित अन्य पदाधिकारियों ने आगंतुक अतिथियों का शाल और श्रीफल देकर सम्मान किया।

मंगलाचरण नृत्य से हुई कार्यक्रम की शुरुआत


धार्मिक कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इसके बाद संगम नगर महिला मंडल की सदस्यों ने भावपूर्ण मंगलाचरण नृत्य की प्रस्तुति दी। प्रस्तुति ने धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

कार्यक्रम में धार्मिक वातावरण के बीच मुनिश्री के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

बड़ी संख्या में समाजजन रहे मौजूद

धर्मसभा में डी.के. जैन, जैनेश झांझरी, सतीश जैन, मयंक जैन, राकेश गोयल, वीरेंद्र बढ़जात्या, पंडित प्रदीप शास्त्री और पवन पाटोदी सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

धर्मसभा का संचालन अर्पित जैन और अमित सिंघई ने किया। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

धर्मसभा में मुनिश्री का मुख्य संदेश आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित रहा। उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि जीवन में आने वाली विफलताओं को अपना स्थायी स्वरूप न मानें, बल्कि अपने भीतर मौजूद शक्ति को पहचानकर आगे बढ़ते रहें। उनके अनुसार सफलता मनुष्य के मूल स्वभाव का हिस्सा है और प्रयास करने का साहस ही व्यक्ति को जीवन में आगे लेकर जाता है।

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